प्रस्तावना
नया आपराधिक कानून भारतीय न्याय संहिता (BNS) देश में जालसाजी (Forgery) से जुड़े अपराधों को सख्ती से नियंत्रित करता है। BNS की धारा 338 विशेष रूप से मूल्यवान प्रतिभूति (Valuable Security), वसीयत (Will) या ऐसे दस्तावेज जिनसे कानूनी अधिकार उत्पन्न या समाप्त होते हैं—उनकी कूटरचना से संबंधित है। यह धारा गंभीर आर्थिक एवं संपत्ति अपराधों पर लागू होती है और इसकी सजा भी कड़ी है।
यह लेख धारा 338 की परिभाषा, आवश्यक तत्व, सजा, उदाहरण, बचाव के आधार और न्यायिक व्याख्या को सरल एवं SEO-फ्रेंडली भाषा में प्रस्तुत करता है।
पूरे लेख के मूल प्रावधान (मूल अधिनियम का पाठ):-
(मूल्यवान प्रतिभूति, विल, इत्यादि की कूटरचना)
जो कोई किसी ऐसी दस्तावेज की, जिसका कोई मूल्यवान प्रतिभूति या विल या पुत्र के दत्तकग्रहण का प्राधिकार होना तात्पर्थित हो, या जिसका किसी मूल्यवान प्रतिभूति की रचना या अन्तरण का, या उस पर के मूलधन, व्याज या लाभांश को प्राप्त करने का, या किसी धन, जंगम संपत्ति या मूल्यवान प्रतिभूति को प्राप्त करने या परिदत्त करने का प्राधिकार होना तात्पर्यिंत हो, अथवा किसी दस्तावेज को, जिसका धन दिए जाने की अभिस्वीकृति करने वाला, निस्तारणपत्र या रसीद होना, या किसी जंगम संपत्ति या मूल्यवान प्रतिभूति के परिदान के लिए निस्तारण पत्र या रसीद होना तात्पर्थित हो, कूटरचना करेगा, वह आजीवन कारावास से, या दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि दस वर्ष तक की हो सकेगी, दण्डित किया जाएगा और जुर्माने का भी दायी होगा।
1. धारा 338 क्या कहती है?
यदि कोई व्यक्ति किसी मूल्यवान प्रतिभूति, वसीयत (Will), या ऐसे दस्तावेज की कूटरचना करता है जिससे किसी व्यक्ति के संपत्ति अधिकार, देनदारी या कानूनी स्थिति पर प्रभाव पड़ता है, तो वह धारा 338 के अंतर्गत दंडनीय अपराध करता है।
“मूल्यवान प्रतिभूति” का अर्थ
ऐसा दस्तावेज जिससे—
🔸किसी संपत्ति का स्वामित्व सिद्ध हो,
🔸किसी ऋण/देयता का प्रमाण बने,
🔸कोई कानूनी अधिकार उत्पन्न, स्थानांतरित या समाप्त हो।
उदाहरण: बंधक पत्र, रजिस्टर्ड एग्रीमेंट, चेक, प्रॉमिसरी नोट, वसीयत आदि।
2. अपराध के आवश्यक तत्व (Essential Ingredients)
धारा 338 सिद्ध करने के लिए अभियोजन को निम्न तत्व साबित करने होते हैं:
दस्तावेज का स्वरूप – वह मूल्यवान प्रतिभूति/वसीयत/कानूनी अधिकार से जुड़ा दस्तावेज हो।
कूटरचना (Forgery) – दस्तावेज झूठा/बनावटी/छेड़छाड़ किया गया हो।
कपटपूर्ण आशय (Fraudulent Intent) – आरोपी का उद्देश्य धोखा देना या अवैध लाभ प्राप्त करना हो।
हानि की संभावना – कूटरचना से किसी को संपत्ति/कानूनी नुकसान हो सकता हो।
इन तत्वों के अभाव में आरोप सिद्ध नहीं माना जाता।
3. सजा (Punishment under BNS 338)
धारा 338 के अंतर्गत:
सजा:- आजीवन कारावास, या 10 वर्ष के लिए कारावास और जुर्माना
अपराध:- संज्ञेय
जमानत:- अजमानतीय
विचारणीय:- प्रथम वर्ग मजिस्ट्रेट द्वारा विचारणीय
अशमनीय:- अशमनीय का मतलब है, ऐसा अपराध जिसके लिए कोई समझौता या सेटलमेंट संभव नहीं है।
जब मूल्यवान प्रतिभूति केन्द्रीय सरकार का वचनपत्र है-
सजा:- आजीवन कारावास, या 10 वर्ष के लिए कारावास और जुर्माना
अपराध:- संज्ञेय
जमानत:- अजमानतीय
विचारणीय:- प्रथम वर्ग मजिस्ट्रेट द्वारा विचारणीय
अशमनीय:- अशमनीय का मतलब है, ऐसा अपराध जिसके लिए कोई समझौता या सेटलमेंट संभव नहीं है।
यह दंड दर्शाता है कि विधायिका इस अपराध को अत्यंत गंभीर मानती है, क्योंकि यह सीधे संपत्ति और विश्वास पर आघात करता है।
4. उदाहरण से समझें
उदाहरण 1:
किसी व्यक्ति ने अपने रिश्तेदार की संपत्ति हड़पने के लिए नकली वसीयत तैयार की।
➡ यह धारा 338 के अंतर्गत आएगा।
उदाहरण 2:
किसी ने बैंक से लोन लेने हेतु फर्जी बंधक पत्र बनाया।
➡ यह भी मूल्यवान प्रतिभूति की कूटरचना है।
उदाहरण 3:
रजिस्टर्ड एग्रीमेंट में हस्ताक्षर की जालसाजी कर जमीन ट्रांसफर दिखाया गया।
➡ धारा 338 लागू होगी।
5. कोर्ट में अभियोजन कैसे साबित करता है?
कोर्ट में निम्न साक्ष्य महत्वपूर्ण होते हैं:
,▪️हस्तलेखन विशेषज्ञ की रिपोर्ट
▪️दस्तावेज का फॉरेंसिक परीक्षण
▪️गवाहों के बयान
▪️रजिस्ट्री/बैंक रिकॉर्ड
▪️इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य (यदि लागू हो)
▪️यदि विशेषज्ञ रिपोर्ट और परिस्थितिजन्य साक्ष्य मजबूत हों, तो सजा की संभावना बढ़ जाती है।
6. बचाव के आधार (Defence Grounds)
आरोपी निम्न आधार पर बचाव ले सकता है:
दस्तावेज असली है – कोई छेड़छाड़ नहीं हुई।
आशय का अभाव – धोखा देने का इरादा नहीं था।
गलत पहचान (Mistaken Identity)
प्रमाणिकता पर संदेह – फॉरेंसिक रिपोर्ट संदिग्ध हो।
फौजदारी मामलों में संदेह का लाभ (Benefit of Doubt) आरोपी को मिलता है।
7. धारा 338 और अन्य धाराओं में अंतर
| धारा | विषय | सजा |
|---|---|---|
| 336 | सामान्य कूटरचना | कम सजा |
| 337 | न्यायालय/लोक रजिस्टर की कूटरचना | अधिक सख्त |
| 338 | मूल्यवान प्रतिभूति/वसीयत की कूटरचना | आजीवन/10 वर्ष |
8. न्यायिक दृष्टिकोण
भारतीय न्यायालयों ने बार-बार कहा है कि:
केवल हस्ताक्षर में अंतर होना पर्याप्त नहीं;
कपटपूर्ण आशय सिद्ध होना आवश्यक है;
संदेह की स्थिति में आरोपी को लाभ मिलेगा।
कोर्ट दस्तावेज की प्रकृति और आरोपी की भूमिका का सूक्ष्म परीक्षण करती है।
9. जमानत और ट्रायल प्रक्रिया
🔻यह अपराध गंभीर और संज्ञेय (Cognizable) है।
🔻जमानत न्यायालय के विवेक पर निर्भर करती है।
🔻ट्रायल सेशन कोर्ट में चल सकता है यदि सजा 10 वर्ष या उससे अधिक हो।
🔻आरोप तय होने के बाद अभियोजन साक्ष्य प्रस्तुत करता है, फिर बचाव पक्ष।
10. आम सवाल (FAQ)
प्रश्न 1: क्या नकली वसीयत बनाना धारा 338 में आएगा?
✔️ हाँ, यदि वह संपत्ति अधिकार को प्रभावित करती है।
प्रश्न 2: क्या यह जमानती अपराध है?
✔️ सामान्यतः गैर-जमानती श्रेणी में माना जाता है।
प्रश्न 3: क्या केवल दस्तावेज बनाना ही अपराध है?
✔️ हाँ, यदि वह कपटपूर्ण उद्देश्य से बनाया गया हो।
निष्कर्ष
BNS धारा 338 मूल्यवान दस्तावेजों की कूटरचना को कठोर दंड के साथ नियंत्रित करती है। नकली वसीयत, फर्जी बंधक पत्र या जाली एग्रीमेंट बनाना केवल नागरिक विवाद नहीं, बल्कि गंभीर आपराधिक अपराध है।
यदि आप किसी ऐसे मामले में पक्षकार हैं, तो दस्तावेज की वैधता, फॉरेंसिक परीक्षण और कानूनी सलाह अत्यंत महत्वपूर्ण है। सही रणनीति और साक्ष्य के आधार पर ही न्यायालय में सफलता संभव है।
(IPC) की धारा 467 को (BNS) की धारा 338 में बदल दिया गया है। - अगर आप चाहे तो लोगो पर क्लिक करके देख सकते है |
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