| Rajadurai v. State of Tamil Nadu 2026: NDPS Act में लंबे समय तक हिरासत और ट्रायल में देरी पर जमानत |
Rajadurai v. State of Tamil Nadu 2026 : NDPS मामले में लंबे समय से जेल में रहने पर सुप्रीम कोर्ट ने दी जमानत
Rajadurai v. State of Tamil Nadu सुप्रीम कोर्ट का 5 मई 2026 का महत्वपूर्ण आदेश है। यह मामला SLP (Criminal) No. 4729/2026 से संबंधित था। याचिकाकर्ता के विरुद्ध तमिलनाडु के मदुरै जिले के Kottampati Police Station में NDPS Act के तहत मामला दर्ज किया गया था। आरोप 22.950 किलोग्राम गांजा से संबंधित था।
इस मामले की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता यह थी कि आरोपी एक वर्ष से अधिक समय से न्यायिक हिरासत में था, ट्रायल कोर्ट द्वारा आरोप तय किए जा चुके थे, लेकिन इसके बावजूद सुनवाई में किसी भी गवाह की गवाही शुरू नहीं हुई थी। सुप्रीम कोर्ट ने इसी परिस्थिति को ध्यान में रखते हुए जमानत देने का निर्णय लिया।
मामले की पृष्ठभूमि
राजादुरई के विरुद्ध FIR No. 11 of 2025, Kottampati Police Station, District Madurai में मामला दर्ज किया गया था। अभियोजन के अनुसार मामला NDPS Act की धारा 8(c), 20(b)(ii)(c) और 29(1) के अंतर्गत था। कथित रूप से बरामद गांजे की मात्रा 22.950 किलोग्राम थी।
याचिकाकर्ता ने नियमित जमानत के लिए न्यायालय का रुख किया था। हाई कोर्ट से जमानत नहीं मिलने के बाद मामला सुप्रीम कोर्ट के समक्ष विशेष अनुमति याचिका के रूप में आया।
सुप्रीम कोर्ट के सामने मुख्य प्रश्न
इस मामले में मुख्य प्रश्न यह था कि जब किसी आरोपी पर NDPS Act जैसे कठोर कानून के तहत गंभीर आरोप हों और कथित बरामदगी commercial quantity के आसपास या उससे अधिक हो, तब भी क्या लंबे समय तक मुकदमा आगे न बढ़ने की स्थिति में जमानत दी जा सकती है?
NDPS Act में commercial quantity से संबंधित मामलों में जमानत के लिए कड़े प्रावधान हैं। फिर भी सुप्रीम कोर्ट ने मामले की वास्तविक परिस्थितियों को अलग से देखा।
आरोपी की हिरासत और ट्रायल में देरी
सुप्रीम कोर्ट के रिकॉर्ड में यह बात विशेष रूप से दर्ज हुई कि याचिकाकर्ता एक वर्ष से अधिक समय से judicial custody में था।
महत्वपूर्ण बात यह थी कि ट्रायल कोर्ट द्वारा charge frame किया जा चुका था, लेकिन आदेश की तारीख तक एक भी prosecution witness की examination नहीं हुई थी।
अर्थात मामला केवल आरोप तय होने तक पहुंचा था और उसके बाद भी साक्ष्य की प्रक्रिया शुरू नहीं हुई थी। इस स्थिति ने सुप्रीम कोर्ट के सामने आरोपी की निरंतर हिरासत को महत्वपूर्ण बना दिया।
सुप्रीम कोर्ट का निर्णय
मामले की परिस्थितियों पर विचार करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ता के पक्ष में अपने विवेक का प्रयोग किया।
सुप्रीम कोर्ट की पीठ में Justice J.B. Pardiwala और Justice K.V. Viswanathan शामिल थे। न्यायालय ने 5 मई 2026 को आदेश पारित करते हुए कहा कि उपलब्ध परिस्थितियों में याचिकाकर्ता के पक्ष में discretion का प्रयोग किया जाना उचित है।
न्यायालय ने निर्देश दिया कि राजादुरई को जमानत पर तत्काल रिहा किया जाए, बशर्ते कि वह किसी अन्य मामले में आवश्यक हिरासत में न हो। जमानत की शर्तें Trial Court द्वारा निर्धारित की जानी थीं।
इसके बाद Special Leave Petition का निपटारा कर दिया गया।
इस निर्णय का कानूनी महत्व
इस आदेश का सबसे महत्वपूर्ण पहलू trial delay और prolonged incarceration है।
NDPS Act में commercial quantity के मामलों में Section 37 के कारण जमानत प्राप्त करना कठिन होता है। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि आरोपी को अनिश्चित अवधि तक बिना प्रभावी ट्रायल के जेल में रखा जा सकता है।
• Rajadurai मामले में सुप्रीम कोर्ट ने विशेष रूप से यह देखा कि:
• आरोपी एक वर्ष से अधिक समय से न्यायिक हिरासत में था।
आरोप तय हो चुके थे।
• इसके बावजूद किसी भी गवाह की गवाही शुरू नहीं हुई थी।
• ट्रायल की वास्तविक प्रगति बहुत सीमित थी।
इन परिस्थितियों को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने जमानत देना उचित माना।
इस प्रकार यह आदेश इस सिद्धांत को रेखांकित करता है कि न्यायिक हिरासत को केवल इसलिए अनिश्चित काल तक जारी नहीं रखा जाना चाहिए कि आरोप गंभीर हैं, विशेषकर जब मुकदमे की सुनवाई प्रभावी गति से आगे नहीं बढ़ रही हो।
Article 21 से संबंध
भारतीय संविधान का Article 21 जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की सुरक्षा प्रदान करता है। आपराधिक मामलों में speedy trial को व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जोड़कर देखा गया है।
Rajadurai मामले में सुप्रीम कोर्ट ने विस्तृत संवैधानिक चर्चा किए बिना, मामले की परिस्थितियों और लंबे समय से चल रही हिरासत को ध्यान में रखते हुए जमानत प्रदान की।
इसलिए इस आदेश को व्यापक रूप से इस बात के उदाहरण के रूप में समझा जा सकता है कि trial में असाधारण देरी और लंबे समय तक incarceration जमानत पर विचार करते समय महत्वपूर्ण परिस्थितियां हो सकती हैं।
क्या यह NDPS Act की धारा 37 को समाप्त करता है?
नहीं।
यह समझना जरूरी है कि Rajadurai का आदेश NDPS Act की Section 37 को समाप्त या निष्प्रभावी नहीं करता। यह आदेश अपने विशेष तथ्यों और परिस्थितियों पर आधारित है।
सुप्रीम कोर्ट ने यह नहीं कहा कि NDPS Act के commercial quantity वाले प्रत्येक आरोपी को केवल लंबे समय तक जेल में रहने के कारण स्वतः जमानत मिल जाएगी।
हर मामले में अदालत को संबंधित परिस्थितियों, हिरासत की अवधि, ट्रायल की प्रगति और अन्य कानूनी पहलुओं पर विचार करना होगा।
बाद के मामलों में प्रभाव
Rajadurai के आदेश का बाद के मामलों में उल्लेख भी हुआ है। उदाहरण के लिए, जून 2026 में महाराष्ट्र हाई कोर्ट के एक मामले में Rajadurai को इस आधार पर संदर्भित किया गया कि लंबे समय से हिरासत और ट्रायल की धीमी प्रगति जमानत पर विचार करते समय महत्वपूर्ण हो सकती है।
इसी प्रकार अन्य मामलों में भी Rajadurai के आदेश का उल्लेख किया गया है, विशेषकर वहां जहां आरोपी लंबे समय से हिरासत में था और ट्रायल में पर्याप्त प्रगति नहीं हुई थी।
इससे पता चलता है कि यह आदेश trial delay के आधार पर bail jurisprudence में उपयोगी संदर्भ बन रहा है।
निष्कर्ष
Rajadurai v. State of Tamil Nadu (2026) का मुख्य संदेश यह है कि आपराधिक मुकदमे में केवल आरोप की गंभीरता ही महत्वपूर्ण नहीं होती, बल्कि आरोपी की लगातार हिरासत और ट्रायल की वास्तविक प्रगति भी अदालत के विचार का विषय होती है।
इस मामले में 22.950 किलोग्राम गांजे से संबंधित NDPS आरोप होने के बावजूद सुप्रीम कोर्ट ने यह महत्वपूर्ण तथ्य देखा कि आरोपी एक वर्ष से अधिक समय से जेल में था, charge frame हो चुका था और फिर भी किसी गवाह की गवाही शुरू नहीं हुई थी। इन्हीं परिस्थितियों में सुप्रीम कोर्ट ने जमानत प्रदान की।
इसलिए यह निर्णय उन मामलों के लिए महत्वपूर्ण संदर्भ है जहां लंबे समय से आरोपी जेल में है लेकिन ट्रायल प्रभावी रूप से आगे नहीं बढ़ रहा है। हालांकि, इसे प्रत्येक NDPS मामले में स्वतः जमानत का अधिकार समझना सही नहीं होगा; निर्णय हमेशा मामले के विशेष तथ्यों और लागू कानून के आधार पर होगा।
केस की मुख्य जानकारी
केस: Rajadurai v. State of Tamil Nadu
न्यायालय: Supreme Court of India
SLP (Criminal): No. 4729/2026
आदेश की तारीख: 5 मई 2026
पीठ: Justice J.B. Pardiwala एवं Justice K.V. Viswanathan
कथित बरामदगी: 22.950 किलोग्राम गांजा
लागू कानून: NDPS Act, 1985
मुख्य धाराएं: Sections 8(c), 20(b)(ii)(c), 29(1)
मुख्य आधार: एक वर्ष से अधिक हिरासत और charge frame होने के बावजूद किसी गवाह की गवाही शुरू न होना
परिणाम: सुप्रीम कोर्ट ने जमानत प्रदान की।

