1. प्रस्तावना
भारतीय न्याय संहिता (BNS) ने पारंपरिक दंड कानूनों का आधुनिकीकरण करते हुए कूटकरण (forgery) से जुड़े अपराधों को अधिक स्पष्ट और कड़े प्रावधानों के साथ व्यवस्थित किया है। BNS की धारा 342 विशेष रूप से उन मामलों पर लागू होती है, जहाँ धारा 338 में वर्णित दस्तावेजों के अधिप्रमाणीकरण (authentication) के लिए प्रयुक्त अभिलक्षणा/चिह्न की कूटकृति बनाई जाती है या ऐसे कूटकृत चिह्नयुक्त पदार्थ को जानबूझकर कब्जे में रखा जाता है।
यह प्रावधान न्यायिक, वित्तीय और प्रशासनिक तंत्र की विश्वसनीयता की रक्षा के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।
2. धारा 342 का उद्देश्य
धारा 342 का मुख्य उद्देश्य उन व्यक्तियों को दंडित करना है जो—
किसी मूल्यवान प्रतिभूति, वसीयत, न्यायालय अभिलेख आदि (जिनका उल्लेख धारा 338 में है) के अधिप्रमाणीकरण हेतु प्रयुक्त सील, स्टाम्प, हस्ताक्षर-चिह्न, मुहर या अन्य अभिलक्षणा की कूटकृति बनाते हैं, या
ऐसे कूटकृत चिह्नयुक्त पदार्थ को इस आशय से अपने पास रखते हैं कि उसका उपयोग असली के रूप में किया जाए।
3. पूरे लेख के मूल प्रावधान (मूल अधिनियम का पाठ):-
धारा 338 में वर्णित दस्तावेजों के अधिप्रमाणीकरण के लिए उपयोग में लाई जाने वाली अभिलक्षणा या चिह्न की कूटकृति बनाना या कूटकृत चिह्नयुक्त पदार्थ को कब्जे में रखना. -
(1) जो कोई किसी पदार्थ के ऊपर, या उसके उपादान में, किसी ऐसो अभिलक्षणा या चिह्न की, जिसे इस संहिता की धारा 338 में वर्णित किसी दस्तावेज के अधिप्रमाणीकरण के प्रयोजन के लिए, उपयोग में लाया जाता हो, कूटकृति यह आशय रखते हुए बनाएगा कि ऐसी अभिलक्षणा या ऐसे चिह्न की, ऐसे पदार्थ पर उस समय कूटरचित की जा रही या उसके पश्चात् कूटरचित की जाने वाली किसी दस्तावेज को अधिप्रमाणीकृत का आभास प्रदान करने के प्रयोजन से उपयोग में लाया जाएगा या जो ऐसे आशय से कोई ऐसा पदार्थ अपने कब्जे में रखेगा, जिस पर या जिसके उपादान में ऐसी अभिलक्षणा को या ऐसे चिह्न की कूटकृति बनाई गई हो, वह आजीवन कारावास से, या दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि सात वर्ष तक की हो सकेगी, दण्डित किया जाएगा, और जुर्माने का भी दायी होगा।
(2) जो कोई किसी पदार्थ के ऊपर, या उसके उपादान में, किसी ऐसी अभिलक्षणा या चिन्ह की, जिसे इस संहिता की धारा 338 में वर्णित दस्तावेजों से भिन्न किसी दस्तावेज या इलैक्ट्रानिक अभिलेख के अधिप्रमाणीकरण के प्रयोजन के लिए, उपयोग में लाया जाता हो, कूटकृति यह आशय रखते हुए बनाएगा कि वह ऐसी अभिलक्षणा या ऐसे चिन्ह को, ऐसे पदार्थ पर उस समय कूटरचित की जा रही या उसके पश्चात् कूटरचित की जाने वाली किसी दस्तावेज को अधिप्रमाणीकृत का आभास प्रदान करने के प्रयोजन से उपयोग में लाया जाएगा या जो ऐसे आशय से कोई ऐसा पदार्थ अपने कब्जे में रखेगा, जिस पर या जिसके उपादान में ऐसी अभिलक्षणा या ऐसे चिन्ह की कूटकृति बनाई गई हो, वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि सात वर्ष तक की हो सकेगी, दण्डित किया जाएगा और जुर्माने का भी दायी होगा।
4. “अधिप्रमाणीकरण चिह्न” का अर्थ
अधिप्रमाणीकरण चिह्न (Authentication Mark) से आशय है—
🔸सरकारी/अदालती मुहर
🔸अधिकृत अधिकारी का डिजिटल/हस्ताक्षर चिह्न
🔸विशेष सुरक्षा स्टाम्प या सील
🔸प्रमाणन हेतु प्रयुक्त विशिष्ट प्रतीक
यदि इनका नकली निर्माण किया जाता है या नकली चिह्न लगे कागज़/मटेरियल को जानबूझकर रखा जाता है, तो यह धारा 342 के अंतर्गत अपराध है।
5. धारा 338 से संबंध
भारतीय न्याय संहिता की धारा 338 में मूल्यवान प्रतिभूति, वसीयत, न्यायालय अभिलेख जैसे महत्वपूर्ण दस्तावेजों की कूटरचना को दंडनीय बताया गया है।
धारा 342 उसी का विस्तार है—
यदि कोई व्यक्ति ऐसे दस्तावेजों के प्रमाणीकरण के लिए प्रयुक्त चिह्न को ही नकली बना दे, तो यह एक गंभीर और स्वतंत्र अपराध बन जाता है।
6. अपराध के आवश्यक तत्व (Ingredients)
अभियोजन पक्ष को निम्न बिंदु सिद्ध करने होते हैं—
🔻संबंधित दस्तावेज धारा 338 में वर्णित श्रेणी का हो।
🔻अभियुक्त ने अधिप्रमाणीकरण चिह्न की कूटकृति बनाई हो, या
🔻कूटकृत चिह्नयुक्त पदार्थ को कब्जे में रखा हो।
🔻अभियुक्त का आशय (mens rea) उसे असली के रूप में उपयोग करने का हो।
7. सजा और दंड
धारा 342 के अंतर्गत—
उपधारा (1) :- सजा:- आजीवन कारावास, या 7 वर्ष के लिए कारावास और जुर्माना
अपराध:- असंज्ञेय
जमानत:- जमानतीय
विचारणीय:- प्रथम वर्ग मजिस्ट्रेट द्वारा विचारणीय
अशमनीय:- अशमनीय का मतलब है, ऐसा अपराध जिसके लिए कोई समझौता या सेटलमेंट संभव नहीं है।
उपधारा (2) :- 7 वर्ष के लिए कारावास और जुर्माना
अपराध:- असंज्ञेय
जमानत:- अजमानतीय
विचारणीय:- प्रथम वर्ग मजिस्ट्रेट द्वारा विचारणीय
अशमनीय:- अशमनीय का मतलब है, ऐसा अपराध जिसके लिए कोई समझौता या सेटलमेंट संभव नहीं है।
अदालत अपराध की गंभीरता, दस्तावेज के महत्व और धोखाधड़ी की मंशा को ध्यान में रखकर सजा तय करती है।
8. उदाहरण से समझें
उदाहरण 1:
कोई व्यक्ति न्यायालय के आदेश पर लगने वाली आधिकारिक मुहर की नकली मुहर बनाकर फर्जी आदेश तैयार करता है।
उदाहरण 2:
कोई व्यक्ति बैंक गारंटी पर लगने वाले विशेष सुरक्षा स्टाम्प का नकली संस्करण बनाकर उसे अपने पास रखता है, ताकि भविष्य में उपयोग कर सके।
दोनों ही स्थितियों में धारा 342 लागू हो सकती है।
9. जांच और साक्ष्य
जांच के दौरान—
🔹फोरेंसिक जांच से चिह्न की सत्यता की पुष्टि
🔹जब्ती पंचनामा
🔹विशेषज्ञ गवाही
🔹डिजिटल रिकॉर्ड (यदि ई-सील/ई-हस्ताक्षर हो)
🔹महत्वपूर्ण साक्ष्य होते हैं।
10. बचाव (Defence Strategy)
यदि किसी आरोपी पर धारा 342 का आरोप लगे, तो संभावित बचाव—
🔻अज्ञानता (Lack of Knowledge): आरोपी को कूटकृति की जानकारी नहीं थी।
🔻आशय का अभाव: असली के रूप में उपयोग का इरादा सिद्ध न हो।
🔻जब्ती में त्रुटि: तलाशी/जब्ती प्रक्रिया में कानूनी कमी।
🔻साक्ष्य की कमजोरी: फोरेंसिक रिपोर्ट में स्पष्टता का अभाव।
11. संबंधित अन्य धाराएँ
◾भारतीय न्याय संहिता की धारा 337
◾भारतीय न्याय संहिता की धारा 339
◾भारतीय न्याय संहिता की धारा 340
◾ये धाराएँ मिलकर कूटरचना से संबंधित अपराधों का व्यापक ढांचा बनाती हैं।
12. निष्कर्ष
BNS की धारा 342 अधिप्रमाणीकरण तंत्र की सुरक्षा सुनिश्चित करने वाली एक महत्वपूर्ण कानूनी व्यवस्था है। यह न केवल फर्जी दस्तावेजों को, बल्कि उनके प्रमाणीकरण के साधनों की कूटकृति को भी दंडित करती है।
आज के डिजिटल और दस्तावेज-आधारित प्रशासनिक ढांचे में इस धारा का महत्व और भी बढ़ गया है। यदि आप किसी ऐसे मामले में पक्षकार हैं, तो तथ्य, साक्ष्य और आशय—इन तीनों पहलुओं पर विशेष ध्यान देना आवश्यक है।
| (IPC) की धारा 475, 476 को (BNS) की धारा 342 में बदल दिया गया है। - अगर आप चाहे तो लोगो पर क्लिक करके देख सकते है |
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