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BSA 2023 की धारा 2(1)(j) में “साबित” का अर्थ क्या है? आसान भाषा में पूरी जानकारी

BSA 2023 की धारा 2(1)(j) में “साबित” का अर्थ क्या है? आसान भाषा में पूरी जानकारी
काल्पनिक चित्र

पूरे लेख का मूल प्रावधान (Bare Act Text):- 


2. परिभाषाएं. - (1) इस अधिनियम में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो, -


(ञ) "साबित" कोई तथ्य साबित हुआ कहा जाता है, जब न्यायालय अपने समक्ष के विषयों पर विचार करने के पश्चात् या तो यह विश्वास करे कि उस तथ्य का अस्तित्व है या उसके अस्तित्व को इतना अधिसम्भाव्य समझे कि उस विशिष्ट मामले की परिस्थितियों में किसी प्रज्ञावान व्यक्ति को इस अनुमान पर कार्य करना चाहिए कि उस तथ्य का अस्तित्व है;


BSA 2023 की धारा 2(1)(j) में “साबित” का अर्थ क्या है?

भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023 (Bharatiya Sakshya Adhiniyam, 2023) की धारा 2(1)(j) में “साबित” (Proved) शब्द की परिभाषा दी गई है। न्यायालय में किसी भी वाद या आपराधिक मुकदमे का निर्णय साक्ष्यों पर आधारित होता है। इसलिए यह समझना आवश्यक है कि कानून की दृष्टि में कोई तथ्य कब “साबित” माना जाता है।

धारा 2(1)(j) के अनुसार, कोई तथ्य तब “साबित” माना जाता है जब न्यायालय उसके समक्ष प्रस्तुत सामग्री और साक्ष्यों पर विचार करने के बाद यह विश्वास कर ले कि वह तथ्य वास्तव में अस्तित्व में है, अथवा उसका अस्तित्व इतना संभावित है कि एक सामान्य समझ वाला व्यक्ति परिस्थितियों को देखते हुए उसके अस्तित्व को स्वीकार कर ले।

सरल शब्दों में कहें तो केवल किसी बात का दावा कर देना पर्याप्त नहीं है। उस दावे को विश्वसनीय साक्ष्यों, दस्तावेजों, गवाहों या अन्य प्रमाणों के माध्यम से सिद्ध करना आवश्यक होता है। जब न्यायालय इन साक्ष्यों से संतुष्ट हो जाती है, तब वह तथ्य “साबित” माना जाता है।


“साबित” की अवधारणा का महत्व

न्यायिक प्रक्रिया में “साबित” शब्द अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि किसी पक्ष की सफलता या असफलता इसी पर निर्भर करती है। यदि कोई पक्ष अपने कथनों को पर्याप्त साक्ष्यों द्वारा सिद्ध नहीं कर पाता, तो उसका दावा अस्वीकार किया जा सकता है।

उदाहरण के लिए, यदि कोई व्यक्ति यह आरोप लगाता है कि उसके साथ मारपीट हुई है, तो उसे मेडिकल रिपोर्ट, प्रत्यक्षदर्शी गवाह, वीडियो रिकॉर्डिंग या अन्य साक्ष्यों के माध्यम से अपने आरोप को साबित करना होगा। केवल आरोप लगाने से तथ्य सिद्ध नहीं माना जाएगा।


न्यायालय किस आधार पर तथ्य को साबित मानती है?

न्यायालय निम्नलिखित आधारों पर किसी तथ्य को साबित मान सकती है—

√ प्रत्यक्ष या परिस्थितिजन्य साक्ष्य। 

√ दस्तावेजी प्रमाण। 

√ गवाहों के बयान। 

√ इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड। 

√ विशेषज्ञों की राय। 

√ परिस्थितियों से उत्पन्न संभावनाएँ। 

यदि इन साक्ष्यों से न्यायालय को पर्याप्त विश्वास हो जाता है, तो तथ्य साबित माना जाता है।


“साबित” और “असाबित” में अंतर

किसी तथ्य के संबंध में तीन स्थितियाँ हो सकती हैं—

• तथ्य साबित है। 

• तथ्य असाबित (Not Proved) है। 

• तथ्य खंडित (Disproved) है। 

जब साक्ष्य पर्याप्त हों तो तथ्य साबित होता है। जब साक्ष्य न पर्याप्त हों और न ही तथ्य गलत सिद्ध हो, तब वह असाबित रहता है। वहीं जब साक्ष्य यह दर्शा दें कि कथित तथ्य अस्तित्व में नहीं है, तब वह खंडित माना जाता है।

निष्कर्ष

BSA 2023 की धारा 2(1)(j) न्यायालय को यह निर्धारित करने का आधार प्रदान करती है कि कोई तथ्य “साबित” है या नहीं। यह परिभाषा न्यायिक निर्णयों की निष्पक्षता और विश्वसनीयता सुनिश्चित करती है। किसी भी मुकदमे में केवल कथन पर्याप्त नहीं होता, बल्कि उसे विश्वसनीय साक्ष्यों द्वारा सिद्ध करना आवश्यक होता है। यही कारण है कि “साबित” की अवधारणा भारतीय साक्ष्य कानून की आधारशिला मानी जाती है।



(IEA) की धारा 3 PARA 7 को (BSA) की धारा 2(1)J में बदल दिया गया है। - अगर आप चाहे तो लोगो पर क्लिक करके देख सकते है


अस्वीकरण: लेख/प्रारूप में दिए गए वाद संख्या, सन, नाम, एड्रेस, दिनांक, मोबाइल नंबर या किसी भी प्रकार का लेख/प्रारूप काल्पनिक है यह लेख/प्रारूप मात्र जानकारी के लिए है जिसका किसी भी घटना के साथ मेल इस लेख/प्रारूप से कोई संबंध नहीं है सलाह सहित यह लेख/प्रारूप केवल सामान्य जानकारी प्रदान करता है. यह किसी भी तरह से योग्य अधिवक्ता राय का विकल्प नहीं है. अधिक जानकारी के लिए हमेशा किसी विशेषज्ञ या अपने अधिवक्ता से परामर्श करें. भारतीय न्याय संहिता (BNS) 2023  इस जानकारी के लिए ज़िम्मेदारी का दावा नहीं करता है




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