पूरे लेख का मूल प्रावधान (Bare Act Text):-
2. परिभाषाएं. - (1) इस अधिनियम में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो, -
(छ) "विवाद्यक तथ्य" से अभिप्रेत है और उसके अन्तर्गत, ऐसा कोई भी तथ्य जो स्वयं से, या अन्य तथ्यों के संसर्ग में किसी ऐसे अधिकार, दायित्व या निर्योग्यता के, जिसका किसी वाद या कार्यवाही में प्राख्यान या प्रत्याख्यान किया गया है, आता है, अस्तित्व, अनस्तित्व, प्रकृति या विस्तार की उत्पत्ति अवश्यमेव होती है।
स्पष्टीकरण. - जब कभी कोई न्यायालय विवाद्यक तथ्य को सिविल प्रक्रिया से सम्बन्धित किसी तत्समय प्रवृत्त विधि के उपबन्धों के अधीन अभिलिखित करता है, तब ऐसे विवाद्यक के उत्तर में जिस तथ्य का प्राख्यान या प्रत्याख्यान किया जाना है, वह विवाद्यक तथ्य है।
उदाहरण:- सुरेश की हत्या का राजेश अभियुक्त है। उसके विचारण में निम्नलिखित तथ्य विवाद्यक हो सकते हैं-
(i) यह कि राजेश ने सुरेश की मृत्यु कारित की।
(ii) यह कि राजेश का आशय सुरेश की मृत्यु कारित करने का था।
(iii) यह कि राजेश को सुरेश से गम्भीर और अचानक प्रकोपन मिला था।
(iv) यह कि सुरेश की मृत्यु कारित करते समय राजेश चित्त-विकृति के कारण उस कार्य की प्रकृति जानने में असमर्थ था;
BSA 2023 की धारा 2(1)(g) : “विवाद्यक तथ्य” का अर्थ और महत्व:-
भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 के स्थान पर लागू भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023 (Bharatiya Sakshya Adhiniyam, 2023) न्यायिक प्रक्रिया को अधिक आधुनिक और प्रभावी बनाने का प्रयास करता है। इस अधिनियम की धारा 2(1)(g) में “विवाद्यक तथ्य” (Fact in Issue) की परिभाषा दी गई है, जो किसी भी न्यायिक कार्यवाही का आधार माना जाता है।
सरल शब्दों में, विवाद्यक तथ्य वे तथ्य होते हैं जिनका अस्तित्व, अनस्तित्व, अधिकार, दायित्व या कानूनी स्थिति सीधे तौर पर मुकदमे के परिणाम को प्रभावित करती है। न्यायालय इन्हीं तथ्यों के आधार पर यह तय करता है कि किसी पक्ष का दावा सही है या नहीं।
विवाद्यक तथ्य की कानूनी परिभाषा:-
धारा 2(1)(g) के अनुसार, वे तथ्य जिनका अस्तित्व, अनस्तित्व, प्रकृति या सीमा किसी वाद, मुकदमे अथवा कार्यवाही में किसी अधिकार, दायित्व या दावे को स्थापित करने या नकारने के लिए आवश्यक हो, उन्हें विवाद्यक तथ्य कहा जाता है।
अर्थात् न्यायालय के समक्ष जिन मुख्य तथ्यों पर पक्षकारों के बीच विवाद होता है और जिनका निर्णय मुकदमे के परिणाम को प्रभावित करता है, वही विवाद्यक तथ्य कहलाते हैं।
विवाद्यक तथ्य का महत्व:-
न्यायिक प्रक्रिया में विवाद्यक तथ्य अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। किसी भी मुकदमे में साक्ष्य प्रस्तुत करने का उद्देश्य इन्हीं तथ्यों को सिद्ध या असिद्ध करना होता है। न्यायालय केवल उन्हीं साक्ष्यों पर विशेष ध्यान देता है जो विवाद्यक तथ्यों से संबंधित हों।
यदि कोई तथ्य विवाद्यक तथ्य नहीं है, तो सामान्यतः उस पर विस्तृत साक्ष्य की आवश्यकता नहीं होती। इसलिए मुकदमे की दिशा और परिणाम काफी हद तक विवाद्यक तथ्यों पर निर्भर करते हैं।
उदाहरण द्वारा समझें:-
मान लीजिए किसी व्यक्ति पर चोरी का आरोप लगाया गया है। ऐसे मामले में निम्नलिखित प्रश्न विवाद्यक तथ्य हो सकते हैं—
√ क्या आरोपी घटना स्थल पर मौजूद था?
√ क्या चोरी की गई वस्तु उसके कब्जे से बरामद हुई?
√ क्या आरोपी ने वास्तव में चोरी की घटना को अंजाम दिया?
√ इन प्रश्नों के उत्तर ही मुकदमे के निर्णय को प्रभावित करेंगे, इसलिए ये विवाद्यक तथ्य कहलाएंगे।
√ इसी प्रकार, किसी संपत्ति विवाद में यह प्रश्न कि “वास्तविक स्वामी कौन है” एक विवाद्यक तथ्य होगा।
साक्ष्य और विवाद्यक तथ्य का संबंध:-
विवाद्यक तथ्यों को सिद्ध करने के लिए पक्षकार दस्तावेजी साक्ष्य, मौखिक साक्ष्य, इलेक्ट्रॉनिक अभिलेख तथा अन्य स्वीकार्य प्रमाण न्यायालय में प्रस्तुत करते हैं। न्यायालय इन साक्ष्यों का मूल्यांकन करके यह निर्धारित करता है कि विवाद्यक तथ्य सिद्ध हुए हैं या नहीं।
यही कारण है कि प्रत्येक साक्ष्य का संबंध किसी न किसी विवाद्यक तथ्य से होना आवश्यक माना जाता है।
निष्कर्ष:-
BSA 2023 की धारा 2(1)(g) में वर्णित “विवाद्यक तथ्य” न्यायिक प्रक्रिया का मूल आधार है। किसी भी वाद या मुकदमे में न्यायालय का ध्यान मुख्य रूप से उन्हीं तथ्यों पर केंद्रित रहता है जो पक्षकारों के अधिकारों और दायित्वों को प्रभावित करते हैं। इसलिए विवाद्यक तथ्य की सही समझ न केवल विधि के विद्यार्थियों और अधिवक्ताओं के लिए बल्कि सामान्य नागरिकों के लिए भी आवश्यक है। यह अवधारणा न्यायालय को निष्पक्ष और साक्ष्य-आधारित निर्णय देने में सहायता प्रदान करती है।
| (IEA) की धारा 3, PARA 4 को (BSA) की धारा 2(1)G में बदल दिया गया है। - अगर आप चाहे तो लोगो पर क्लिक करके देख सकते है |
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