भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023 (Bharatiya Sakshya Adhiniyam, 2023) की धारा 17 न्यायालय में स्वीकृतियों (Admissions) के संबंध में एक महत्वपूर्ण प्रावधान है। यह धारा बताती है कि किन व्यक्तियों द्वारा की गई स्वीकृतियां न्यायालय में साक्ष्य के रूप में स्वीकार की जा सकती हैं, विशेष रूप से तब जब उन व्यक्तियों की स्थिति किसी वाद के पक्षकार (Party) के विरुद्ध सिद्ध की जानी हो। यह प्रावधान दीवानी और फौजदारी दोनों प्रकार के मामलों में साक्ष्य के मूल्यांकन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
यदि किसी व्यक्ति की कानूनी स्थिति, अधिकार, दायित्व या संबंध किसी वाद के पक्षकार के विरुद्ध सिद्ध किया जाना आवश्यक है, तो उस व्यक्ति द्वारा की गई स्वीकृति न्यायालय में प्रासंगिक (Relevant) हो सकती है। यही कारण है कि धारा 17 को न्यायिक प्रक्रिया का एक महत्वपूर्ण स्तंभ माना जाता है।
Bare Act में लिखी हुई मूल भाषा (Bare Act Text):-
BSA 2023 की धारा :- 17. उन व्यक्तियों द्वारा स्वीकृतियां जिनकी स्थिति वाद के पक्षकारों के विरुद्ध साबित की जानी चाहिए-
वे कथन, जो उन व्यक्तियों द्वारा किए गए हैं जिनकी वाद के किसी पक्षकार के विरुद्ध स्थिति या दायित्व साबित करना आवश्यक है, स्वीकृतियां हैं, यदि ऐसे कथन ऐसे व्यक्तियों द्वारा, या उन पर लाए गए वाद में ऐसी स्थिति या दायित्व के संबध में ऐसे व्यक्तियों के विरुद्ध सुसंगत होते और यदि वे उस समय किये गए हों जबकि उन्हें करने वाला व्यक्ति ऐसी स्थिति ग्रहण किए हुए है या ऐसे दायित्व के अधीन है।
उदाहरण:- मोहन के लिए भाटक संग्रह का दायित्व जगदीश लेता है। रहीम द्वारा मोहन को शोध्य भाटक संग्रह न करने के लिए जगदीश पर मोहन वाद लाता है। जगदीश इस बात का प्रत्याख्यान करता है कि रहीम से मोहन को भाटक देय था। रहीम द्वारा यह कथन कि उस पर मोहन को भाटक देय है स्वीकृति है, और यदि जगदीश इस बात से इन्कार करता है कि रहीम द्वारा मोहन को भाटक देय था तो वह जगदीश के विरुद्ध सुसंगत तथ्य है।
BSA 2023 की धारा 17 का उद्देश्य
इस धारा का मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि ऐसे व्यक्तियों द्वारा दिए गए कथनों को भी न्यायालय महत्व दे सके जिनकी कानूनी स्थिति सीधे विवाद से जुड़ी हुई हो। यदि किसी तीसरे व्यक्ति की स्थिति सिद्ध किए बिना मुकदमे का सही निर्णय संभव नहीं है, तो उस व्यक्ति द्वारा की गई स्वीकृति न्यायालय के लिए उपयोगी साक्ष्य बन सकती है।
धारा 17 का सरल अर्थ
सरल भाषा में समझें तो यदि किसी मुकदमे में किसी व्यक्ति की कानूनी स्थिति, अधिकार या दायित्व साबित करना आवश्यक है और वह व्यक्ति कोई स्वीकृति देता है, तो उसकी वह स्वीकृति न्यायालय में साक्ष्य के रूप में स्वीकार की जा सकती है।
अर्थात—
• उस व्यक्ति की स्थिति विवाद से जुड़ी हो।
• उसकी स्थिति किसी पक्षकार के विरुद्ध सिद्ध की जानी हो।
• उसके द्वारा किया गया कथन उसी स्थिति से संबंधित हो।
• ऐसी स्थिति में उसका कथन प्रासंगिक माना जाएगा।
धारा 17 के आवश्यक तत्व
इस धारा के लागू होने के लिए निम्नलिखित शर्तें आवश्यक हैं—
• कोई न्यायिक विवाद (Suit या Proceeding) लंबित हो।
• किसी व्यक्ति की कानूनी स्थिति साबित करना आवश्यक हो।
• वह स्थिति किसी पक्षकार के विरुद्ध सिद्ध की जानी हो।
• उस व्यक्ति ने कोई स्वीकृति (Admission) की हो।
• वह स्वीकृति विवादित तथ्य से संबंधित हो।
उदाहरण द्वारा समझिए
मान लीजिए कि किसी संपत्ति को लेकर विवाद चल रहा है। वादी कहता है कि संपत्ति पहले "राम" की थी प्रतिवादी कहता है कि संपत्ति कभी "राम" की नहीं थी यदि "राम" ने पहले किसी दस्तावेज में यह स्वीकार किया था कि वह केवल किरायेदार था, मालिक नहीं, तो यह स्वीकृति न्यायालय में प्रासंगिक हो सकती है क्योंकि "राम" की स्थिति मुकदमे में महत्वपूर्ण है।
धारा 17 क्यों महत्वपूर्ण है?
यदि केवल मुकदमे के पक्षकारों की स्वीकृतियों को ही स्वीकार किया जाए तो अनेक मामलों में सत्य तक पहुँचना कठिन हो सकता है। कई बार विवाद का समाधान किसी तीसरे व्यक्ति की कानूनी स्थिति पर निर्भर करता है। ऐसी परिस्थितियों में धारा 17 न्यायालय को सत्य तक पहुँचने में सहायता करती है।
न्यायालय किन बातों पर विचार करता है?
धारा 17 के अंतर्गत न्यायालय सामान्यतः निम्न बातों का परीक्षण करता है—
• क्या व्यक्ति की स्थिति वास्तव में विवाद से संबंधित है?
• क्या उसकी स्थिति पक्षकार के विरुद्ध सिद्ध की जानी आवश्यक है?
• क्या स्वीकृति स्वेच्छा से की गई थी?
• क्या कथन विश्वसनीय है?
• क्या कथन अन्य साक्ष्यों से मेल खाता है?
स्वीकृति (Admission) का महत्व
स्वीकृति को साक्ष्य का अत्यंत महत्वपूर्ण प्रकार माना जाता है क्योंकि सामान्यतः कोई व्यक्ति अपने विरुद्ध गलत तथ्य स्वीकार नहीं करता।
यद्यपि स्वीकृति अंतिम प्रमाण (Conclusive Proof) नहीं होती, फिर भी यह अत्यंत प्रभावशाली साक्ष्य होती है।
धारा 17 और धारा 15 का अंतर
धारा 15 मुख्यतः उन व्यक्तियों द्वारा की गई स्वीकृतियों से संबंधित है जो स्वयं वाद के पक्षकार हैं या उनके अधिकृत प्रतिनिधि हैं।
जबकि धारा 17 ऐसे व्यक्तियों की स्वीकृतियों को महत्व देती है जिनकी कानूनी स्थिति को पक्षकारों के विरुद्ध सिद्ध किया जाना आवश्यक होता है।
न्यायालय में व्यावहारिक उपयोग
धारा 17 का उपयोग अनेक प्रकार के मामलों में होता है—
• संपत्ति विवाद
• उत्तराधिकार विवाद
• पारिवारिक विवाद
• कंपनी संबंधी मुकदमे
• साझेदारी विवाद
• एजेंसी विवाद
• ट्रस्ट संबंधी मामले
• अनुबंध संबंधी विवाद
क्या हर स्वीकृति स्वीकार होगी?
नहीं।
यदि स्वीकृति का विवाद से कोई संबंध नहीं है या वह उस व्यक्ति की कानूनी स्थिति से संबंधित नहीं है, तो न्यायालय उसे स्वीकार नहीं करेगा।
धारा 17 के लाभ
• न्यायालय को सही तथ्य तक पहुँचने में सहायता मिलती है।
• तकनीकी आधार पर न्याय प्रभावित नहीं होता।
• वास्तविक विवाद का समाधान आसान होता है।
• प्रासंगिक साक्ष्य न्यायालय के समक्ष उपलब्ध हो जाते हैं।
• न्यायिक प्रक्रिया अधिक निष्पक्ष बनती है।
महत्वपूर्ण बिंदु
• यह धारा स्वीकृतियों की प्रासंगिकता से संबंधित है।
• केवल वही स्वीकृति स्वीकार होगी जो संबंधित व्यक्ति की स्थिति से जुड़ी हो।
• व्यक्ति की स्थिति विवाद में महत्वपूर्ण होनी चाहिए।
• न्यायालय प्रत्येक मामले के तथ्यों के आधार पर निर्णय लेता है।
• यह धारा न्यायालय को व्यापक दृष्टिकोण अपनाने में सहायता करती है।
निष्कर्ष
भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023 की धारा 17 न्यायालय को ऐसे व्यक्तियों द्वारा की गई स्वीकृतियों पर विचार करने की अनुमति देती है जिनकी कानूनी स्थिति किसी वाद के पक्षकार के विरुद्ध सिद्ध की जानी आवश्यक होती है। यह प्रावधान न्यायिक प्रक्रिया को अधिक प्रभावी, पारदर्शी और न्यायसंगत बनाता है। संपत्ति, उत्तराधिकार, एजेंसी, साझेदारी तथा अन्य दीवानी मामलों में इस धारा का विशेष महत्व है। न्यायालय इस धारा के माध्यम से केवल औपचारिक पक्षकारों तक सीमित न रहकर उन व्यक्तियों के कथनों पर भी विचार कर सकता है जिनकी स्थिति विवाद के समाधान के लिए आवश्यक है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
प्रश्न 1. BSA 2023 की धारा 17 किस विषय से संबंधित है?
उत्तर: धारा 17 उन व्यक्तियों द्वारा की गई स्वीकृतियों (Admissions) से संबंधित है जिनकी कानूनी स्थिति किसी वाद के पक्षकार के विरुद्ध सिद्ध की जानी आवश्यक होती है।
प्रश्न 2. क्या धारा 17 केवल दीवानी मामलों में लागू होती है?
उत्तर: नहीं। जहाँ इस धारा की शर्तें पूरी होती हैं, वहाँ यह दीवानी और उपयुक्त परिस्थितियों में अन्य न्यायिक कार्यवाहियों में भी लागू हो सकती है।
प्रश्न 3. "स्वीकृति (Admission)" का क्या अर्थ है?
उत्तर: स्वीकृति वह कथन है, जो किसी विवादित तथ्य या प्रासंगिक तथ्य के संबंध में किसी निष्कर्ष का संकेत देता है और जिसे कानून के अनुसार प्रासंगिक माना जाता है।
प्रश्न 4. धारा 17 के अंतर्गत किस व्यक्ति की स्वीकृति प्रासंगिक होती है?
उत्तर: उस व्यक्ति की, जिसकी कानूनी स्थिति या उत्तरदायित्व किसी वाद के पक्षकार के विरुद्ध सिद्ध किया जाना आवश्यक हो।
प्रश्न 5. क्या प्रत्येक व्यक्ति द्वारा की गई स्वीकृति धारा 17 के अंतर्गत स्वीकार की जाएगी?
उत्तर: नहीं। केवल वही स्वीकृति प्रासंगिक होगी जो विवाद से संबंधित हो और जिसकी स्थिति मुकदमे में महत्वपूर्ण हो।
प्रश्न 6. क्या मौखिक स्वीकृति भी मान्य हो सकती है?
उत्तर: हाँ। यदि वह कानून की शर्तों को पूरा करती है और न्यायालय उसे विश्वसनीय मानता है, तो मौखिक स्वीकृति भी प्रासंगिक हो सकती है।
(IEA) की धारा 19 को (BSA) की धारा 17 में बदल दिया गया है। - अगर आप चाहे तो लोगो पर क्लिक करके देख सकते है |
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