Type Here to Get Search Results !

BNS धारा 340 क्या है? कूटरचित दस्तावेज या इलेक्ट्रॉनिक अभिलेख को असली की तरह उपयोग करने पर सजा और कानूनी प्रावधान

BNS धारा 340 क्या है? कूटरचित दस्तावेज या इलेक्ट्रॉनिक अभिलेख को असली की तरह उपयोग करने पर सजा और कानूनी प्रावधान
काल्पनिक चित्र


भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 340: कूटरचित दस्तावेज या इलेक्ट्रॉनिक अभिलेख का असली के रूप में उपयोग – सम्पूर्ण कानूनी विश्लेषण


प्रस्तावना

डिजिटल युग में दस्तावेजों की विश्वसनीयता अत्यंत महत्वपूर्ण हो गई है। सरकारी प्रमाण पत्र, बैंक रिकॉर्ड, संपत्ति दस्तावेज, आधार कार्ड, डिजिटल सर्टिफिकेट और ई-मेल जैसे इलेक्ट्रॉनिक अभिलेख आज कानूनी और प्रशासनिक प्रक्रिया का हिस्सा हैं। ऐसे में यदि कोई व्यक्ति कूटरचित (Forged) दस्तावेज या इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड को असली के रूप में उपयोग करता है, तो यह गंभीर दंडनीय अपराध है।

भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 340 इसी अपराध को दंडित करती है। यह धारा स्पष्ट करती है कि यदि कोई व्यक्ति यह जानते हुए कि दस्तावेज कूटरचित है, उसे असली के रूप में इस्तेमाल करता है, तो वह दंड का भागी होगा।



धारा 340 का कानूनी सार

(कूटरचित दस्तावेज या इलैक्ट्रानिक अभिलेख और इसे असली के रूप में उपयोग में लाना)


 (1) वह मिथ्या दस्तावेज या इलैक्ट्रानिक अभिलेख जो पूर्णतः या भागतः कूटरचना द्वारा रचा गया है, "कूटरचित दस्तावेज या इलैक्ट्रानिक अभिलेख" कहलाता है।।

(2) जो कोई किसी ऐसी दस्तावेज या इलैक्ट्रानिक अभिलेख को, जिसके बारे में वह यह जानता या विश्वास करने का कारण रखता हो कि वह कूटरचित दस्तावेज या इलैक्ट्रानिक अभिलेख है, कपटपूर्वक या बेईमानी से असली के रूप में उपयोग में लाएगा, वह उसी प्रकार दण्डित किया जाएगा, मानो उसने ऐसी दस्तावेज या इलैक्ट्रानिक अभिलेख की कूटरचना की हो।

अर्थात —
✔️ केवल नकली दस्तावेज बनाना ही अपराध नहीं है
✔️ उसे जानबूझकर असली बताकर उपयोग करना भी उतना ही बड़ा अपराध है



अपराध के आवश्यक तत्व (Essential Ingredients)

धारा 340 के अंतर्गत अपराध सिद्ध करने हेतु निम्न बिंदुओं का होना आवश्यक है:

🔹दस्तावेज या इलेक्ट्रॉनिक अभिलेख कूटरचित हो।

🔹अभियुक्त को यह जानकारी हो कि दस्तावेज नकली है।

🔹अभियुक्त ने उसे असली के रूप में प्रस्तुत या उपयोग किया हो।

🔹उपयोग करने का उद्देश्य लाभ प्राप्त करना, धोखा देना या कानूनी प्रभाव उत्पन्न करना हो।

यदि इन तत्वों में से कोई एक भी सिद्ध नहीं होता, तो अपराध स्थापित नहीं होगा।



इलेक्ट्रॉनिक अभिलेख का महत्व

आज के समय में निम्न डिजिटल रिकॉर्ड भी इस धारा के अंतर्गत आते हैं:

▪️फर्जी ई-मेल

▪️नकली डिजिटल सिग्नेचर

▪️फर्जी आधार/पैन PDF

▪️मॉर्फ की गई PDF फाइल

▪️फर्जी बैंक स्टेटमेंट

▪️जाली ऑनलाइन मार्कशीट

इस प्रकार, साइबर अपराधों पर भी यह धारा समान रूप से लागू होती है।



सजा का प्रावधान

 सजा:- ऐसे दस्तावेज की कूटरचना के लिए दंड

अपराध:- संज्ञेय

जमानत:- जमानतीय

विचारणीय:- प्रथम वर्ग मजिस्ट्रेट द्वारा विचारणीय

अशमनीय:- अशमनीय का मतलब है, ऐसा अपराध जिसके लिए कोई समझौता या सेटलमेंट संभव नहीं है।

अर्थात दंड उसी धारा के अनुसार होगा जिसके अंतर्गत मूल कूटरचना आती है।



अपराध की प्रकृति

यह एक गंभीर दंडनीय अपराध है

🔻प्रायः संज्ञेय (Cognizable) हो सकता है

🔻कई मामलों में गैर-जमानती (Non-Bailable)

🔻समझौता योग्य नहीं

हालांकि वास्तविक स्थिति अपराध की प्रकृति पर निर्भर करती है।



उदाहरण द्वारा समझें

उदाहरण 1:

राहुल ने फर्जी मार्कशीट बनवाई और सरकारी नौकरी में प्रस्तुत की।
👉 उसने नकली दस्तावेज को असली के रूप में उपयोग किया — धारा 340 लागू।

उदाहरण 2:

किसी ने बैंक लोन लेने हेतु फर्जी आय प्रमाण पत्र जमा किया।
👉 अपराध सिद्ध होगा यदि यह साबित हो कि उसे नकली होने की जानकारी थी।

उदाहरण 3:

कोई व्यक्ति बिना जानकारी के नकली दस्तावेज का उपयोग कर बैठता है।
👉 यदि ज्ञान (Knowledge) सिद्ध नहीं होता, तो धारा 340 लागू नहीं होगी।



बचाव (Defence) के आधार

अभियुक्त निम्न आधारों पर बचाव ले सकता है:

🔸उसे दस्तावेज के कूटरचित होने की जानकारी नहीं थी।

🔸दस्तावेज उसने स्वयं तैयार नहीं किया।

🔸कोई दुर्भावनापूर्ण आशय (Mens Rea) नहीं था।

🔸जांच में फोरेंसिक प्रमाण संदेहपूर्ण हैं।

🔸अभियोजन को “जानबूझकर उपयोग” सिद्ध करना आवश्यक है।



न्यायालय की दृष्टि

अदालतें ऐसे मामलों में विशेष ध्यान देती हैं:

▪️अभियुक्त की मंशा

▪️दस्तावेज का महत्व

▪️लाभ प्राप्त करने का प्रयास

▪️विशेषज्ञ रिपोर्ट (FSL रिपोर्ट)

यदि यह साबित हो जाए कि अभियुक्त ने जानबूझकर धोखा देने का प्रयास किया, तो सजा कठोर हो सकती है।



साइबर युग में धारा 340 का महत्व

आज अधिकांश अपराध डिजिटल माध्यम से हो रहे हैं। फर्जी ई-डॉक्यूमेंट, ऑनलाइन सर्टिफिकेट, डिजिटल पहचान पत्र आदि का दुरुपयोग आम हो गया है। इसलिए यह धारा डिजिटल धोखाधड़ी को नियंत्रित करने का प्रभावी कानूनी साधन है।

विशेष रूप से:

🔸ऑनलाइन जॉब फ्रॉड

🔸बैंकिंग फ्रॉड

🔸ई-टेंडर फर्जीवाड़ा

🔸सरकारी पोर्टल पर जाली दस्तावेज अपलोड करना

इन सभी पर यह धारा लागू हो सकती है।



BNS धारा 340 और पूर्व कानून से अंतर

पहले इसी प्रकार का प्रावधान IPC में था, लेकिन अब भारतीय न्याय संहिता, 2023 के अंतर्गत इसे अद्यतन रूप में लागू किया गया है। डिजिटल साक्ष्यों को स्पष्ट रूप से शामिल करना इसकी विशेषता है।



जमानत और ट्रायल प्रक्रिया

🔹यदि अपराध गंभीर प्रकृति का है तो सत्र न्यायालय में जमानत आवेदन देना पड़ सकता है।

🔹इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य होने पर धारा 65B सर्टिफिकेट महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

🔹अभियोजन को दस्तावेज की फोरेंसिक जांच प्रस्तुत करनी होती है।



निष्कर्ष

BNS की धारा 340 समाज में दस्तावेजों की विश्वसनीयता बनाए रखने हेतु अत्यंत महत्वपूर्ण प्रावधान है। केवल जाली दस्तावेज बनाना ही नहीं, बल्कि उसे असली बताकर उपयोग करना भी समान रूप से दंडनीय अपराध है। डिजिटल युग में इसकी प्रासंगिकता और बढ़ गई है।

यदि किसी पर इस धारा के अंतर्गत आरोप लगे हैं, तो उसे तत्काल सक्षम अधिवक्ता से कानूनी सलाह लेनी चाहिए, क्योंकि अपराध की गंभीरता के अनुसार कठोर दंड संभव है।




अस्वीकरण: लेख/प्रारूप में दिए गए वाद संख्या, सन, नाम, एड्रेस, दिनांक, मोबाइल नंबर या किसी भी प्रकार का लेख/प्रारूप काल्पनिक है यह लेख/प्रारूप मात्र जानकारी के लिए है जिसका किसी भी घटना के साथ मेल इस लेख/प्रारूप से कोई संबंध नहीं है सलाह सहित यह लेख/प्रारूप केवल सामान्य जानकारी प्रदान करता है. यह किसी भी तरह से योग्य अधिवक्ता राय का विकल्प नहीं है. अधिक जानकारी के लिए हमेशा किसी विशेषज्ञ या अपने अधिवक्ता से परामर्श करें. भारतीय न्याय संहिता (BNS) 2023  इस जानकारी के लिए ज़िम्मेदारी का दावा नहीं करता है


एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ
* Please Don't Spam Here. All the Comments are Reviewed by Admin.