प्रस्तावना
भारतीय न्याय संहिता (BNS) ने भारतीय दंड संहिता (IPC) की जगह लेकर आपराधिक कानूनों को अधिक आधुनिक और स्पष्ट बनाने का प्रयास किया है। इसी कड़ी में BNS की धारा 353 एक महत्वपूर्ण प्रावधान है, जो समाज में शांति और व्यवस्था बनाए रखने के लिए “लोक रिष्टिकारक वक्तव्य” (Public Mischief Statements) को अपराध की श्रेणी में रखता है।
आज के डिजिटल युग में, जहां सोशल मीडिया के माध्यम से सूचना तेजी से फैलती है, इस धारा का महत्व और भी बढ़ गया है। कोई भी झूठा या भ्रामक वक्तव्य समाज में भय, अशांति या भ्रम पैदा कर सकता है, जिसे कानून सख्ती से नियंत्रित करता है।
धारा 353 का अर्थ (लोक रिष्टिकारक वक्तव्य क्या है?)
BNS की धारा 353 के अंतर्गत वह व्यक्ति दोषी माना जाता है जो—
÷ कोई झूठी सूचना, अफवाह या भ्रामक बयान देता है
÷ जिसका उद्देश्य या परिणाम समाज में भय, अशांति या दहशत फैलाना हो
÷ जिससे सार्वजनिक शांति (Public Order) प्रभावित हो
सरल शब्दों में, यदि कोई व्यक्ति जानबूझकर ऐसा बयान देता है जो जनता को गुमराह करे या सामाजिक व्यवस्था बिगाड़े, तो वह इस धारा के तहत अपराध करता है।
धारा 353 का मूल भाषा में प्रावधान (Bare Act Text):-
लोक रिष्टिकारक वक्तव्य. -
(1) जो कोई किसी कथन, जनश्रुति या रिपोर्ट की-
सेना का कोई अधिकारी, सैनिक, नाविक या वायु सैनिक विद्रोह करे या अन्यथा
(क) इस आशय से कि, या जिससे यह सम्भाव्य हो कि, भारत की सेना, नौसेना या वायु वह अपने उस नाते, अपने कर्त्तव्य की अवहेलना करे या उसके पालन में असफल रहे,
या
(ख) इस आशय से कि, या जिससे यह सम्भाव्य हो कि, लोक या लोक के किसी भाग को ऐसा भय या संत्रास कारित हो जिससे कोई व्यक्ति राज्य के विरुद्ध या लोक प्रशान्ति के विरुद्ध अपराध करने के लिए उत्प्रेरित हो,
या
(ग) इस आशय से कि, या जिससे यह सम्भाव्य हो कि, उससे व्यक्तियों का कोई वर्ग या समुदाय किसी दूसरे वर्ग या समुदाय के विरुद्ध अपराध करने के लिए उद्दीप्त किया जाए, रचेगा, प्रकाशित करेगा या परिचालित करेगा, वह कारावास से, जो तीन वर्ष तक का हो सकेगा, या जुर्माने से, या दोनों से, दण्डित किया जाएगा।
(2) जो कोई मिथ्या जानकारी जनश्रुति या संत्रासकारी समाचार अन्तर्विष्ट करने वाले किसी कथन या रिपोर्ट को, इस आशय से कि, या जिससे यह सम्भाव्य हो कि, विभिन्न धार्मिक, मूलवंशीय, भाषाई या प्रादेशिक समूहों या जातियों या समुदायों के बीच शत्रुता, घृणा या वैमनस्य की भावनाएं, धर्म, मूलवंश, जन्म स्थान, निवास स्थान, भाषा, जाति या समुदाय के आधारों पर या अन्य किसी भी आधार पर पैदा या संप्रवर्तित हो, रचेगा, प्रकाशित करेगा, या परिचालित करेगा, वह कारावास से, जो तीन वर्ष तक का हो सकेगा, या जुमनि से, या दोनों से, दण्डित किया जाएगा।
(3) जो कोई उपधारा (2) में विनिर्दिष्ट अपराध किसी पूजा के स्थान में या किसी जमाव में, जो धार्मिक पूजा या धार्मिक कर्म करने में लगा हुआ हो, करेगा, वह कारावास से, जो पांच वर्ष तक का हो सकेगा, दण्डित किया जाएगा और जुर्माने का भी दायी होगा।
अपवाद - ऐसा कोई कथन, मिथ्या जानकारी, जनश्रुति या रिपोर्ट इस धारा के अर्थ के अन्तर्गत अपराध की कोटि में नहीं आती, जब उसे रचने वाले, प्रकाशित करने वाले या परिचालित करने वाले व्यक्ति के पास इस विश्वास के लिए युक्तियुक्त आधार हो कि ऐसा कथन, मिथ्या जनश्रुति या रिपोर्ट सत्य है और वह उसे सद्भावपूर्वक तथा पूर्वोक्त जैसे किसी आशय के बिना रचता है, प्रकाशित करता है या परिचालित करता है।
धारा 353 के मुख्य तत्व
इस धारा को समझने के लिए इसके आवश्यक तत्वों को जानना जरूरी है:
1. झूठी या भ्रामक जानकारी
वक्तव्य ऐसा होना चाहिए जो सत्य न हो या जानबूझकर गलत तरीके से प्रस्तुत किया गया हो।
2. सार्वजनिक प्रभाव
वक्तव्य का असर आम जनता पर होना चाहिए, न कि केवल किसी एक व्यक्ति पर।
3. लोक शांति में बाधा
वक्तव्य से समाज में डर, अफवाह, दंगा या अस्थिरता फैलने की संभावना होनी चाहिए।
4. दुर्भावना (Mens Rea)
अभियुक्त के मन में गलत उद्देश्य होना चाहिए या उसे यह पता हो कि उसका वक्तव्य नुकसान पहुंचा सकता है
धारा 353 के अंतर्गत दंड
BNS धारा 353 के तहत दोषी पाए जाने पर निम्न दंड दिए जा सकते हैं:
उपधारा (1): सजा:- 3 वर्ष के लिए कारावास या जुर्माना, या दोनों
अपराध:- असंज्ञेय
जमानत:- अजमानतीय
विचारणीय:- कोई भी मजिस्ट्रेट द्वारा विचारणीय
अशमनीय:- अशमनीय का मतलब है, ऐसा अपराध जिसके लिए कोई समझौता या सेटलमेंट संभव नही है।
उपधारा (2): सजा:- 3 वर्ष के लिए कारावास या जुर्माना, या दोनों
अपराध:- संज्ञेय
जमानत:- अजमानतीय
विचारणीय:- कोई भी मजिस्ट्रेट द्वारा विचारणीय
अशमनीय:- अशमनीय का मतलब है, ऐसा अपराध जिसके लिए कोई समझौता या सेटलमेंट संभव नही है।
उपधारा (3): सजा:- 5 वर्ष के लिए कारावास और जुर्माना
अपराध:- संज्ञेय
जमानत:- अजमानतीय
विचारणीय:- कोई भी मजिस्ट्रेट द्वारा विचारणीय
अशमनीय:- अशमनीय का मतलब है, ऐसा अपराध जिसके लिए कोई समझौता या सेटलमेंट संभव नही है।
दंड की मात्रा इस बात पर निर्भर करती है कि अपराध कितना गंभीर था और उसका प्रभाव कितना व्यापक था।
व्यावहारिक उदाहरण
धारा 353 को बेहतर समझने के लिए कुछ उदाहरण देखें:
उदाहरण 1
कोई व्यक्ति सोशल मीडिया पर यह अफवाह फैलाता है कि “किसी शहर में दंगा शुरू हो गया है”, जबकि ऐसा नहीं हुआ। इससे लोग डर जाते हैं और अफरा-तफरी फैल जाती है।
➡️ यह धारा 353 के तहत अपराध है।
उदाहरण 2
किसी बीमारी को लेकर झूठी खबर फैलाई जाती है कि “यह बीमारी बहुत तेजी से फैल रही है और सरकार इसे छुपा रही है।”
➡️ इससे जनता में भय उत्पन्न होता है — यह भी इस धारा के अंतर्गत आएगा।
उदाहरण 3
कोई व्यक्ति बैंक के बारे में झूठी खबर फैलाता है कि “बैंक दिवालिया हो गया है।”
➡️ इससे लोग पैसा निकालने लगते हैं और आर्थिक अस्थिरता पैदा होती है — यह भी अपराध है।
IPC से BNS में बदलाव
पहले इस प्रकार के अपराध IPC की धारा 505 (Public Mischief) के अंतर्गत आते थे। BNS में इसे अधिक स्पष्ट और आधुनिक रूप में प्रस्तुत किया गया है।
मुख्य बदलाव:
🔺डिजिटल माध्यम (सोशल मीडिया) को ध्यान में रखा गया
🔺भाषा को अधिक सरल और स्पष्ट बनाया गया
🔺दंड और अपराध की परिभाषा को अपडेट किया गया
धारा 353 और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता
भारत का संविधान प्रत्येक नागरिक को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता देता है, लेकिन यह स्वतंत्रता पूर्ण नहीं है।
◾कब लागू नहीं होगी धारा 353?
🔸यदि व्यक्ति ने सच्ची जानकारी दी हो
🔸यदि वक्तव्य से कोई सार्वजनिक नुकसान नहीं हुआ हो
🔸यदि बयान सद्भावना (Good Faith) में दिया गया हो
◾कब लागू होगी?
🔹जब वक्तव्य झूठा हो
🔹जब उससे समाज में डर या भ्रम फैले
🔹जब व्यक्ति को पता हो कि उसका बयान नुकसान पहुंचा सकता है
सोशल मीडिया और धारा 353
आज के समय में यह धारा विशेष रूप से सोशल मीडिया पर लागू होती है, जैसे:-
√ WhatsApp पर फर्जी मैसेज फैलाना
√ Facebook/Instagram पर अफवाह पोस्ट करना
√ YouTube या अन्य प्लेटफॉर्म पर भ्रामक वीडियो बनाना
सरकार और पुलिस अब डिजिटल ट्रैकिंग के माध्यम से ऐसे अपराधों पर कड़ी नजर रखती है।
बचाव (Defense) क्या हो सकता है?
यदि किसी व्यक्ति पर धारा 353 के तहत आरोप लगता है, तो वह निम्न आधार पर बचाव कर सकता है:
> वक्तव्य सत्य था
> कोई दुर्भावना नहीं थी
> सार्वजनिक शांति प्रभावित नहीं हुई
> गलती से जानकारी साझा हुई
न्यायालय का दृष्टिकोण
भारतीय न्यायालय इस प्रकार के मामलों में संतुलन बनाए रखते हैं:
● एक ओर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता
● दूसरी ओर समाज की सुरक्षा
न्यायालय यह देखता है कि क्या वास्तव में वक्तव्य से समाज में कोई खतरा उत्पन्न हुआ या नहीं।
FAQ (अक्सर पूछे जाने वाले सवाल)
Q1. क्या मजाक में अफवाह फैलाना भी अपराध है?
Ans :- हाँ, यदि उससे समाज में डर या भ्रम पैदा होता है, तो यह अपराध हो सकता है।
Q2. क्या पहली बार गलती होने पर सजा मिलती है?
Ans :- यह न्यायालय के विवेक पर निर्भर करता है, लेकिन कानून लागू हो सकता है।
Q3. क्या सोशल मीडिया पोस्ट पर भी धारा 353 लग सकती है?
Ans :- हाँ, बिल्कुल। डिजिटल प्लेटफॉर्म भी इस धारा के अंतर्गत आते हैं।
निष्कर्ष
BNS की धारा 353 समाज में शांति और व्यवस्था बनाए रखने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण प्रावधान है। यह कानून यह सुनिश्चित करता है कि कोई भी व्यक्ति झूठी या भ्रामक जानकारी फैलाकर जनता में भय या भ्रम न पैदा करे।
डिजिटल युग में, जहां सूचना तेजी से फैलती है, हर नागरिक की जिम्मेदारी है कि वह किसी भी जानकारी को साझा करने से पहले उसकी सत्यता की जांच करे। अन्यथा, अनजाने में भी वह कानूनी कार्रवाई का सामना कर सकता है।
(IPC) की धारा 505 को (BNS) की धारा 353 में बदल दिया गया है। - अगर आप चाहे तो लोगो पर क्लिक करके देख सकते है |
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