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Smt. Gudiya vs State of U.P. 2025: भरण-पोषण पर हाईकोर्ट का फैसला

Smt. Gudiya बनाम उत्तर प्रदेश सरकार Criminal Revision No. 6348 of 2023 में भरण-पोषण पर इलाहाबाद हाईकोर्ट का महत्वपूर्ण फैसला
Section 125 CrPC, maintenance case, Allahabad High Court


Smt. Gudiya vs State of U.P. and Another: भरण-पोषण के दावे पर इलाहाबाद हाईकोर्ट का महत्वपूर्ण फैसला

Smt. Gudiya vs State of U.P. and Another, Criminal Revision No. 6348 of 2023, भरण-पोषण से जुड़े मामलों में एक महत्वपूर्ण निर्णय है। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इस मामले में Family Court द्वारा पत्नी का Section 125 Cr.P.C. के तहत भरण-पोषण आवेदन खारिज किए जाने के विरुद्ध दाखिल आपराधिक पुनरीक्षण याचिका को खारिज कर दिया। निर्णय 17 नवंबर 2025 को न्यायमूर्ति मदन पाल सिंह द्वारा दिया गया और इसका Neutral Citation 2025:AHC:205032 है।

यह निर्णय खास तौर पर इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें अदालत ने पत्नी के अलग रहने के कारण, विवाह-विच्छेद से संबंधित कथित समझौते, दस्तावेजों में असंगतियों, कथित दूसरी शादी और सबसे महत्वपूर्ण रूप से revisional jurisdiction में साक्ष्य के पुनर्मूल्यांकन की सीमा पर विचार किया।


मामले की पृष्ठभूमि

इस मामले में श्रीमती गुड़िया ने अपने पति के विरुद्ध Section 125 Cr.P.C. के अंतर्गत भरण-पोषण का आवेदन Family Court, चंदौली में प्रस्तुत किया था। यह मामला Maintenance Case No. 82 of 2019 के रूप में चला।

Principal Judge, Family Court, Chandauli ने 31 अक्टूबर 2023 को पत्नी का भरण-पोषण आवेदन खारिज कर दिया। Family Court के निर्णय से असंतुष्ट होकर गुड़िया ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में Sections 397 और 401 Cr.P.C. के तहत Criminal Revision No. 6348 of 2023 दाखिल की।

पत्नी की ओर से मुख्य रूप से यह तर्क दिया गया कि Family Court ने उसके द्वारा लगाए गए आरोपों और अलग रहने के पर्याप्त कारणों पर उचित विचार नहीं किया। पत्नी ने यह भी कहा कि पति द्वारा प्रस्तुत कथित divorce agreement या पंचायत समझौते का कानून की नजर में कोई वैधानिक प्रभाव नहीं था।



पत्नी की ओर से क्या तर्क दिया गया?

Revisionist की ओर से हाईकोर्ट में यह तर्क रखा गया कि पति द्वारा पत्नी के साथ कथित क्रूरता की गई थी और इसी कारण वह अलग रहने के लिए विवश हुई। पत्नी का कहना था कि Family Court ने उसके पक्ष में प्रस्तुत मौखिक और दस्तावेजी साक्ष्य का सही मूल्यांकन नहीं किया।

पत्नी ने कथित divorce agreement/settlement को भी चुनौती दी। उसका कहना था कि अदालत के बाहर किया गया ऐसा समझौता वैध तलाक का स्थान नहीं ले सकता।

इसके अलावा पत्नी ने अपने पति द्वारा लगाए गए दूसरी शादी के आरोप से भी इनकार किया। उसका कहना था कि Family Court ने पति द्वारा प्रस्तुत सामग्री को गलत तरीके से स्वीकार कर लिया।



पति की ओर से क्या कहा गया?

विपक्षी पति की ओर से Revision का विरोध किया गया। उसका मुख्य पक्ष यह था कि Family Court ने उपलब्ध साक्ष्यों का उचित मूल्यांकन करने के बाद पत्नी का Section 125 Cr.P.C. का आवेदन खारिज किया था।

पति की ओर से यह भी कहा गया कि पत्नी स्वयं अपनी इच्छा से अलग रह रही थी और उसके अलग रहने का कोई पर्याप्त कानूनी कारण नहीं था। साथ ही, पति ने पत्नी के वैवाहिक जीवन और दूसरी शादी से संबंधित दस्तावेजों को भी Family Court के समक्ष प्रस्तुत किया था।



Family Court ने किन बातों पर ध्यान दिया?

Family Court ने रिकॉर्ड पर मौजूद विभिन्न साक्ष्यों का मूल्यांकन किया। निर्णय में बताया गया कि पत्नी ने अपनी जिरह में कई ऐसी बातें स्वीकार की थीं जिनका प्रभाव उसके maintenance claim पर पड़ा।

Family Court ने कथित divorce settlement के अलावा Aadhaar Card से संबंधित दस्तावेजों पर भी विचार किया। रिकॉर्ड के अनुसार एक पुराने Aadhaar Card में पति का नाम दर्ज था, जबकि बाद के संशोधित Aadhaar Card में पति के स्थान पर पिता का नाम दर्ज था।

Family Court ने इस तथ्य पर भी सवाल उठाया कि Section 125 Cr.P.C. की कार्यवाही के समय कौन-सा दस्तावेज प्रस्तुत किया गया और दस्तावेजों में हुए बदलाव की पर्याप्त व्याख्या क्यों नहीं की गई।


दूसरी शादी के आरोप का मुद्दा

मामले में पत्नी के कथित दूसरे विवाह से संबंधित साक्ष्य भी सामने आया। पति की ओर से प्रस्तुत voter list में पति के रूप में एक अन्य व्यक्ति का नाम बताया गया था। पत्नी ने इस दस्तावेज से संबंधित दावे को स्वीकार नहीं किया।

Family Court ने यह भी नोट किया कि कथित voter record को रद्द या चुनौती देने के लिए पत्नी की ओर से कोई प्रभावी कदम नहीं उठाया गया था। इसी प्रकार, अदालत ने ग्राम प्रधान द्वारा जारी एक प्रमाणपत्र का भी उल्लेख किया जिसमें पत्नी के दूसरे व्यक्ति से विवाह की बात कही गई थी।

हालांकि, हाईकोर्ट का निर्णय केवल इस आधार पर नहीं था कि कोई दस्तावेज मौजूद था। महत्वपूर्ण बात यह थी कि Family Court ने उपलब्ध समस्त साक्ष्य को देखते हुए तथ्यात्मक निष्कर्ष निकाले थे और हाईकोर्ट को यह तय करना था कि क्या उन निष्कर्षों में ऐसी गंभीर कानूनी त्रुटि या perversity थी जिसके कारण revisional jurisdiction में हस्तक्षेप आवश्यक हो।


हाईकोर्ट का महत्वपूर्ण निष्कर्ष

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड और Family Court के निष्कर्षों का परीक्षण करने के बाद पाया कि Family Court ने तथ्यात्मक मुद्दों पर विस्तार से विचार किया था।

हाईकोर्ट ने पाया कि Family Court द्वारा दर्ज किए गए निष्कर्षों को perverse या illegal नहीं कहा जा सकता। इसलिए केवल इस आधार पर कि Revisionist उन निष्कर्षों से सहमत नहीं है, हाईकोर्ट revisional jurisdiction में हस्तक्षेप नहीं कर सकता। यही इस निर्णय का सबसे महत्वपूर्ण कानूनी सिद्धांत है।


Revisional Court की शक्ति की सीमा

High Court ने स्पष्ट किया कि जब वह Sections 397/401 Cr.P.C. के तहत revisional jurisdiction का प्रयोग कर रहा हो, तो उसका कार्य सामान्य अपीलीय अदालत की तरह पूरे साक्ष्य का दोबारा मूल्यांकन करना नहीं है।

यदि Trial Court या Family Court ने साक्ष्यों पर विचार करके तथ्यात्मक निष्कर्ष दिया है, तो Revisional Court सामान्यतः उस निष्कर्ष को अपने निष्कर्ष से replace नहीं करेगा।

हस्तक्षेप तब आवश्यक हो सकता है जब निचली अदालत का निष्कर्ष स्पष्ट रूप से illegal, perverse या गंभीर कानूनी त्रुटि से प्रभावित हो। इस मामले में हाईकोर्ट को ऐसे हस्तक्षेप का पर्याप्त आधार नहीं मिला।


भरण-पोषण के मामलों के लिए क्या सीख मिलती है?

यह निर्णय बताता है कि Section 125 Cr.P.C. की कार्यवाही में केवल यह कहना पर्याप्त नहीं है कि पत्नी अलग रह रही है या पति ने उसे छोड़ दिया है। मामले में उपलब्ध साक्ष्य, अलग रहने का कारण और दोनों पक्षों द्वारा प्रस्तुत दस्तावेजों का महत्व हो सकता है।

विशेष रूप से, यदि किसी पक्ष के दस्तावेजों में महत्वपूर्ण अंतर हो तो अदालत उस अंतर की वजह पूछ सकती है। इसी तरह, यदि विपक्षी पक्ष कोई ऐसा दस्तावेज प्रस्तुत करता है जिससे वैवाहिक स्थिति या दूसरी शादी से संबंधित गंभीर तथ्य सामने आते हैं, तो उस दस्तावेज को उचित तरीके से चुनौती देना महत्वपूर्ण हो सकता है।


क्या यह निर्णय हर maintenance case पर लागू होगा?

नहीं। इस निर्णय को यह सामान्य नियम नहीं माना जाना चाहिए कि पत्नी को अलग रहने पर हमेशा maintenance नहीं मिलेगा।

प्रत्येक Section 125 Cr.P.C. या वर्तमान कानून के अंतर्गत maintenance proceeding अपने तथ्यों और साक्ष्यों पर निर्भर करती है। इस मामले में हाईकोर्ट ने मुख्य रूप से यह देखा कि Family Court के factual findings रिकॉर्ड पर मौजूद साक्ष्यों से समर्थित थे और उनमें ऐसी perversity या illegality नहीं थी जो revisional interference को उचित बनाए।

इसलिए इस judgment का उपयोग किसी दूसरे मामले में करते समय उसके facts की तुलना करना आवश्यक होगा।


वर्तमान कानूनी व्यवस्था के संदर्भ में महत्व

यह मामला Section 125 Cr.P.C. के तहत शुरू हुई कार्यवाही से संबंधित है। वर्तमान आपराधिक कानून व्यवस्था में maintenance का प्रावधान BNSS की Section 144 में है। इसलिए नए मामलों में अधिवक्ताओं को पुराने Cr.P.C. प्रावधान और वर्तमान BNSS प्रावधान के बीच अंतर को ध्यान में रखना चाहिए।

फिर भी, इस judgment में revisional jurisdiction और evidence appreciation से संबंधित जो सिद्धांत सामने आया है, वह मामले की प्रकृति और लागू प्रक्रिया के अनुसार उपयोगी कानूनी संदर्भ प्रदान कर सकता है।


निष्कर्ष

Smt. Gudiya v. State of U.P. and Another, Criminal Revision No. 6348 of 2023 का मुख्य संदेश यह है कि Family Court द्वारा साक्ष्यों के आधार पर दिए गए factual findings में हाईकोर्ट revisional jurisdiction के तहत सामान्यतः हस्तक्षेप नहीं करेगा, जब तक वे findings स्पष्ट रूप से illegal या perverse न हों।

इस मामले में पत्नी का Section 125 Cr.P.C. maintenance claim Family Court ने खारिज किया था। हाईकोर्ट ने उपलब्ध रिकॉर्ड, दस्तावेजों और Family Court के निष्कर्षों को देखते हुए पाया कि निचली अदालत के निष्कर्षों में ऐसा कोई गंभीर दोष नहीं था जिससे revision में हस्तक्षेप किया जाए। परिणामस्वरूप Criminal Revision No. 6348 of 2023 को meritless मानते हुए dismiss कर दिया गया।


केस का संक्षिप्त विवरण:

Case: Smt. Gudiya v. State of U.P. and Another
Case No.: Criminal Revision No. 6348 of 2023
Court: Allahabad High Court
Judge: Justice Madan Pal Singh
Decision Date: 17 November 2025
Neutral Citation: 2025:AHC:205032
मुख्य विषय: Section 125 Cr.P.C. Maintenance और revisional jurisdiction
Result: Criminal Revision dismissed.
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Smt. Gudiya vs State of U.P. Criminal Revision 6348/2023 में इलाहाबाद हाईकोर्ट का भरण-पोषण और Revisional Jurisdiction पर महत्वपूर्ण फैसला जानें।

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महत्वपूर्ण: यह लेख सामान्य कानूनी जानकारी के उद्देश्य से है। किसी वास्तविक मामले में FIR की धाराओं, आरोपों और गिरफ्तारी की परिस्थितियों के आधार पर अलग कानूनी स्थिति हो सकती है।

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