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NI Act चेक बाउंस केस की पूरी कानूनी प्रक्रिया 2026 | धारा 138 एनआई एक्ट की सम्पूर्ण जानकारी

NI Act Section 138 Cheque Bounce Case Procedure in Hindi
काल्पनिक चित्र 

परक्राम्य लिखत अधिनियम, 1881 (Negotiable Instruments Act) की धारा 138 चेक बाउंस से संबंधित मामलों को नियंत्रित करती है। जब किसी व्यक्ति द्वारा जारी किया गया चेक बैंक में प्रस्तुत करने पर अपर्याप्त धनराशि या अन्य वैध कारणों से अनादृत हो जाता है, तो प्राप्तकर्ता को कानून के अनुसार कार्रवाई करने का अधिकार प्राप्त होता है। इस प्रक्रिया में विधिक नोटिस भेजना, सक्षम न्यायालय में परिवाद दायर करना, साक्ष्य प्रस्तुत करना तथा न्यायालय द्वारा अंतिम निर्णय देना शामिल है। एनआई एक्ट का उद्देश्य वित्तीय लेन-देन में विश्वास बनाए रखना तथा चेक के माध्यम से किए गए भुगतानों की विश्वसनीयता सुनिश्चित करना है।


चरण 1 – चेक जारी होना:- 

आरोपी (Drawer) द्वारा वादी (Payee) को चेक दिया जाता है। चेक किसी देनदारी (Debt) या कानूनी दायित्व (Legally Enforceable Liability) के भुगतान हेतु होना चाहिए।

चरण 2 – बैंक में चेक प्रस्तुत करना:- 

वादी/अधिवक्ता द्वारा चेक उसकी वैधता अवधि के भीतर बैंक में लगाया जाता है। वर्तमान में सामान्यतः चेक 3 माह तक वैध रहता है।


चरण 3 – चेक बाउंस होना:- 

बैंक द्वारा, बैंक चेक वापस कर देता है।, Return Memo जारी किया जाता है। 

उदाहरण:-
★ Funds Insufficient 
★ Account Closed 
★ Payment Stopped 
★ Signature Mismatch

चरण 4 – कानूनी नोटिस भेजना:- 

वादी के अधिवक्ता द्वारा चेक बाउंस की जानकारी मिलने से 30 दिनों के भीतर आरोपी को Legal Notice भेजा जाता है।

नोटिस में:-
★ चेक का विवरण 
★ राशि 
★ बाउंस होने की तिथि 
★ 15 दिनों में भुगतान करने की मांग लिखी जाती है।

चरण 5 – 15 दिन की प्रतीक्षा:-

यदि आरोपी:- 15 दिन के भीतर भुगतान कर देता है तो मामला समाप्त।, और यदि भुगतान नहीं करता तो धारा 138 का अपराध पूर्ण हो जाता है। यहीं से Cause of Action उत्पन्न होता है।


(मुकदमा दाखिल करने की प्रक्रिया)


चरण 6 – शिकायत (Complaint) तैयार करना:- 

अधिवक्ता द्वारा शिकायत में निम्न विवरण लिखे जाते हैं, 
★ पक्षकारों का नाम-पता, 
★चेक का विवरण, 
★लेन-देन का विवरण, 
★बैंक मेमो, 
★नोटिस का विवरण, 
★भुगतान न करने का तथ्य


चरण 7 – आवश्यक दस्तावेज संलग्न करना:- 

★ मूल चेक, 
★ बैंक रिटर्न मेमो, 
★ कानूनी नोटिस, 
★ डाक रसीद,  
★ ट्रैकिंग रिपोर्ट, 
★ शपथपत्र,  अन्य सहायक दस्तावेज

चरण 8 – न्यायालय में फाइलिंग:-

अधिवक्ता द्वारा शिकायत न्यायिक मजिस्ट्रेट के समक्ष दाखिल की जाती है।

★ फाइलिंग सेक्शन:
★ केस नंबर देता है। 
★ स्क्रूटनी करता है। 
★ कोर्ट में प्रस्तुत करता है।


(न्यायालय द्वारा प्रारम्भिक कार्यवाही)


चरण 9 – संज्ञान (Taking Cognizance)


मजिस्ट्रेट द्वारा:- मजिस्ट्रेट जांच करता है:-

✔ क्या चेक जारी हुआ था?
✔ क्या समय पर प्रस्तुत हुआ?
✔ क्या नोटिस समय पर भेजा गया?
✔ क्या शिकायत समय सीमा में दायर हुई?
यदि सभी शर्तें पूरी हों तो संज्ञान लिया जाता है।


चरण 10 – प्री-समन साक्ष्य:- 

NI Act की धारा 145 के अनुसार:-
शिकायतकर्ता अपना शपथपत्र दाखिल करता है आमतौर पर अलग से मौखिक गवाही नहीं कराई जाती Affidavit को साक्ष्य माना जाता है।

चरण 11 – समन आदेश:- 

मजिस्ट्रेट द्वारा Prima Facie अपराध पाए जाने पर आरोपी को समन जारी किया जाता है। BNSS के अनुसार इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से भी सेवा हो सकती है।


(आरोपी की उपस्थिति)


चरण 12 – समन की तामील:- 

समन की सेवा:-
★ डाक 
★ पुलिस 
★ ई-मेल, अन्य वैधानिक माध्यम से हो सकती है।


चरण 13 – आरोपी की पहली पेशी:-

आरोपी एवं अधिवक्ता द्वारा आरोपी स्वयं उपस्थित होता है। अथवा छूट प्रार्थना पत्र देता है।

चरण 14 – जमानत:- 

धारा 138 का अपराध जमानती है। आरोपी जमानत प्रार्थना पत्र देता है।, निजी मुचलका भरता है।, जमानत प्राप्त करता है।

(ट्रायल प्रारम्भ)


चरण 15 – आरोप का सार (Notice)

मजिस्ट्रेट द्वारा समन वाद होने के कारण औपचारिक आरोप नहीं बनता। न्यायालय आरोपी को बताती है आपके विरुद्ध धारा 138 NI Act का आरोप है।

आरोपी कहता है:- दोष स्वीकार है या दोष स्वीकार नहीं है।


चरण 16 – शिकायतकर्ता साक्ष्य (Complainant Evidence):- 

वादी का शपथपत्र पहले से रिकॉर्ड पर होता है। वादी निम्न दस्तावेज साबित करता है:

• चेक 
• मेमो 
• नोटिस 
• डाक रसीद

चरण 17 – जिरह (Cross Examination):- 

आरोपी के अधिवक्ता द्वारा वादी से प्रश्न पूछे जाते हैं:

• पैसा कब दिया गया? 
• कोई लिखित समझौता था? 
• चेक सुरक्षा हेतु दिया गया था या भुगतान हेतु? आदि। यही मुकदमे का सबसे महत्वपूर्ण चरण होता है।


(आरोपी पक्ष की कार्यवाही)


चरण 18 – BNSS धारा 351 का बयान (पूर्व CrPC धारा 313):- 

न्यायालय द्वारा आरोपी से पूछा जाता है आपके विरुद्ध यह साक्ष्य आया है। आप क्या कहना चाहते हैं? आरोपी अपना स्पष्टीकरण देता है।


चरण 19 – बचाव साक्ष्य (Defence Evidence):- 


यदि आरोपी चाहे तो:-

√ स्वयं गवाही दे सकता है। 
√ गवाह बुला सकता है। 
√ दस्तावेज दाखिल कर सकता है। 

उदाहरण:- 
• ऋण न होने का प्रमाण 
• भुगतान का प्रमाण 
• बैंक रिकॉर्ड

चरण 20 – बचाव गवाहों की जिरह:-

वादी का अधिवक्ता बचाव गवाहों से जिरह करता है।


(अंतिम चरण)


चरण 21 – अंतिम बहस:- 


दोनों अधिवक्ताओं द्वारा

1. वादी पक्ष:

• चेक जारी हुआ। 
• ऋण था। 
• नोटिस दिया गया। 
• सिद्ध करता है।

2. आरोपी पक्ष:

• कोई देनदारी नहीं थी। 
• चेक सुरक्षा हेतु था। 
• हस्ताक्षर विवादित हैं। 
जैसे तर्क देता है।


चरण 22 – निर्णय सुरक्षित:- 

न्यायालय बहस सुनकर आदेश सुरक्षित कर सकता है।


चरण 23 – निर्णय (Judgment):- 


यदि आरोपी दोषी पाया जाता है तो न्यायालय:-

• कारावास 
• जुर्माना 
• क्षतिपूर्ति (Compensation) 
दे सकता है। यदि आरोप सिद्ध नहीं होता तो आरोपी बरी (Acquitted) कर दिया जाता है।


(सजा के बाद)


चरण 24 – क्षतिपूर्ति वसूली:- 

यदि Compensation दिया गया है आरोपी भुगतान करता है। न करने पर वसूली की प्रक्रिया चल सकती है।

चरण 25 – अपील:- 

दोषसिद्धि पर आरोपी सत्र न्यायालय में अपील कर सकता है।, बरी होने पर शिकायतकर्ता वैधानिक उपाय अपना सकता है।

📘 NI Act धारा 138 (Cheque Bounce Case) की सम्पूर्ण कोर्ट प्रक्रिया – BNSS 2023 के अंतर्गत Step-by-Step आसान प्रारूप, PDF

नीचे वादी (Complainant), उसके अधिवक्ता तथा न्यायालय द्वारा की जाने वाली सम्पूर्ण प्रक्रिया क्रमवार दी जा रही है। आप इसे ऑनलाइन देख सकते हैं तथा डाउनलोड भी कर सकते हैं। ✍️⚖️




अस्वीकरण: लेख/प्रारूप में दिए गए वाद संख्या, सन, नाम, एड्रेस, दिनांक, मोबाइल नंबर या किसी भी प्रकार का लेख/प्रारूप काल्पनिक है यह लेख/प्रारूप मात्र जानकारी के लिए है जिसका किसी भी घटना के साथ मेल इस लेख/प्रारूप से कोई संबंध नहीं है सलाह सहित यह लेख/प्रारूप केवल सामान्य जानकारी प्रदान करता है. यह किसी भी तरह से योग्य अधिवक्ता राय का विकल्प नहीं है. अधिक जानकारी के लिए हमेशा किसी विशेषज्ञ या अपने अधिवक्ता से परामर्श करें. भारतीय न्याय संहिता (BNS) 2023  इस जानकारी के लिए ज़िम्मेदारी का दावा नहीं करता है

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