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शाहिद अख्तर

BNS Section 356 in Hindi – मानहानि कानून क्या है, सजा और उदाहरण

BNS Section 356 in Hindi – मानहानि कानून क्या है, सजा और उदाहरण
काल्पनिक चित्र 

BNS धारा 356: मानहानि (Defamation) का पूरा कानूनी विश्लेषण


परिचय


भारतीय दंड कानून में किसी व्यक्ति की प्रतिष्ठा (Reputation) को बहुत महत्वपूर्ण माना गया है। नई आपराधिक संहिता भारतीय न्याय संहिता, 2023 (BNS) में भी मानहानि को एक दंडनीय अपराध के रूप में शामिल किया गया है। धारा 356 BNS मानहानि से संबंधित प्रावधानों को स्पष्ट रूप से परिभाषित करती है।

आज के डिजिटल युग में, सोशल मीडिया, समाचार और सार्वजनिक मंचों पर किसी के बारे में गलत या अपमानजनक बयान देना बहुत आसान हो गया है। ऐसे में यह धारा व्यक्ति की प्रतिष्ठा की रक्षा करने का महत्वपूर्ण साधन बन जाती है।


पूरे लेख का मूल प्रावधान (Bare Act Text):- 


धारा 356 BNS की परिभाषा


धारा 356 के अनुसार—मानहानि 


(1) जो कोई बोले गए या पढ़े जाने के लिए आशयित शब्दों द्वारा या दृश्य-रूपणों द्वारा किसी व्यक्ति के बारे में कोई लांछन इस आशय से लगाता या प्रकाशित करता है कि ऐसे लांछन से ऐसे व्यक्ति की ख्याति की अपहानि की जाए या यह जानते हुए या विश्वास करने का कारण रखते हुए लगाता या प्रकाशित करता है कि ऐसे लांछन से ऐसे व्यक्ति की ख्याति की अपहानि होगी, एतस्मिन्पश्चात् अपवादित दशाओं के सिवाय उसके बारे में कहा जाता है कि वह उस व्यक्ति की मानहानि करता है।

व्याख्या :- 1. किसी मृत व्यक्ति को कोई लांछन लगाना मानहानि की कोटि में आ सकेगा, यदि वह लांछन उस व्यक्ति की ख्याति की, यदि वह जीवित होता, अपहानि करता, और उसके परिवार या अन्य निकट सम्बन्धियों की भावनाओं को उपहत करने के लिए आशयित हो।

व्याख्या :- 2. किसी कम्पनी या संगम या व्यक्तियों के समूह के सम्बन्ध में उसकी वैसी हैसियत में कोई लांछन लगाना मानहानि की कोटि में आ सकेगा।

व्याख्या :- 3. अनुकल्प के रूप में, या व्यंगोक्ति के रूप में अभिव्यक्त लांछन मानहानि की कोटि में आ सकेगा।

व्याख्या :- 4.  कोई लांछन किसी व्यक्ति की ख्याति की अपहानि करने वाला नहीं कहा जाता जब तक कि वह लांछन दूसरों की दृष्टि में प्रत्यक्षतः या अप्रत्यक्षतः उस व्यक्ति के सदाचारिक या बौद्धिक स्वरूप को हेय न करे या उस व्यक्ति की जाति के या उसकी आजीविका के सम्बन्ध में उसकेशील को हेय न करे या उस व्यक्ति की साख को नीचे न गिराए या यह विश्वास न कराए कि उस व्यक्ति का शरीर घृणोत्पादक दशा में है या ऐसी दशा में है जो साधारण रूप से निकृष्ट समझी जाती है।

उदाहरण :- (क) रामू यह विश्वास कराने के आशय से कि सानू ने श्यामू की घड़ी अवश्य चुराई है, कहता है, "सानू एक ईमानदार व्यक्ति है, उसने श्यामू की घड़ी कभी नहीं चुराई है।" जब तक कि यह अपवादों में से किसी के अन्तर्गत न आता हो, यह मानहानि है।

(ख) सानू से पूछा जाता है कि मोहन की घड़ी किसने चुराई है। सानू यह विश्वास कराने के आशय से कि जगदीश ने मोहन की घड़ी चुराई है, जगदीश की ओर संकेत करता है। जब तक कि यह अपवादों में से किसी के अन्तर्गत नहीं आता हो, यह मानहानि है।

(ग) जगदीश यह विश्वास कराने के आशय से कि अमित ने सोहन की घड़ी चुराई है, अमित का एक चित्र खींचता है जिसमें वह सोहन की घड़ी लेकर भाग रहा है। जब तक कि यह अपवादों में से किसी के अन्तर्गत नहीं आता हो, यह मानहानि है।

अपवाद 1.- किसी ऐसी बात का लांछन लगाना, जो किसी व्यक्ति के सम्बन्ध में सत्य हो, मानहानि नहीं है, यदि यह लोक कल्याण के लिए हो कि वह लांछन लगाया जाए या प्रकाशित किया जाए। वह लोक कल्याण के लिए है या नहीं यह तथ्य का प्रश्न है।

अपवाद 2.- उसके लोक कृत्यों के निर्वहन में लोक सेवक के आचरण के विषय में या उसके शील के विषय में, जहां तक उसका शील उस आचरण से प्रकट होता हो, न कि उससे आगे, कोई राय, चाहे वह कुछ भी हो, स‌द्भावपूर्वक अभिव्यक्त करना मानहानि नहीं है।

अपवाद 3.- किसी लोक प्रश्न के सम्बन्ध में किसी व्यक्ति के आचरण के विषय में, और उसके शील के विषय में, जहां तक कि उसका शील उस आचरण से प्रकट होता हो, न कि उससे आगे, कोई राय, चाहे वह कुछ भी हो, सद्भावपूर्वक अभिव्यक्त करना मानहानि नहीं है।

उदाहरण :- किसी लोक प्रश्न पर सरकार को अर्जी देने में, किसी लोक प्रश्न के लिए सभा बुलाने के अपेक्षण पर हस्ताक्षर करने में, ऐसी सभा का सभापतित्व करने में या उसमें हाजिर होने में, किसी ऐसी समिति का गठन करने में या उसमें सम्मिलित होने में, जो लोक समर्थन आमन्त्रित करती है, किसी ऐसे पद के किसी विशिष्ट अभ्यर्थी के लिए मत देने में या उसके पक्ष में प्रचार करने में, जिसके कर्त्तव्यों के दक्षतापूर्ण निर्वहन से लोक हितबद्ध है, जगदीश के आचरण के विषय में अमित द्वारा कोई राय, चाहे वह कुछ भी हो, सद्भावपूर्वक अभिव्यक्त करना मानहानि नहीं है।

अपवाद 4. - किसी न्यायालय की कार्यवाहियों की या किन्हीं ऐसी कार्यवाहियों के परिणाम की सारतः सही रिपोर्ट को प्रकाशित करना मानहानि नहीं है।

व्याख्या :- कोई मजिस्ट्रेट या अन्य अधिकारी, जो किसी न्यायालय में विचारण से पूर्व की प्रारम्भिक जांच खुले न्यायालय में कर रहा हो, उपरोक्त धारा के अर्थ के अन्तर्गत न्यायालय है।

अपवाद 5. - किसी, ऐसे मामले के गुणागुण के विषय में चाहे वह सिविल हो या दाण्डिक, जो किसी न्यायालय द्वारा विनिश्चित हो चुका हो, या किसी ऐसे मामले के पक्षकार, साक्षी या अभिकर्ता के रूप में किसी व्यक्ति के आचरण के विषय में या ऐसे व्यक्ति के शील के विषय में, जहां तक कि उसका शील उस आचरण से प्रकट होता हो, न कि उसके आगे, कोई राय, चाहे वह कुछ भी हो, सद्भावपूर्वक अभिव्यक्त करना मानहानि नहीं है।

उदाहरण :- (क) राजेश कहता है "मैं समझता हूं कि उस विचारण में मोहन का साक्ष्य ऐसा परस्पर विरोधी है कि वह अवश्य ही मूर्ख या बेईमान होना चाहिए"। यदि राजेश ऐसा सद्भावपूर्वक कहता है तो वह इस अपवाद के अन्तर्गत आ जाता है, क्योंकि जो राय वह मोहन के शील के सम्बन्ध में अभिव्यक्त करता है, वह ऐसी है जैसी कि साक्षी के रूप में मोहन के आचरण से, न कि उसके आगे, प्रकट होती है।

(ख) किन्तु यदि मोहन कहता है "जो कुछ मोहन ने उस विचारण में दृढ़तापूर्वक कहा है, मैं उस पर विश्वास नहीं करता क्योंकि मैं जानता हूँ कि वह सत्यवादिता से रहित व्यक्ति है," तो रामू इस अपवाद के अन्तर्गत नहीं आता है, क्योंकि वह राय जो वह मोहन के शील के सम्बन्ध में अभिव्यक्त करता है, ऐसी राय है, जो साक्षी के रूप में मोहन के आचरण पर आधारित नहीं है।

अपवाद 6.- किसी ऐसी कृति के गुणागुण के विषय में, जिसको उसके कर्ता ने लोक के निर्णय के लिए रखा हो, या उसके कर्ता के शील के विषय में, जहां तक कि उसका शील ऐसी कृति में प्रकट र होता हो, न कि उसके आगे, कोई राय सद्भावपूर्वक अभिव्यक्त करना मानहानि नहीं है।

स्पष्टीकरण. कोई कृति लोक के निर्णय के लिए अभिव्यक्त रूप से या कर्ता की ओर से किए गए ऐसे कार्यों द्वारा, जिनसे लोक के निर्णय के लिए ऐसा रखा जाना विवक्षित हो, रखी जा सकती है।

उदाहरण :- (क) जो व्यक्ति पुस्तक प्रकाशित करता है, वह उस पुस्तक को लोक के निर्णय के लिए रखता

(ख) वह व्यक्ति, जो लोक के समक्ष भाषण देता है, उस भाषण को लोक के निर्णय के लिए रखता है।

(ग) वह अभिनेता या गायक, जो किसी लोक रंगमंच पर आता है, अपने अभिनय या गायन को लोक के निर्णय के लिए रखता है।

(घ) सुधीर, श्यामू द्वारा प्रकाशित एक पुस्तक के सम्बन्ध में कहता है "श्यामू की पुस्तक मूर्खतापूर्ण है, श्यामू अवश्य कोई दुर्बल पुरुष होना चाहिए। श्यामू की पुस्तक अशिष्टतापूर्ण है, श्यामू अवश्य ही अपवित्र विचारों का व्यक्ति होना चाहिए"। यदि सुधीर ऐसा सद्भावपूर्वक कहता है, तो वह इस अपवाद के अन्तर्गत आता है, क्योंकि वह राय जो वह, श्यामू के विषय में अभिव्यक्त करता है, श्यामू के शील से वहीं तक, न कि उससे आगे सम्बन्ध रखती है जहां तक कि श्यामू का शील उसकी पुस्तक से प्रकट होता है।

(ङ) किन्तु यदि सुधीर कहता है "मुझे इस बात का आश्चर्य नहीं है कि जगदीश की पुस्तक मूर्खतापूर्ण तथा अशिष्टतापूर्ण है क्योंकि वह एक दुर्बल और लम्पट व्यक्ति है"। सुधीर इस अपवाद के अन्तर्गत नहीं आता क्योंकि वह राय, जो कि वह जगदीश के शील के विषय में अभिव्यक्त करता है, ऐसी राय है जो जगदीश की पुस्तक पर आधारित नहीं है।

अपवाद 7.- किसी ऐसे व्यक्ति द्वारा, जो किसी अन्य व्यक्ति के ऊपर कोई ऐसा प्राधिकार रखता हो, जो या तो विधि द्वारा प्रदत्त हो या उस अन्य व्यक्ति के साथ की गई किसी विधिपूर्ण संविदा से उद्भूत हो, ऐसे विषयों में, जिनसे कि ऐसा विधिपूर्ण प्राधिकार सम्बन्धित हो, उस अन्य व्यक्ति के आचरण की सद्भावपूर्वक की गई कोई परिनिन्दा मानहानि नहीं है।

उदाहरण :- किसी साक्षी के आचरण की या न्यायालय के किसी अधिकारी के आचरण को सद्भावपूर्वक परिनिन्दा करने वाला कोई न्यायाधीश, उन व्यक्तियों की, जो उसके आदेशों के अधीन है, सद्भावपूर्वक परिनिन्दा करने वाला कोई विभागाध्यक्ष, अन्य बालकों की उपस्थिति में किसी बालक की स‌द्भावपूर्वक परिनिन्दा करने वाला पिता या माता, अन्य विद्यार्थियों की उपस्थिति में किसी विद्यार्थी की सद्भावपूर्वक परिनिन्दा करने वाला शिक्षक, जिसे विद्यार्थी के माता-पिता से प्राधिकार प्राप्त है, सेवा में शिथिलता के लिए सेवक की सद्भावपूर्वक परिनिन्दा करने वाला स्वामी, अपने बैंक के रोकड़िए की ऐसे रोकड़िया के रूप में, ऐसे रोकड़िए के आचरण के लिए, सद्भावपूर्वक परिनिन्दा करने वाला कोई बैंककार इस अपवाद के अन्तर्गत आते हैं।

अपवाद 8.- किसी व्यक्ति के विरुद्ध कोई अभियोग ऐसे व्यक्तियों में से किसी व्यक्ति के समक्ष सद्भावपूर्वक लगाना, जो उस व्यक्ति के ऊपर अभियोग की विषय-वस्तु के सम्बन्ध में विधिपूर्ण प्राधिकार रखते हों, मानहानि नहीं है।

उदाहरण :- यदि सोहन एक मजिस्ट्रेट के समक्ष योगेश पर सद्भावपूर्वक अभियोग लगाता है, यदि सोहन एक सेवक योगेश के आचरण के सम्बन्ध में योगेश के मालिक से सद्भावपूर्वक शिकायत करता है, यदि सोहन एक बालक योगेश के सम्बन्ध में योगेश के पिता से सद्भावपूर्वक शिकायत करता है; तो सोहन इस अपवाद के अन्तर्गत आता है।

अपवाद 9.- किसी अन्य के शील पर लांछन लगाना मानहानि नहीं है, परन्तु यह तब जबकि उसे लगाने वाले व्यक्ति के या किसी अन्य व्यक्ति के हित की संरक्षा के लिए, या लोक कल्याण के लिए, वह लांछन सद्भावपूर्वक लगाया गया हो।

उदाहरण :- (क) जावेद एक दुकानदार है। वह राजू से, जो उसके कारबार का प्रवन्ध करता है, कहता है, "संदीप को कुछ मत बेचना जब तक कि वह तुम्हें नकद धन न दे दे, क्योंकि उसकी ईमानदारी के बारे में मेरी राय अच्छी नहीं है।" यदि उसने संदीप पर यह लांछन अपने हितों की संरक्षा के लिए सद्भावपूर्वक लगाया है, तो जावेद इस अपवाद के अन्तर्गत आता है।

(ख) संदीप, एक मजिस्ट्रेट अपने वरिष्ठ आफिसर को रिपोर्ट देते हुए, रामू के शील पर लांछन लगाता है। यहां, यदि वह लांछन सद्भावपूर्वक और लोक कल्याण के लिए लगाया गया है, तो संदीप इस अपवाद के अन्तर्गत आता है।

अपवाद 10.- एक व्यक्ति को दूसरे व्यक्ति के विरुद्ध स‌द्भावपूर्वक सावधान करना मानहानि नहीं है, परन्तु यह तब जबकि ऐसी सावधानी उस व्यक्ति की भलाई के लिए, जिसे वह दी गई हो, या किसी ऐसे व्यक्ति की भलाई के लिए, जिससे वह व्यक्ति हितबद्ध हो, या लोक कल्याण के लिए आशयित हो।

(2) जो कोई किसी अन्य व्यक्ति की मानहानि करेगा, वह सादा कारावास से, जिसकी अवधि दो वर्ष तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, या दोनों से, या सामुदायिक सेवा से दण्डित किया जाएगा।

(3) जो कोई किसी बात को यह जानते हुए या विश्वास करने का अच्छा कारण रखते हुए कि ऐसी बात किसी व्यक्ति के लिए मानहानिकारक है, मुद्रित करेगा, या उत्कीर्ण करेगा, वह सादा कारावास से, जिसकी अवधि दो वर्ष तक हो सकेगी, या जुर्माने से, या दोनों से, दण्डित किया जाएगा।

(4) जो कोई किसी मुद्रित या उत्कीर्ण पदार्थ को, जिसमें मानहानिकारक विषय अन्तर्विष्ट है, यह जानते हुए कि उसमें ऐसा विषय अन्तर्विष्ट है, बेचेगा या बेचने की प्रस्थापना करेगा, वह सादा कारावास से, जिसकी अवधि दो वर्ष तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, या दोनों से, दण्डित किया जाएगा।


मानहानि के आवश्यक तत्व (Essential Ingredients)


धारा 356 के अंतर्गत अपराध सिद्ध करने के लिए निम्न तत्व आवश्यक हैं:

1. आरोप (Imputation)

किसी व्यक्ति के बारे में कोई कथन या आरोप होना चाहिए।

2. प्रकाशन (Publication)

वह आरोप किसी तीसरे व्यक्ति तक पहुँचना चाहिए। केवल निजी बातचीत मानहानि नहीं होती।

3. हानि की मंशा (Intention)

आरोप लगाने वाले का उद्देश्य प्रतिष्ठा को नुकसान पहुँचाना होना चाहिए या उसे इसका ज्ञान होना चाहिए।

4. प्रतिष्ठा को नुकसान (Harm to Reputation)

आरोप ऐसा होना चाहिए जिससे व्यक्ति की सामाजिक छवि, सम्मान या विश्वसनीयता प्रभावित हो।


धारा 356 की व्याख्याएँ (Explanations)


BNS में इस धारा के अंतर्गत कई महत्वपूर्ण स्पष्टीकरण दिए गए हैं:

(1) मृत व्यक्ति की मानहानि

यदि किसी मृत व्यक्ति के बारे में ऐसा आरोप लगाया जाए जिससे उसके परिवार की भावनाएँ आहत हों, तो यह भी मानहानि हो सकती है। 

(2) कंपनी या समूह की मानहानि

किसी कंपनी, संस्था या समूह के खिलाफ झूठा आरोप लगाना भी इस धारा के अंतर्गत आता है।

(3) व्यंग्य या संकेत द्वारा आरोप

यदि कोई व्यक्ति सीधे न कहकर व्यंग्य या संकेत के माध्यम से आरोप लगाता है, तब भी यह मानहानि हो सकती है।

(4) प्रतिष्ठा का नुकसान कब माना जाएगा

यदि आरोप किसी व्यक्ति के नैतिक, बौद्धिक या सामाजिक स्तर को गिराता है, या उसकी साख (credit) को नुकसान पहुँचाता है, तभी इसे मानहानि माना जाएगा।


मानहानि के प्रकार


1. लिखित मानहानि (Libel)

समाचार पत्र, सोशल मीडिया पोस्ट, लेख आदि 

स्थायी रूप में मौजूद 

2. मौखिक मानहानि (Slander)

बोलकर या इशारों से की गई 

अस्थायी रूप


उदाहरण (Illustrations)


▪️किसी व्यक्ति के बारे में झूठी चोरी का आरोप लगाना 

▪️सोशल मीडिया पर गलत जानकारी फैलाना 

▪️किसी की प्रतिष्ठा गिराने के लिए फर्जी वीडियो बनाना 

जैसे—अगर कोई व्यक्ति कहता है “वह ईमानदार है, उसने चोरी नहीं की”, लेकिन इसका उद्देश्य लोगों को यह विश्वास दिलाना है कि उसने चोरी की है, तो यह मानहानि मानी जाएगी।


मानहानि के अपवाद (Exceptions)


हर आरोप मानहानि नहीं होता। कुछ स्थितियों में यह अपराध नहीं माना जाता:

1. सत्य (Truth for Public Good)

यदि कथन सत्य है और सार्वजनिक हित में है।

2. लोक सेवक की आलोचना

यदि किसी सरकारी अधिकारी के कार्यों की ईमानदारी से आलोचना की जाए।

3. जनहित में टिप्पणी

किसी सार्वजनिक मुद्दे पर ईमानदारी से राय देना।

4. न्यायिक कार्यवाही की रिपोर्ट

कोर्ट की कार्यवाही का निष्पक्ष वर्णन।


सजा (Punishment)


धारा 356 के अंतर्गत मानहानि के लिए सामान्यतः:

उपधारा (2): राष्ट्रपति या उपराष्ट्रपति या राज्य के राज्यपाल या संघ राज्यक्षेत्र के प्रशासक या मंत्री के विरुद्ध मानहानि जो उसके लोककृत्यों के निर्वहन में उसके आचरण के बारे में हो, जब लोक अभियोजक ने परिवाद संस्थित किया हो दण्ड-2 वर्ष के लिए सादा कारावास या जुर्माना या दोनों या सामुदायिक सेवा असंज्ञेय जमानतीय- सेशन न्यायालय द्वारा विचारणीय-शमनीय।

उपधारा (2): किसी अन्य मामले में मानहानि- दण्ड-2 वर्ष के लिए सादा कारावास या जुर्माना या दोनों या सामुदायिक सेवा असंज्ञेय- जमानतीय-प्रथम वर्ग मजिस्ट्रेट द्वारा विचारणीय - शमनीय।

उपधारा (3): राष्ट्रपति या उपराष्ट्रपति या राज्य के राज्यपाल या संघ राज्यक्षेत्र के प्रशासक या मंत्री के विरुद्ध मानहानिकारक जानते हुए ऐसी बात को मुद्रित या उत्कीर्ण करना जो उसके लोककृत्यों के निर्वहन में उसके आचरण के बारे में हो, जब लोक अभियोजक ने परिवाद संस्थित किया हो-दण्ड-2 वर्ष के लिए सादा कारावास या जुर्माना या दोनों असंज्ञेय- जमानतीय- सेशन न्यायालय द्वारा विचारणीय-शमनीय।

उपधारा (3): किसी अन्य मामले में मानहानिकारक जानते हुए, किसी बात को मुद्रित या उत्कीर्ण करना-दण्ड-2 वर्ष के लिए सादा कारावास या जुर्माना या दोनों असंज्ञेय-जमानतीय-प्रथम वर्ग मजिस्ट्रेट द्वारा विचारणीय - शमनीय।

उपधारा (4): मानहानिकारक विषय अन्तर्विष्ट रखने वाले मुद्रित या उत्कीर्ण पदार्थ का, यह जानते हुए विक्रय कि उसमें राष्ट्रपति या उपराष्ट्रपति या राज्य के राज्यपाल या संघ राज्यक्षेत्र के प्रशासक या मंत्री के विरुद्ध उसके लोककृत्यों के निर्वहन में उसके आचरण के बारे में ऐसा विषय अंतर्विष्ट है, जब लोक अभियोजक ने परिवाद संस्थित किया हो दण्ड-2 वर्ष के लिए सादा कारावास या जुर्माना या दोनों असंज्ञेय जमानतीय- सेशन न्यायालय द्वारा विचारणीय-शमनीय।

उपधारा (4): किसी अन्य मामले में मानहानि कारक बात को अंतर्विष्ट रखने वाले मुद्रित या उत्कीर्ण पदार्थ का यह जानते हुए विक्रय कि उसमें ऐसा विषय अंतर्विष्ट है- दण्ड-2 वर्ष के लिए सादा कारावास या जुर्माना या दोनों असंज्ञेय- जमानतीय- प्रथम वर्ग मजिस्ट्रेट द्वारा विचारणीय-शमनीय।

(सजा की अवधि आमतौर पर 2 वर्ष तक हो सकती है – न्यायालय के विवेक पर निर्भर)

IPC और BNS में अंतर


आधारIPC (पुराना कानून)BNS (नया कानून)
धारा499356
भाषापुरानी अंग्रेज़ी शैलीसरल और आधुनिक
लागू होने की तारीख18602023


सोशल मीडिया और मानहानि


आज के समय में मानहानि के सबसे अधिक मामले सोशल मीडिया से जुड़े होते हैं, जैसे:

▪️फेसबुक पोस्ट 

▪️इंस्टाग्राम रील 

▪️यूट्यूब वीडियो 

किसी के खिलाफ फर्जी पोस्ट डालना सीधे तौर पर धारा 356 के अंतर्गत अपराध बन सकता है।


महत्वपूर्ण न्यायिक दृष्टिकोण


भारतीय न्यायालयों ने बार-बार कहा है कि:

👉 “प्रतिष्ठा, जीवन के अधिकार (Article 21) का हिस्सा है।”

इसलिए मानहानि कानून व्यक्ति के सम्मान की रक्षा के लिए जरूरी है।


निष्कर्ष


धारा 356 BNS मानहानि से संबंधित एक महत्वपूर्ण प्रावधान है, जो व्यक्ति की सामाजिक प्रतिष्ठा की रक्षा करता है। यह कानून अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और व्यक्तिगत सम्मान के बीच संतुलन बनाए रखने का प्रयास करता है।

आज के डिजिटल युग में यह और भी जरूरी हो गया है कि लोग सोशल मीडिया या सार्वजनिक मंचों पर कुछ भी लिखने या बोलने से पहले उसकी सत्यता और प्रभाव के बारे में सोचें।

👉 सही जानकारी देना अधिकार है, लेकिन झूठ फैलाना अपराध है।




अस्वीकरण: लेख/प्रारूप में दिए गए वाद संख्या, सन, नाम, एड्रेस, दिनांक, मोबाइल नंबर या किसी भी प्रकार का लेख/प्रारूप काल्पनिक है यह लेख/प्रारूप मात्र जानकारी के लिए है जिसका किसी भी घटना के साथ मेल इस लेख/प्रारूप से कोई संबंध नहीं है सलाह सहित यह लेख/प्रारूप केवल सामान्य जानकारी प्रदान करता है. यह किसी भी तरह से योग्य अधिवक्ता राय का विकल्प नहीं है. अधिक जानकारी के लिए हमेशा किसी विशेषज्ञ या अपने अधिवक्ता से परामर्श करें. भारतीय न्याय संहिता (BNS) 2023  इस जानकारी के लिए ज़िम्मेदारी का दावा नहीं करता है




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