पूरे लेख का मूल प्रावधान (Bare Act Text):-
धारा:- 4. एक ही संव्यवहार के भाग होने वाले तथ्यों की सुसंगति-
जो तथ्य विवाद्य न होते हुए भी किसी विवाद्यक तथ्य या सुसंगत तथ्य से उस प्रकार संसक्त हैं कि वे एक ही संव्यवहार के भाग हैं, वे तथ्य सुसंगत हैं, चाहे वे उसी समय और स्थान पर या विभिन्न समयों और स्थानों पर घटित हुए हों।
उदाहरण:- (क) राजेश को पीट कर उसकी हत्या करने का मोहन अभियुक्त है। मोहन या राजेश या पास खड़े लोगों द्वारा जो कुछ भी पिटाई के समय या उससे इतने अल्पकाल पूर्व या पश्चात् कहा या किया गया था कि वह उसी संव्यवहार का भाग बन गया है, वह सुसंगत तथ्य है।
(ख) राजीव एक सशस्त्र विप्लव में भाग लेकर, जिसमें सम्पत्ति नष्ट की जाती है, फौजों पर आक्रमण किया जाता है और जेलें तोड़ कर खोली जाती हैं, भारत सरकार के विरुद्ध युद्ध करने का अभियुक्त है। इन तथ्यों का घटित होना साधारण संव्यवहार का भाग होने के नाते सुसंगत है, चाहे राजीव उन सभी में उपस्थित न रहा हो
(ग) जॉन एक पत्र में, जो एक पत्र व्यवहार का भाग है, अन्तर्विष्ट अपमानलेख के लिए ख पर वाद लाता है। जिस विषय में अपमानलेख उद्भूत हुआ है, उससे सम्बन्ध रखने वाली पक्षकारों के बीच जितनी चिट्ठियां उस पत्रव्यवहार का भाग हैं जिसमें वह अन्तर्विष्ट है, वे सुसंगत तथ्य हैं, चाहे उनमें वह अपमानलेख स्वयं अन्तर्विष्ट न हो।
(घ) प्रश्न यह है कि क्या पीटर से आदिष्ट अमुक माल जॉन को परिदत्त किया गया था। वह माल, अनुक्रमशः कई मध्यवर्ती व्यक्तियों को परिदत्त किया गया था। हर एक परिदान सुसंगत तथ्य है।
BSA 2023 की धारा 4 : एक ही संव्यवहार के भाग होने वाले तथ्यों की सुसंगति
भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023 (Bharatiya Sakshya Adhiniyam, 2023) का उद्देश्य न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत किए जाने वाले साक्ष्यों के संबंध में स्पष्ट और आधुनिक व्यवस्था प्रदान करना है। इसी अधिनियम की धारा 4 “एक ही संव्यवहार के भाग होने वाले तथ्यों की सुसंगति” (Relevancy of Facts Forming Part of Same Transaction) से संबंधित है। यह प्रावधान न्यायालय को उन तथ्यों पर भी विचार करने की अनुमति देता है जो विवादित तथ्य से सीधे जुड़े हुए न होकर भी उसी घटना या संव्यवहार का हिस्सा हों।
धारा 4 का सिद्धांत अंग्रेजी विधि के प्रसिद्ध सिद्धांत Res Gestae पर आधारित है। इसका मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि न्यायालय किसी घटना को केवल उसके एक भाग तक सीमित न रखे, बल्कि उससे संबंधित सभी परिस्थितियों और तथ्यों को समग्र रूप से देख सके।
धारा 4 का प्रावधान
धारा 4 के अनुसार, यदि कोई तथ्य विवादित तथ्य से इस प्रकार संबंधित है कि वह उसी संव्यवहार का भाग बनता है, तो वह तथ्य प्रासंगिक माना जाएगा, चाहे वह उसी समय और स्थान पर घटित हुआ हो या अलग समय और स्थान पर।
अर्थात, किसी घटना के साथ जुड़े हुए वे सभी तथ्य, जो मिलकर एक संपूर्ण घटना का निर्माण करते हैं, न्यायालय के समक्ष साक्ष्य के रूप में प्रस्तुत किए जा सकते हैं।
एक ही संव्यवहार का अर्थ
“संव्यवहार” से आशय ऐसी घटनाओं की श्रृंखला से है जो उद्देश्य, समय, स्थान और परिस्थितियों की दृष्टि से एक-दूसरे से इतनी निकटता से जुड़ी हों कि उन्हें अलग-अलग नहीं देखा जा सके।
उदाहरण के लिए, यदि किसी व्यक्ति की हत्या की जाती है और हत्या के तुरंत बाद आरोपी घटनास्थल से भागते हुए दिखाई देता है, तो उसका भागना भी उसी संव्यवहार का हिस्सा माना जाएगा। इसी प्रकार, घटना के समय उपस्थित व्यक्तियों के तत्काल कथन भी प्रासंगिक साक्ष्य हो सकते हैं।
धारा 4 का उद्देश्य
धारा 4 का मुख्य उद्देश्य न्यायालय को घटना का वास्तविक और पूर्ण चित्र प्रस्तुत करना है। कई बार कोई महत्वपूर्ण तथ्य विवादित तथ्य का प्रत्यक्ष भाग नहीं होता, लेकिन उससे संबंधित होने के कारण वह सत्य तक पहुँचने में सहायता करता है। इसलिए कानून ऐसे तथ्यों को भी प्रासंगिक मानता है।
यह प्रावधान निम्न उद्देश्यों की पूर्ति करता है—
• न्यायालय को संपूर्ण घटना का वास्तविक स्वरूप समझने में सहायता प्रदान करना।
• साक्ष्यों के कृत्रिम विभाजन को रोकना।
• न्यायिक प्रक्रिया में सत्य की खोज को सुगम बनाना।
• अपराध या विवाद से संबंधित सभी परिस्थितियों को ध्यान में रखना।
धारा 4 के आवश्यक तत्व
किसी तथ्य को धारा 4 के अंतर्गत प्रासंगिक माने जाने के लिए निम्नलिखित तत्वों का होना आवश्यक है—
1. विवादित तथ्य का अस्तित्व
सबसे पहले कोई ऐसा तथ्य होना चाहिए जो न्यायालय में विवाद का विषय हो।
2. तथ्य और विवादित तथ्य के बीच निकट संबंध
दूसरा तथ्य विवादित तथ्य से इतना जुड़ा होना चाहिए कि दोनों एक ही घटना या संव्यवहार के भाग प्रतीत हों।
3. घटनाओं की निरंतरता
घटनाओं के बीच समय, स्थान या उद्देश्य की निरंतरता होनी चाहिए।
4. तथ्य का स्वाभाविक संबंध
तथ्यों के बीच संबंध कृत्रिम न होकर स्वाभाविक होना चाहिए।
धारा 4 के अंतर्गत उदाहरण
उदाहरण 1 : हत्या का मामला
यदि ‘अ’ ने ‘ब’ पर गोली चलाई और गोली चलने के तुरंत बाद उपस्थित लोगों ने “अ ने ब को गोली मार दी” कहकर शोर मचाया, तो यह कथन उसी संव्यवहार का भाग माना जाएगा और प्रासंगिक साक्ष्य होगा।
उदाहरण 2 : लूट का मामला
यदि अपराधी बैंक से धन लूटकर भागते समय वाहन बदलता है और पुलिस को पीछा करते हुए उसके वाहन परिवर्तन का पता चलता है, तो वाहन बदलने की घटना भी उसी संव्यवहार का भाग होगी।
उदाहरण 3 : अपहरण का मामला
यदि किसी व्यक्ति का अपहरण किया जाता है और अपहरण के दौरान पीड़ित सहायता के लिए चिल्लाता है, तो उसकी तत्काल प्रतिक्रिया भी प्रासंगिक होगी।
Res Gestae का सिद्धांत
धारा 4 का आधार “Res Gestae” का सिद्धांत है। यह लैटिन भाषा का शब्द है जिसका अर्थ है—“घटना के साथ जुड़े हुए कार्य या परिस्थितियाँ।”
इस सिद्धांत के अनुसार, यदि कोई कथन या कार्य किसी घटना के साथ इतना निकट संबंध रखता है कि वह उसी का हिस्सा बन जाता है, तो उसे साक्ष्य के रूप में स्वीकार किया जा सकता है।
उदाहरण के लिए, यदि किसी दुर्घटना के समय घायल व्यक्ति तुरंत कहता है कि “फलाँ व्यक्ति ने मुझे टक्कर मारी है”, तो यह कथन धारा 4 के अंतर्गत प्रासंगिक हो सकता है।
न्यायिक महत्व
धारा 4 न्यायालय को केवल प्रत्यक्ष साक्ष्य तक सीमित नहीं रखती बल्कि उससे जुड़े हुए सभी तथ्यों पर विचार करने का अवसर प्रदान करती है। इससे न्यायिक निर्णय अधिक निष्पक्ष और वास्तविक परिस्थितियों के अनुरूप हो पाते हैं।
कई मामलों में प्रत्यक्षदर्शी साक्ष्य उपलब्ध नहीं होते, लेकिन परिस्थितिजन्य साक्ष्य और घटना से जुड़े तथ्य सत्य तक पहुँचने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। धारा 4 ऐसे तथ्यों को स्वीकार करने का कानूनी आधार प्रदान करती है।
धारा 4 और परिस्थितिजन्य साक्ष्य
परिस्थितिजन्य साक्ष्य (Circumstantial Evidence) के मामलों में धारा 4 का विशेष महत्व है। किसी अपराध के पहले, दौरान और बाद की परिस्थितियाँ यदि एक-दूसरे से जुड़ी हों, तो वे एक ही संव्यवहार का हिस्सा मानी जा सकती हैं।
उदाहरण के लिए, हत्या से पहले आरोपी द्वारा धमकी देना, हत्या के समय उसकी उपस्थिति और घटना के बाद उसका फरार हो जाना—ये सभी परिस्थितियाँ मिलकर एक ही संव्यवहार का निर्माण कर सकती हैं।
धारा 4 की सीमाएँ
यद्यपि धारा 4 व्यापक है, लेकिन प्रत्येक तथ्य को इसके अंतर्गत प्रासंगिक नहीं माना जा सकता। केवल वही तथ्य स्वीकार किए जाएंगे जिनका घटना से निकट और स्वाभाविक संबंध हो। बहुत अधिक समय के अंतराल या असंबंधित घटनाओं को धारा 4 के अंतर्गत शामिल नहीं किया जा सकता।
निष्कर्ष
भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023 की धारा 4 न्यायिक प्रक्रिया में अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान रखती है। यह प्रावधान न्यायालय को किसी विवादित तथ्य से जुड़े सभी आवश्यक तथ्यों पर विचार करने की अनुमति देता है, जिससे घटना का संपूर्ण और वास्तविक स्वरूप सामने आता है। “Res Gestae” के सिद्धांत पर आधारित यह धारा सत्य की खोज और न्याय की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। इसलिए, धारा 4 को समझना विधि के विद्यार्थियों, अधिवक्ताओं, न्यायिक अभ्यर्थियों तथा सामान्य नागरिकों के लिए समान रूप से उपयोगी है।
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