पूरे लेख का मूल प्रावधान (Bare Act Text):-
BSA 2023 की धारा - 3. विवाद्यक तथ्यों और सुसंगत तथ्यों का साक्ष्य दिया जा सकेगा:-
किसी वाद या कार्यवाही में हर विवाद्यक तथ्य के और ऐसे अन्य तथ्यों के, जिन्हें एतस्मिन, पश्चात् सुसंगत घोषित किया गया है, अस्तित्व या अनस्तित्व का साक्ष्य दिया जा सकेगा और किन्हीं अन्यों का नहीं।
व्याख्या:- यह धारा किसी व्यक्ति को ऐसे तथ्य का साक्ष्य देने के लिए योग्य नहीं बनाएगी, जिससे सिविल प्रक्रिया से सम्बन्धित किसी तत्समय प्रवृत्त विधि के किसी उपबन्ध द्वारा वह साबित करने से निर्हकित कर दिया गया है।
उदाहरण:- (क) राजेश की मृत्यु कारित करने के आशय से उसे लाठी मार कर उसकी हत्या कारित करने के लिए मोहन का विचारण किया जाता है।
मोहन के विचारण में निम्नलिखित तथ्य विवाद्य है-
• मोहन का राजेश को लाठी से मारना;
• मोहन का ऐसी मार द्वारा राजेश की मृत्यु कारित करना;
• राजेश की मृत्यु कारित करने का मोहन का आशय।
(ख) एक वादकर्ता अपने साथ वह बन्धपत्र, जिस पर वह निर्भर करता है, मामले की पहली सुनवाई पर अपने साथ नहीं लाता और पेश करने के लिए तैयार नहीं रखता। यह धारा उसे इस योग्य नहीं बनाती कि सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (1908 का 5) द्वारा विहित शर्तों के अनुकूल वह उस कार्यवाही के उत्तरवर्ती प्रक्रम में उस बन्धपत्र को पेश कर सके या उसकी अन्तर्वस्तु को साबित कर सके।
BSA 2023 की धारा 3 : विवाद्यक तथ्यों और सुसंगत तथ्यों का साक्ष्य दिया जा सकेगा
भारतीय न्याय व्यवस्था में साक्ष्य का अत्यधिक महत्व है। किसी भी दीवानी या आपराधिक मुकदमे में न्यायालय का निर्णय प्रस्तुत किए गए साक्ष्यों के आधार पर ही होता है। इसी उद्देश्य से भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 के स्थान पर भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023 (Bharatiya Sakshya Adhiniyam, 2023) लागू किया गया है। इस अधिनियम की धारा 3 यह निर्धारित करती है कि न्यायालय में किन तथ्यों का साक्ष्य प्रस्तुत किया जा सकता है।
धारा 3 का उद्देश्य
धारा 3 का मुख्य उद्देश्य यह स्पष्ट करना है कि न्यायालय के समक्ष केवल उन्हीं तथ्यों का साक्ष्य स्वीकार किया जाएगा जो—
विवाद्यक तथ्य (Facts in Issue) हों, अथवा
सुसंगत तथ्य (Relevant Facts) हों।
अर्थात् किसी मुकदमे में ऐसे तथ्यों का साक्ष्य नहीं दिया जा सकता जिनका विवाद या उससे संबंधित परिस्थितियों से कोई संबंध न हो।
विवाद्यक तथ्य क्या होते हैं?
विवाद्यक तथ्य वे तथ्य होते हैं जिनके अस्तित्व या अनस्तित्व पर किसी व्यक्ति का अधिकार, दायित्व या उत्तरदायित्व निर्भर करता है। दूसरे शब्दों में, जिन तथ्यों का निर्णय न्यायालय को करना होता है, वे विवाद्यक तथ्य कहलाते हैं।
उदाहरण
यदि किसी व्यक्ति पर चोरी का आरोप लगाया गया है, तो निम्न तथ्य विवाद्यक होंगे—
• क्या अभियुक्त घटना स्थल पर उपस्थित था?
• क्या चोरी वास्तव में हुई थी?
• क्या चोरी अभियुक्त द्वारा की गई थी?
इन प्रश्नों से संबंधित तथ्यों का साक्ष्य न्यायालय में प्रस्तुत किया जा सकता है।
सुसंगत तथ्य क्या हैं?
सुसंगत तथ्य वे होते हैं जो सीधे विवाद्यक तथ्य न होकर भी उनसे किसी न किसी प्रकार जुड़े होते हैं तथा जिनसे विवाद्यक तथ्यों को सिद्ध या असिद्ध करने में सहायता मिलती है।
उदाहरण
यदि हत्या के मुकदमे में यह सिद्ध करना हो कि आरोपी घटना के समय घटनास्थल के पास मौजूद था, तो—
• मोबाइल लोकेशन,
• सीसीटीवी फुटेज,
• प्रत्यक्षदर्शी का बयान,
• आरोपी और मृतक के बीच पुरानी दुश्मनी,
आदि ऐसे तथ्य हो सकते हैं जो सुसंगत माने जाएंगे।
धारा 3 का कानूनी सिद्धांत
धारा 3 यह स्थापित करती है कि—
न्यायालय के समक्ष केवल विवाद्यक तथ्यों तथा उन तथ्यों का साक्ष्य प्रस्तुत किया जा सकता है जो विधि द्वारा सुसंगत घोषित किए गए हों।
इसका अर्थ यह है कि कोई भी पक्ष ऐसे तथ्यों का साक्ष्य नहीं दे सकता जिनका मुकदमे से कोई संबंध नहीं है। इससे न्यायालय का समय बचता है तथा मुकदमे की सुनवाई अनावश्यक विषयों से प्रभावित नहीं होती।
धारा 3 का महत्व
1. अनावश्यक साक्ष्यों पर रोक
धारा 3 यह सुनिश्चित करती है कि केवल वही साक्ष्य प्रस्तुत हों जिनका मामले से वास्तविक संबंध हो। इससे मुकदमे की प्रक्रिया सरल और प्रभावी बनती है।
2. न्यायिक प्रक्रिया में पारदर्शिता
जब केवल प्रासंगिक तथ्यों का साक्ष्य प्रस्तुत किया जाता है, तो न्यायालय निष्पक्ष और उचित निर्णय देने में सक्षम होता है।
3. समय और संसाधनों की बचत
असंबंधित तथ्यों पर बहस न होने से मुकदमों का निस्तारण अपेक्षाकृत शीघ्र हो सकता है।
4. साक्ष्य की विश्वसनीयता बढ़ाना
धारा 3 यह सुनिश्चित करती है कि निर्णय केवल उन तथ्यों पर आधारित हो जो वास्तव में विवाद से जुड़े हुए हैं।
धारा 3 का व्यावहारिक उदाहरण
मान लीजिए किसी व्यक्ति पर मारपीट का आरोप लगाया गया है। ऐसे मामले में—
विवाद्यक तथ्य:-
• क्या मारपीट हुई थी?
• क्या आरोपी घटना स्थल पर मौजूद था?
• क्या चोटें आरोपी द्वारा पहुंचाई गई थीं?
सुसंगत तथ्य:-
• घटनास्थल की वीडियो रिकॉर्डिंग।
• प्रत्यक्षदर्शियों के बयान।
• मेडिकल रिपोर्ट।
• आरोपी और पीड़ित के बीच पूर्व विवाद।
इन सभी तथ्यों का साक्ष्य न्यायालय में प्रस्तुत किया जा सकता है क्योंकि इनका संबंध सीधे या अप्रत्यक्ष रूप से विवाद्यक तथ्यों से है।
इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य का महत्व
BSA 2023 आधुनिक तकनीक को ध्यान में रखते हुए इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड को भी विशेष महत्व प्रदान करता है। मोबाइल रिकॉर्ड, ई-मेल, व्हाट्सएप चैट, सीसीटीवी फुटेज, वीडियो रिकॉर्डिंग तथा डिजिटल दस्तावेज भी सुसंगत तथ्य सिद्ध करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं, बशर्ते वे विधि के अनुसार स्वीकार्य हों।
न्यायालय की भूमिका
न्यायालय यह तय करता है कि कौन-सा तथ्य सुसंगत है और कौन-सा नहीं। यदि कोई पक्ष ऐसा साक्ष्य प्रस्तुत करता है जिसका मामले से कोई संबंध नहीं है, तो न्यायालय उसे स्वीकार करने से इंकार कर सकता है।
निष्कर्ष
भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023 की धारा 3 न्यायिक प्रक्रिया की आधारशिला मानी जाती है। यह धारा स्पष्ट करती है कि न्यायालय में केवल विवाद्यक तथ्यों तथा विधि द्वारा सुसंगत माने गए तथ्यों का ही साक्ष्य दिया जा सकता है। इसका उद्देश्य मुकदमे को अनावश्यक तथ्यों से मुक्त रखते हुए न्यायालय को सही और निष्पक्ष निर्णय तक पहुंचने में सहायता प्रदान करना है। आधुनिक डिजिटल युग में यह प्रावधान और भी महत्वपूर्ण हो गया है, क्योंकि अब इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य भी न्यायिक प्रक्रिया का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुके हैं।
(IEA) की धारा 5 को (BSA) की धारा 3 में बदल दिया गया है। - अगर आप चाहे तो लोगो पर क्लिक करके देख सकते है |
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