घरेलू हिंसा अधिनियम के अंतर्गत पीड़ित महिला न्यायालय में आवेदन देकर कानूनी सुरक्षा प्राप्त कर सकती है। मुकदमे की शुरुआत प्रार्थना पत्र दाखिल करने से होती है, जिसके बाद न्यायालय प्रतिवादी को नोटिस जारी करता है। दोनों पक्षों की सुनवाई, साक्ष्य और दस्तावेज प्रस्तुत किए जाते हैं। आवश्यकता पड़ने पर अंतरिम भरण-पोषण, निवास अधिकार और सुरक्षा आदेश भी दिए जा सकते हैं। सभी तथ्यों की जांच के बाद न्यायालय अंतिम आदेश पारित करता है। यह प्रक्रिया महिलाओं को शारीरिक, मानसिक, आर्थिक और भावनात्मक उत्पीड़न से कानूनी संरक्षण प्रदान करने के उद्देश्य से बनाई गई है।
1. शिकायत / आवेदन देना
पीड़ित महिला:- • महिला थाना, • संरक्षण अधिकारी (Protection Officer), या सीधे न्यायालय में आवेदन देती है।
आवेदन में सामान्यतः- • मारपीट, • गाली-गलौज • खर्चा न देना, • घर से निकालना, • दहेज प्रताड़ना आदि बातें लिखी जाती हैं।
2. धारा 12 DV Act के तहत केस दाखिल (धारा 12 – न्यायालय में आवेदन)
महिला की ओर से वकील न्यायिक मजिस्ट्रेट की अदालत में आवेदन दाखिल करता है। इसके साथ:- • पहचान पत्र, • विवाह से जुड़े दस्तावेज, • मेडिकल रिपोर्ट, • चैट/ऑडियो/फोटो आदि लगाए जा सकते हैं।
3. केस नंबर व पहली तारीख
कोर्ट केस दर्ज करके:- • केस नंबर देती है, • अगली तारीख लगाती है, • प्रतिवादी (पति/ससुराल पक्ष) को नोटिस जारी करती है।
4. नोटिस तामील (धारा 13 – नोटिस जारी)
कोर्ट का नोटिस:- • पुलिस, • संरक्षण अधिकारी, • कोर्ट कर्मचारी द्वारा प्रतिवादी तक पहुँचाया जाता है
यदि नोटिस नहीं मिलता तो:- • पुनः नोटिस, • अखबार प्रकाशन जैसी प्रक्रिया हो सकती है।
5. प्रतिवादी की अदालत में उपस्थिति
• पति या अन्य प्रतिवादी कोर्ट में उपस्थित होकर वकील करते हैं, • वकालतनामा दाखिल करते हैं।
6. Written Statement / जवाब दाखिल
प्रतिवादी अपना लिखित जवाब दाखिल करता है।
इसमें सामान्यत:- आरोपों से इंकार, अलग रहने का कारण, आय संबंधी बातें, झूठे मुकदमे का आरोप
लिखा जाता है।
7. अंतरिम आवेदन (Interim Relief) (धारा 23 — अंतरिम आदेश)
महिला अक्सर शुरुआत में ही मांग करती है:- • अंतरिम भरण-पोषण, • रहने का अधिकार, • सुरक्षा आदेश, • बच्चों का खर्च, • मेडिकल खर्च, कोर्ट प्रारंभिक सुनवाई के बाद अंतरिम आदेश दे सकती है।
8. काउंसलिंग (Sec. 14)
न्यायालय आवश्यक समझे तो पक्षों को काउंसलिंग/मेडिएशन के लिए भेज सकता है। समझौता होने पर मामला निस्तारित हो सकता है।
9. Evidence / साक्ष्य चरण
यह मुकदमे का सबसे महत्वपूर्ण भाग होता है।
(A) महिला का साक्ष्य:- महिला:- अपना शपथपत्र दाखिल करती है, दस्तावेज प्रस्तुत करती है।, इसके बाद बचाव पक्ष जिरह करता है।
(B) प्रतिवादी का साक्ष्य:- पति/प्रतिवादी:- अपना साक्ष्य देते हैं, दस्तावेज दाखिल करते हैं, गवाह पेश कर सकते हैं।, फिर महिला पक्ष जिरह करता है।
10. Arguments / अंतिम बहस
दोनों पक्ष:- कानून, साक्ष्य, सुप्रीम कोर्ट/हाई कोर्ट के निर्णय के आधार पर बहस करते हैं।
11. अंतिम आदेश (Final Order)
कोर्ट निम्न आदेश दे सकती है:
(1) Protection Order ( महिला को परेशान करने से रोकना। ) (Sec. 18)
(2) Residence Order ( महिला को साझा घर में रहने का अधिकार देना। ) (Sec. 19)
(3) Monetary Relief ( भरण-पोषण, खर्चा, इलाज खर्च आदि देना। ) (Sec. 20)
(4) Custody Order ( बच्चों की अस्थायी कस्टडी देना।) (Sec. 21)
(5) Compensation Order ( मानसिक व शारीरिक उत्पीड़न का मुआवजा। ) (Sec. 22)
12. आदेश का पालन / आदेश उल्लंघन (धारा 31)
यदि प्रतिवादी आदेश नहीं मानता:- Execution, Recovery, वारंट, वेतन कुर्की जैसी कार्यवाही हो सकती है।
13. अपील (धारा 29)
यदि किसी पक्ष को आदेश गलत लगे तो वह:- सेशन कोर्ट में अपील कर सकता है। आमतौर पर अपील 30 दिनों के भीतर की जाती है।
घरेलू हिंसा केस में सामान्य अवधि
अंतरिम आदेश: 1–6 माह, पूरा मुकदमा: 1–3 वर्ष (स्थिति पर निर्भर)
📘 घरेलू हिंसा अधिनियम के अंतर्गत पीड़ित महिला न्यायालय में आवेदन देकर कानूनी सुरक्षा प्राप्त कर सकती है आसान प्रारूप, PDF
यह प्रक्रिया महिलाओं को शारीरिक, मानसिक, आर्थिक और भावनात्मक उत्पीड़न से कानूनी संरक्षण प्रदान करने के उद्देश्य से बनाई गई है। आप इसे ऑनलाइन देख सकते हैं तथा डाउनलोड भी कर सकते हैं। ✍️⚖️
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