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BSA 2023 की धारा 12 क्या है? | मन या शरीर की दशा से संबंधित तथ्य की पूरी जानकारी

BSA 2023 की धारा 12 क्या है? | मन या शरीर की दशा से संबंधित तथ्य की पूरी जानकारी
काल्पनिक चित्र


भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023 (Bharatiya Sakshya Adhiniyam, 2023) की धारा 12 उन तथ्यों से संबंधित है जो किसी व्यक्ति की मानसिक स्थिति (State of Mind), शारीरिक स्थिति (State of Body) अथवा शारीरिक संवेदना (Bodily Feeling) को प्रदर्शित करते हैं।

जब किसी न्यायालय के सामने यह प्रश्न हो कि किसी व्यक्ति का इरादा क्या था, उसका ज्ञान कितना था, उसकी सद्भावना थी या नहीं, वह भयभीत था या नहीं, अथवा उसे दर्द, बीमारी या अन्य शारीरिक परेशानी थी या नहीं, तब ऐसे तथ्यों को साक्ष्य के रूप में प्रस्तुत किया जा सकता है।

यह धारा इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि कई अपराधों में केवल घटना ही नहीं बल्कि अभियुक्त या पीड़ित की मानसिक और शारीरिक स्थिति भी न्यायालय के निर्णय को प्रभावित करती है।


Bare Act में लिखी हुई मूल भाषा (Bare Act Text):- 


BSA 2023 की धारा :- 12. मन या शरीर की दशा या शारीरिक संवेदना का अस्तित्व दर्शित करने वाले तथ्य:- 

मन की कोई भी दशा जिसे आशय, ज्ञान, सद्भाव, उपेक्षा उतावलापन किसी विशिष्ट व्यक्ति के प्रति वैमनस्य या सदिच्छा दर्शित करने वाले अथवा शरीर की या शारीरिक संवेदना की किसी दशा का अस्तित्व दर्शित करने वाले तथ्य तब संसुगत हैं, जब कि ऐसी मन की या शरीर की या शारीरिक संवेदन की किसी ऐसी दशा का अस्तित्व विवाद्यक या सुसंगत है।

व्याख्या:- 1. जो इस नाते सुसंगत हैं कि वह मन की सुसंगत दशा के अस्तित्व को दर्शित करता है उससे यह दर्शित होना ही चाहिए कि मन की वह दशा साधारणतः नहीं, अपितु प्रश्नगत विषय के बारे में, अस्तित्व में है।

व्याख्या:- 2.  किन्तु जब कि किसी अपराध के अभियुक्त व्यक्ति के विचारण में इस धारा के अर्थ के अन्तर्गत उस अभियुक्त द्वारा किसी अपराध का कभी पहले किया जाना सुसंगत हो, तब ऐसे व्यक्ति की पूर्व दोषसिद्धि भी सुसंगत तथ्य होगी।

उदाहरण:- (क) जावेद चुराया हुआ माल यह जानते हुए कि वह चुराया हुआ है, प्राप्त करने का अभियुक्त है। यह साबित कर दिया जाता है कि उसके कब्जे में कोई विशिष्ट चुराई हुई चीज थी। यह तथ्य कि उसी समय उसके कब्जे में कई अन्य चुराई हुई चीजें थीं यह दर्शित करने की प्रवृत्ति रखने वाला होने के नाते सुसंगत है कि जो चीजें उसके कब्जे में थीं उनमें से हर एक और सब के बारे में यह जानता था कि वह चुराई हुई हैं।

(ख) रंजीत पर किसी अन्य व्यक्ति को कूटकृत मुद्रा के कपटपूर्वक परिदान करने का अभियोग, है, जिसे वह परिदान करते समय जानता था कि वह कूटकृत है। यह तथ्य कि उसके परिदान के समय रंजीत के कब्जे में वैसी ही दूसरी कूटकृत मुद्रा थी, सुसंगत है। यह तथ्य कि रंजीत एक कूटकृत मुद्रा को, यह जानते हुए कि वह मुद्रा कूटकृत है, उसे असली के रूप में किसी अन्य व्यक्ति को परिदान करने के लिए पहले भी दोषसिद्ध हुआ था, सुसंगत हैं।

(ग) रंजीत के कुत्ते द्वारा, जिसका हिंसक होना रंजीत जानता था, किए गए नुकसान के लिए रंजीत पर श्याम वाद लाता है। ये तथ्य कि कुत्ते ने पहले, राजू, जावेद और जीतू को काटा था और यह कि उन्होंने रंजीत से शिकायतें की थीं, सुसंगत हैं।

(घ) प्रश्न यह है कि क्या विनिमयपत्र का प्रतिगृहीता सुरेश यह जानता था कि उसके पाने वाले का नाम काल्पनिक है। यह तथ्य कि सुरेश ने उसी प्रकार से लिखित अन्य विनिमयपत्रों को इसके पहले कि वे पाने वाले द्वारा, यदि पाने वाला वास्तविक व्यक्ति होता तो, उसको पारेषित किए जा सकते, प्रतिगृहीत किया था, यह दर्शित करने के नाते सुसंगत है कि सुरेश यह जानता था कि पाने वाला व्यक्ति काल्पनिक है।

(ङ) रंजीत पर सुरेश की ख्याति की अपहानि करने के आशय से एक लांछन प्रकाशित करके सुरेश की मानहानि करने का अभियोग है। यह तथ्य कि सुरेश के बारे में रंजीत ने पूर्व प्रकाशन किए, जिनसे सुरेश के प्रति रंजीत का वैमनस्य दर्शित होता है, इस कारण सुसंगत है कि उससे प्रश्नगत विशिष्ट प्रकाशन द्वारा सुरेश की ख्याति की अपहानि करने का रंजीत का आशय साबित होता है। ये तथ्य कि रंजीत और सुरेश के बीच पहले कोई झगड़ा नहीं हुआ और कि रंजीत ने परिवादग्रस्त बात को जैसा सुना था वैसा ही दुहरा दिया था, यह दर्शित करने के नाते कि रंजीत का आशय सुरेश की ख्याति की अपहानि करना नहीं था, सुसंगत है।

(च) प्रेमचंद द्वारा सोहन पर यह वाद लाया जाता है कि राजेश के बारे में सोहन ने प्रेमचंद से यह कपटपूर्वक व्यपदेशन किया कि राजेश शोधक्षम है जिससे उत्प्रेरित हो कर प्रेमचंद ने राजेश का, जो दिवालिया था, भरोसा किया और हानि उठाई। यह तथ्य कि जब सोहन ने राजेश को शोधक्षम व्यपदिष्ट किया था, तब राजेश को उसके पड़ोसी और उससे व्यौहार करने वाले व्यक्ति शोधक्षम समझते थे, यह दर्शित करने के नाते कि सोहन ने व्यपदेशन सद्भावपूर्वक किया था, सुसंगत है।

(छ) उमेश पर जगदीश उस काम की कीमत के लिए वाद लाता है जो ठेकेदार सोहन के आदेश से किसी गृह पर, जिसका उमेश स्वामी है, जगदीश ने किया था। उमेश का प्रतिवाद है कि जगदीश का ठेका सोहन के साथ था। यह तथ्य कि उमेश ने प्रश्नगत काम के लिए सोहन को कीमत दे दी इसलिए सुसंगत है कि उससे यह साबित होता है कि उमेश ने सद्भावपूर्वक सोहन को प्रश्नगत काम का प्रबन्ध दे दिया था, जिससे कि जगदीश के साथ सोहन अपने ही निमित, न कि उमेश के अभिकर्ता के रूप में, संविदा करने की स्थिति में था।

(ज) मोहित ऐसी सम्पत्ति का, जो उसने पड़ी पाई थी, बेइमानी से दुर्विनियोग करने का अभियुक्त है और प्रश्न यह है कि क्या जब उसने उसका विनियोग किया उसे सद्भावपूर्वक विश्वास था कि वास्तविक स्वामी मिल नहीं सकता। यह तथ्य कि सम्पत्ति के खो जाने की लोक सूचना उस स्थान में, जहां मोहित था, दी जा चुकी थी, यह दर्शित करने के नाते सुसंगत है कि मोहित को सद्भावपूर्वक यह विश्वास नहीं था कि उस सम्पत्ति का वास्तविक स्वामी मिल नहीं सकता। यह तथ्य कि मोहित यह जानता था या उसके पास यह विश्वास करने का कारण था कि सूचना कपटपूर्वक उमेश द्वारा दी गई थी जिसने सम्पत्ति की हानि के बारे में सुन रखा था और जो उस पर मिथ्या दावा करने का इच्छुक था यह दर्शित करने के नाते सुसंगत है कि मोहित का सूचना के बारे में ज्ञान मोहित के सद्भाव को नासाबित नहीं करता।

(झ) हरिओम पर मोहित को मार डालने के आशय से उस पर असन करने का अभियोग है। हरिओम का आशय दर्शित करने के लिए यह तथ्य साबित किया जा सकेगा कि हरिओम ने पहले भी मोहित पर असन किया था। 

(ञ) राजू पर हरिओम को धमकी भरे पत्र भेजने का आरोप है। इन पत्रों का आशय दर्शित करने के नाते राजू द्वारा हरिओम को पहले भेजे गए धमकी भरे पत्र साबित किए जा सकेंगे।

(ट) प्रश्न यह है कि क्या राजू अपनी पत्नी सीता के प्रति क्रूरता का दोषी रहा है। अभिकथित क्रूरता के थोड़ी देर पहले या पीछे उनके एक दूसरे के प्रति भावना की अभिव्यक्तियां सुसंगत तथ्य हैं।

(ठ) प्रश्न यह है कि क्या राजू की मृत्यु विष से कारित की गई थी। अपनी रुग्णावस्था में राजू द्वारा अपने लक्षणों के बारे में किए हुए कथन सुसंगत तथ्य हैं।

(ड) प्रश्न यह है कि सूरज के स्वास्थ्य की दशा उस समय कैसी थी जिस समय उसके जीवन का बीमा कराया गया था। प्रश्नगत समय पर या उसके लगभग अपने स्वास्थ्य की दशा के बारे में सूरज द्वारा किए गए कथन सुसंगत तथ्य हैं।

(ढ) योगेश ऐसी उपेक्षा के लिए सूरज पर वाद लाता है जो सूरज ने उसे युक्तियुक्त रूप से अनुपयोग्य कार भाड़े पर देने द्वारा की जिससे योगेश को क्षति हुई थी। यह तथ्य की उस विशिष्ट कार को त्रुटि की ओर अन्य अवसरों पर भी सूरज का ध्यान आकृष्ट किया गया था, सुसंगत है। यह तथ्य कि सूरज उन कारों के बारे में, जिन्हें वह भाड़े पर देता था, अभ्यासतः उपेक्षावान था, विसंगत है।

(ण) मोहन साशय असन द्वारा योगेश की मृत्यु करने के कारण हत्या के लिए विचारित है। यह तथ्य कि मोहन ने अन्य अवसरों पर योगेश पर असन किया था, मोहन का योगेश पर असन करने का आशय दर्शित करने के नाते सुसंगत है। यह तथ्य कि मोहन लोगों पर उनकी हत्या करने के आशय से अमन करने का अभ्यासी था, विसंगत है।

(त) मोहन का किसी अपराध के लिए विचारण किया जाता है। यह तथ्य कि उसने कोई बात कही जिससे उस विशिष्ट अपराध के करने का आशय उपदर्शित होता है, सुसंगत है। यह तथ्य कि उसने कोई बात कही जिससे उस प्रकार के अपराध करने की उसकी साधारण प्रवृत्ति उपदर्शित होती है, विसंगत है।


धारा 12 का उद्देश्य

इस धारा का मुख्य उद्देश्य न्यायालय को यह समझने में सहायता देना है कि घटना के समय किसी व्यक्ति की वास्तविक मानसिक या शारीरिक स्थिति क्या थी।

कई बार अपराध केवल किसी कार्य से सिद्ध नहीं होता बल्कि उस कार्य के पीछे की मानसिक अवस्था भी महत्वपूर्ण होती है। उदाहरण के लिए—

• क्या आरोपी का अपराध करने का इरादा था? 

• क्या उसे पहले से जानकारी थी? 

• क्या उसने सद्भावना में कार्य किया? 

• क्या वह किसी भय या दबाव में था? 

• क्या पीड़ित वास्तव में घायल या बीमार था? 

ऐसे सभी प्रश्नों के उत्तर देने में धारा 12 महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।



मन की दशा (State of Mind) से क्या तात्पर्य है?

मन की दशा से आशय व्यक्ति के भीतर चल रही मानसिक स्थिति से है।

इसमें निम्नलिखित बातें शामिल हो सकती हैं—

• इरादा (Intention) 

• ज्ञान (Knowledge) 

• सद्भावना (Good Faith) 

• दुर्भावना (Malice) 

• लापरवाही (Negligence) 

• भय (Fear) 

• क्रोध (Anger) 

• प्रेम (Affection) 

• द्वेष (Hatred) 

• विश्वास (Belief) 

यदि इन बातों को दर्शाने वाले तथ्य उपलब्ध हैं तो उन्हें न्यायालय में प्रस्तुत किया जा सकता है।


शरीर की दशा (State of Body) क्या होती है?

शरीर की दशा का अर्थ व्यक्ति की शारीरिक स्थिति से है।

जैसे—

• बीमारी 

• गर्भावस्था 

• नशे की स्थिति 

• चोट 

• कमजोरी 

• विकलांगता 

• मानसिक या शारीरिक थकावट 

यदि कोई तथ्य इन अवस्थाओं को सिद्ध करता है तो वह इस धारा के अंतर्गत प्रासंगिक माना जाएगा।


शारीरिक संवेदना (Bodily Feeling) का अर्थ

शारीरिक संवेदना से आशय व्यक्ति द्वारा अनुभव किए जाने वाले शारीरिक एहसास से है।

उदाहरण—

• दर्द 

• जलन 

• भूख 

• प्यास 

• ठंड लगना 

• गर्मी लगना 

• चक्कर आना 

• कमजोरी महसूस होना 

यदि इन परिस्थितियों को दर्शाने वाले तथ्य उपलब्ध हों तो वे न्यायालय के समक्ष महत्वपूर्ण साक्ष्य बन सकते हैं।


धारा 12 के व्यावहारिक उदाहरण

उदाहरण:- (1) यदि किसी व्यक्ति पर हत्या का आरोप है और अभियोजन यह सिद्ध करना चाहता है कि आरोपी पहले से पीड़ित को मारने की योजना बना रहा था, तो आरोपी द्वारा पहले दी गई धमकियाँ, संदेश या अन्य व्यवहार उसके इरादे को दर्शा सकते हैं।

उदाहरण:- (2) यदि कोई व्यक्ति दावा करता है कि घटना के समय वह अत्यधिक बीमार था, तो डॉक्टर की रिपोर्ट, अस्पताल का रिकॉर्ड तथा दवाइयों का विवरण उसकी शारीरिक स्थिति को सिद्ध करने में सहायक होंगे।

उदाहरण:- (3) यदि कोई महिला यह कहती है कि उसे लंबे समय तक प्रताड़ित किया गया जिससे वह लगातार भय में रहती थी, तो उसके व्यवहार, शिकायतें, संदेश तथा गवाह उसके मानसिक भय को सिद्ध करने वाले तथ्य हो सकते हैं।

उदाहरण:- (4) यदि किसी व्यक्ति को गंभीर चोट लगी है और वह लगातार दर्द की शिकायत करता है, तो मेडिकल रिपोर्ट तथा चिकित्सकीय उपचार उसके शारीरिक दर्द का प्रमाण हो सकते हैं।


न्यायालय किन तथ्यों पर विचार करता है?

धारा 12 के अंतर्गत न्यायालय निम्नलिखित प्रकार के तथ्यों पर विचार कर सकता है—

• व्यक्ति का व्यवहार 

• बातचीत 

• लिखित दस्तावेज 

• मोबाइल संदेश 

• ई-मेल 

• चिकित्सकीय प्रमाण 

• विशेषज्ञ की राय 

• प्रत्यक्षदर्शियों के बयान 

• घटना से पहले और बाद की परिस्थितियाँ 

इन सभी तथ्यों को मिलाकर न्यायालय यह तय करता है कि संबंधित व्यक्ति की वास्तविक मानसिक या शारीरिक स्थिति क्या थी।


धारा 12 का महत्व

यह धारा न्यायालय को केवल बाहरी घटनाओं पर निर्भर रहने के बजाय व्यक्ति की वास्तविक मानसिक और शारीरिक स्थिति को समझने का अवसर देती है।

विशेष रूप से निम्न मामलों में इसका महत्व अधिक होता है—

• हत्या 

• आत्महत्या के लिए दुष्प्रेरण 

• घरेलू हिंसा 

• दहेज उत्पीड़न 

• बलात्कार 

• धोखाधड़ी 

• विश्वासघात 

• आपराधिक धमकी 

• मानसिक उत्पीड़न 

इन मामलों में आरोपी या पीड़ित की मानसिक अवस्था न्यायिक निर्णय को प्रभावित कर सकती है।


धारा 12 और न्यायिक निष्पक्षता

धारा 12 यह सुनिश्चित करती है कि न्यायालय केवल अनुमान के आधार पर निर्णय न दे, बल्कि उन तथ्यों को भी महत्व दे जो किसी व्यक्ति की मानसिक या शारीरिक स्थिति को स्पष्ट करते हैं।

इससे न्यायालय वास्तविक परिस्थितियों को समझकर अधिक न्यायसंगत निर्णय दे सकता है।


महत्वपूर्ण बिंदु

• धारा 12 मानसिक और शारीरिक स्थिति से जुड़े तथ्यों को प्रासंगिक मानती है। 

• व्यक्ति का इरादा, ज्ञान, भय, सद्भावना तथा दुर्भावना इस धारा के अंतर्गत आ सकते हैं। 

• बीमारी, दर्द, चोट तथा अन्य शारीरिक अवस्थाएँ भी इस धारा में शामिल हैं। 

• मेडिकल रिकॉर्ड, गवाह, व्यवहार तथा दस्तावेज महत्वपूर्ण साक्ष्य हो सकते हैं। 

यह धारा न्यायालय को वास्तविक परिस्थितियों को समझने में सहायता करती है।


निष्कर्ष

BSA 2023 की धारा 12 भारतीय साक्ष्य कानून की एक अत्यंत महत्वपूर्ण व्यवस्था है, क्योंकि यह किसी व्यक्ति की मानसिक स्थिति, शारीरिक दशा तथा शारीरिक संवेदना से संबंधित तथ्यों को न्यायालय में प्रासंगिक साक्ष्य के रूप में स्वीकार करने की अनुमति देती है। अनेक आपराधिक और दीवानी मामलों में न्यायालय का निर्णय केवल घटना पर नहीं बल्कि संबंधित व्यक्ति की मानसिक एवं शारीरिक अवस्था पर भी निर्भर करता है। इसलिए यह धारा न्यायिक प्रक्रिया को अधिक निष्पक्ष, तथ्यपरक और न्यायोचित बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।


FAQ (Frequently Asked Questions)

1. किन मामलों में धारा 12 का अधिक उपयोग होता है?
Ans:- धारा 12 का उपयोग हत्या, आत्महत्या के लिए दुष्प्रेरण, दहेज उत्पीड़न, घरेलू हिंसा, धोखाधड़ी, आपराधिक धमकी, बलात्कार और अन्य ऐसे मामलों में अधिक होता है, जहाँ मानसिक या शारीरिक स्थिति विवाद का महत्वपूर्ण हिस्सा होती है।

2. धारा 12 के अंतर्गत कौन-कौन से साक्ष्य प्रस्तुत किए जा सकते हैं?
Ans:- मेडिकल रिकॉर्ड, डॉक्टर की रिपोर्ट, गवाहों के बयान, पत्र, ई-मेल, मोबाइल संदेश, ऑडियो-वीडियो रिकॉर्डिंग, व्यवहार संबंधी परिस्थितियाँ तथा अन्य संबंधित दस्तावेज प्रस्तुत किए जा सकते हैं।

3. क्या धारा 12 केवल आपराधिक मामलों में लागू होती है?
Ans:- नहीं। यह धारा केवल आपराधिक मामलों तक सीमित नहीं है। जहाँ किसी व्यक्ति की मानसिक या शारीरिक स्थिति किसी विवादित तथ्य को सिद्ध करने के लिए प्रासंगिक हो, वहाँ दीवानी मामलों में भी इसका उपयोग किया जा सकता है।

4. BSA 2023 की धारा 12 न्यायालय के लिए क्यों महत्वपूर्ण है?
Ans:- यह धारा न्यायालय को किसी व्यक्ति की वास्तविक मानसिक और शारीरिक स्थिति को समझने में सहायता देती है, जिससे तथ्यों के आधार पर निष्पक्ष और न्यायसंगत निर्णय देना आसान हो जाता है।

5. क्या मेडिकल रिपोर्ट धारा 12 के अंतर्गत साक्ष्य हो सकती है?
Ans:- हाँ। यदि मेडिकल रिपोर्ट किसी व्यक्ति की शारीरिक स्थिति, चोट, बीमारी या दर्द को सिद्ध करती है और वह विवादित तथ्य से संबंधित है, तो उसे न्यायालय में महत्वपूर्ण साक्ष्य के रूप में स्वीकार किया जा सकता है।

6. क्या किसी व्यक्ति का व्यवहार भी धारा 12 के अंतर्गत प्रासंगिक हो सकता है?
Ans:- हाँ। यदि किसी व्यक्ति का व्यवहार उसकी मानसिक स्थिति, भय, इरादे या अन्य मानसिक अवस्था को दर्शाता है, तो न्यायालय उस व्यवहार को अन्य उपलब्ध साक्ष्यों के साथ विचार में ले सकता है।

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(IEA) की धारा 14 को (BSA) की धारा 12 में बदल दिया गया है। - अगर आप चाहे तो लोगो पर क्लिक करके देख सकते है

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