पूरे लेख का मूल प्रावधान (Bare Act Text):-
2. परिभाषाएं. - (1) इस अधिनियम में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो, -
(ठ) "उपधारणा करेगा" जहां कहीं इस अधिनियम द्वारा यह निर्दिष्ट है कि न्यायालय किसी तथ्य की उपधारणा करेगा, वहां न्यायालय ऐसे तथ्य को साबित मानेगा यदि और जब तक वह नासाबित नहीं किया जाता है।
(2) इसमें प्रयुक्त शब्द और पद, जो इस अधिनियम में परिभाषित नहीं हैं किंतु सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 (2000 का 21), भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 और भारतीय न्याय संहिता, 2023 में परिभाषित हैं, का क्रमशः वही अर्थ होगा, जो उनका उक्त अधिनियम और संहिता में है।
BSA धारा 2(1)(l) – “उपधारणा करेगा” का अर्थ, महत्व और उदाहरण
भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023 (Bharatiya Sakshya Adhiniyam, 2023) की धारा 2(1)(l) में “उपधारणा करेगा” (Shall Presume) शब्द को परिभाषित किया गया है। यह साक्ष्य कानून की एक महत्वपूर्ण अवधारणा है, जिसका उद्देश्य न्यायालय को कुछ परिस्थितियों में किसी तथ्य को प्रारम्भिक रूप से सत्य मानने का अधिकार देना है। धारा 2(1)(l) के अनुसार, जब अधिनियम यह निर्देश देता है कि न्यायालय किसी तथ्य के संबंध में “उपधारणा करेगा”, तब न्यायालय उस तथ्य को सिद्ध (Proved) मानेगा, जब तक कि उसके विपरीत साक्ष्य प्रस्तुत कर उसे गलत साबित न कर दिया जाए।
सरल शब्दों में समझें तो “उपधारणा करेगा” का अर्थ है कि कानून न्यायालय को किसी तथ्य को सही मानने के लिए बाध्य करता है। हालांकि यह अंतिम निष्कर्ष नहीं होता, क्योंकि विरोधी पक्ष को उस उपधारणा को खंडित करने का अवसर दिया जाता है। यदि पर्याप्त और विश्वसनीय साक्ष्य प्रस्तुत कर दिए जाते हैं, तो न्यायालय उस उपधारणा को अस्वीकार भी कर सकता है।
“उपधारणा करेगा” और “उपधारणा कर सकता है” में अंतर
साक्ष्य कानून में “उपधारणा करेगा” (Shall Presume) और “उपधारणा कर सकता है” (May Presume) दोनों अलग-अलग अवधारणाएँ हैं। “May Presume” के मामले में न्यायालय के पास विवेकाधिकार होता है कि वह तथ्य को माने या अतिरिक्त प्रमाण मांगे। जबकि “Shall Presume” में न्यायालय को उस तथ्य को सत्य मानना पड़ता है, जब तक कि उसका खंडन न हो जाए। इसलिए “Shall Presume” को अधिक मजबूत कानूनी उपधारणा माना जाता है।
एक सरल उदाहरण
मान लीजिए किसी कानून में यह प्रावधान है कि न्यायालय किसी दस्तावेज़ की सत्यता के बारे में “उपधारणा करेगा”। ऐसी स्थिति में न्यायालय प्रारम्भ में उस दस्तावेज़ को सही मानेगा। यदि दूसरा पक्ष यह सिद्ध कर दे कि दस्तावेज़ जाली, फर्जी या त्रुटिपूर्ण है, तो न्यायालय उस उपधारणा को समाप्त कर सकता है।
न्यायालय में इसका महत्व
धारा 2(1)(l) न्यायिक प्रक्रिया को अधिक प्रभावी और व्यावहारिक बनाती है। प्रत्येक तथ्य को अलग-अलग सिद्ध करना हमेशा संभव नहीं होता। इसलिए कानून कुछ परिस्थितियों में न्यायालय को प्रारम्भिक विश्वास की सुविधा देता है, जिससे समय की बचत होती है और मामलों का शीघ्र निस्तारण संभव हो पाता है। साथ ही, विरोधी पक्ष के अधिकार भी सुरक्षित रहते हैं क्योंकि उसे उपधारणा के विरुद्ध साक्ष्य प्रस्तुत करने का अवसर मिलता है।
निष्कर्ष
BSA की धारा 2(1)(l) “उपधारणा करेगा” साक्ष्य कानून का एक महत्वपूर्ण प्रावधान है। इसके अनुसार न्यायालय किसी तथ्य को सिद्ध मानेगा, जब तक कि उसके विपरीत प्रमाण प्रस्तुत न किए जाएँ। यह नियम न्यायिक कार्यवाही को सरल, त्वरित और प्रभावी बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है तथा न्याय और प्रक्रिया के बीच संतुलन स्थापित करता है।
(IEA) की धारा 4 को (BSA) की धारा 2(1)L में बदल दिया गया है। - अगर आप चाहे तो लोगो पर क्लिक करके देख सकते है |
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