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BSA 2023 की धारा 19 – स्वीकृतियों का उन्हें करने वाले व्यक्तियों के विरुद्ध और उनके द्वारा साबित किया जाना


BSA 2023 की धारा 19 – स्वीकृतियों का उन्हें करने वाले व्यक्तियों के विरुद्ध और उनके द्वारा साबित किया जाना
काल्पनिक चित्र 


भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023 (Bharatiya Sakshya Adhiniyam, 2023 - BSA) का उद्देश्य न्यायालय में साक्ष्यों के नियमों को स्पष्ट और आधुनिक बनाना है। इस अधिनियम की धारा 19 स्वीकृतियों (Admissions) के संबंध में एक महत्वपूर्ण प्रावधान है। यह धारा बताती है कि किसी व्यक्ति द्वारा की गई स्वीकृति (Admission) किन परिस्थितियों में उस व्यक्ति के विरुद्ध तथा उसके द्वारा या उसकी ओर से न्यायालय में साबित की जा सकती है।

यह प्रावधान न्यायालय को यह निर्धारित करने में सहायता करता है कि किसी पक्ष द्वारा दिया गया कथन कब उसके खिलाफ साक्ष्य के रूप में उपयोग किया जा सकता है और कब वही कथन उसके पक्ष में भी स्वीकार किया जा सकता है।


Bare Act में लिखी हुई मूल भाषा (Bare Act Text):- 


BSA 2023 की धारा :- 19. स्वीकृतियों का उन्हें करने वाले व्यक्तियों के विरुद्ध और उनके द्वारा या उनकी ओर से साबित किया जाना.

 स्वीकृतियां उन्हें करने वाले व्यक्ति के या उसके हित प्रतिनिधि के विरुद्ध सुसंगत हैं और साबित की जा सकेंगी; किन्तु उन्हें करने वाले व्यक्ति द्वारा या उसकी ओर से या उसके हित प्रतिनिधि द्वारा निम्नलिखित अवस्थाओं में के सिवाय उन्हें साबित नहीं किया जा सकेगा, अर्थात् :-

(1) कोई स्वीकृति उसे करने वाले व्यक्ति द्वारा या उसकी ओर से तब साबित की जा सकेगी, जबकि वह इस प्रकृति की है है कि यदि उसे करने वाला व्यक्ति मर गया होता, तो वह अन्य व्यक्तियों के बीच धारा 26 के अधीन सुसंगत होती;

(2) कोई स्वीकृति उसे करने वाले व्यक्ति द्वारा या उसकी ओर से तब साबित की जा सकेगी, जबकि वह मन की या शरीर की सुसंगत या विवाद्य किसी दशा के अस्तित्व का ऐसा कथन है जो उस समय या उसके लगभग किया गया था जब मन की या शरीर की ऐसी दशा विद्यमान थी और ऐसे आचरण के साथ है जो उसकी असत्यता को अनधिसम्भाव्य कर देता है;

(3) कोई स्वीकृति उसे करने वाले व्यक्ति द्वारा या उसकी ओर से साबित की जा सकेगी, यदि वह स्वीकृति के रूप मे नहीं किन्तु अन्यथा सुसंगत है।

उदाहरण :- (क) जगदीश और मोहन के बीच प्रश्न यह है कि अमुक विलेख कूटरचित है या नहीं। जगदीश प्रतिज्ञात करता है कि वह असली है, मोहन प्रतिज्ञात करता है कि वह कूटरचित है। मोहन का कोई कथन है कि विलेख असली है, जगदीश साबित कर सकेगा तथा जगदीश का कोई कथन कि विलेख कूटरचित है, मोहन साबित कर सकेगा। किन्तु जगदीश अपना यह कथन कि विलेख असली है साबित नहीं कर सकेगा और न मोहन ही अपना यह कथन कि विलेख कूटरचित है सावित कर सकेगा।

(ख) किसी पोत के कप्तान, राजेश का विचारण उस पोत को संत्यक्त करने के लिए किया जाता है। यह दर्शित करने के लिए साक्ष्य दिया जाता है कि पोत अपने उचित मार्ग से बाहर ले जाया गया था। राजेश अपने कारबार के मामूली अनुक्रम में अपने द्वारा रखी जाने वाली वह पुस्तक पेश करता है जिसमें वे संप्रेक्षण दर्शित हैं, जिनके बारे में यह अभिकथित है कि वे दिन-प्रति-दिन किए गए थे और जिनसे उपर्दिशत है कि पोत अपने उचित मार्ग से बाहर नहीं ले जाया गया था। राजेश इन कथनों को साबित कर सकेगा क्योंकि, यदि उसकी मृत्यु हो गई होती तो वे कथन अन्य व्यक्तियों के बीच धारा 26 के खण्ड (ख) के अधीन ग्राह्य होते।

(ग) राजेश अपने द्वारा कोलकाता में किए गए अपराध का अभियुक्त है। वह अपने द्वारा लिखित और उसी दिन चेन्नई में दिनांकित और उसी दिन का चेन्नई डाकचिह्न धारण करने वाला पत्र पेश करता है। पत्र की तारीख में का कथन ग्राह्य है क्योंकि, यदि राजेश की मृत्यु हो गई होती, तो वह धारा 26 के खण्ड (ख) के अधीन ग्राह्य होता।

(घ) उमेश चुराए हुए माल को यह जानते हुए कि वह चुराया हुआ है प्राप्त करने का अभियुक्त है। वह यह साबित करने की प्रस्थापना करता है कि उसने उसे उसके मूल्य से कम में बेचने से इन्कार किया था। यद्यपि ये स्वीकृतियां हैं तथापि उमेश इन कथनों को साबित कर सकेगा, क्योंकि ये विवाद्यक तथ्यों से प्रभावित उसके आचरण के स्पष्टीकारक हैं।

(ङ) उमेश अपने कब्जे में कूटकृत मुद्रा, जिसका कूटकृत होना वह जानता था, कपटपूर्वक रखने का अभियुक्त है। वह यह साबित करने की प्रस्थापना करता है कि उसने एक कुशल व्यक्ति से उस सिक्के की परीक्षा करने को कहा था, क्योंकि उसे शंका थी कि वह कूटकृत है या नहीं और उस व्यक्ति ने उसकी परीक्षा की थी और उससे कहा था कि वह असली है। उमेश इन तथ्यों को साबित कर सकेगा।


धारा 19 का उद्देश्य

इस धारा का मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि—
• कोई व्यक्ति अपनी स्वीकारोक्ति से आसानी से मुकर न सके। 
• न्यायालय के समक्ष केवल विश्वसनीय और विधिसम्मत स्वीकृतियों को ही स्वीकार किया जाए।
• किसी पक्ष द्वारा किए गए कथन का उचित उपयोग न्यायिक प्रक्रिया में हो।
• झूठे या मनगढ़ंत दावों पर रोक लगाई जा सके।


स्वीकृति (Admission) क्या होती है?

स्वीकृति वह कथन है जिसमें कोई व्यक्ति किसी ऐसे तथ्य को स्वीकार करता है जो उसके हित के विरुद्ध या दूसरे पक्ष के पक्ष में जाता हो।
यह कथन—
• मौखिक हो सकता है।
• लिखित हो सकता है।
• इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड (जैसे ईमेल, व्हाट्सएप संदेश, एसएमएस आदि) के माध्यम से भी हो सकता है।


धारा 19 का सामान्य नियम

सामान्य रूप से—
• जिस व्यक्ति ने स्वीकृति की है, उसके विरुद्ध वह स्वीकृति न्यायालय में साबित की जा सकती है।
• अर्थात यदि किसी व्यक्ति ने कोई तथ्य स्वयं स्वीकार किया है, तो दूसरा पक्ष उस कथन का उपयोग उसके विरुद्ध कर सकता है।
उदाहरण के लिए—
यदि राम लिखित रूप से स्वीकार करता है कि उसने जगदीश से ₹2,00,000 उधार लिए हैं, तो जगदीश उस लिखित स्वीकारोक्ति को न्यायालय में राम के विरुद्ध प्रस्तुत कर सकता है।
• क्या स्वीकृति स्वयं के पक्ष में भी प्रयोग की जा सकती है?
• सामान्य नियम यह है कि कोई व्यक्ति अपनी बनाई हुई स्वीकृति को अपने ही पक्ष में साक्ष्य के रूप में प्रस्तुत नहीं कर सकता।
• लेकिन कुछ विशेष परिस्थितियों में ऐसा संभव है।


किन परिस्थितियों में स्वीकृति अपने पक्ष में भी साबित की जा सकती है?

धारा 19 के अंतर्गत कुछ अपवाद (Exceptions) भी हैं।

1. यदि स्वीकृति ऐसी हो जो अन्यथा भी प्रासंगिक तथ्य हो

यदि वह कथन किसी अन्य विधिक प्रावधान के कारण स्वयं ही प्रासंगिक (Relevant) है, तो उसे प्रस्तुत किया जा सकता है।

2. यदि कथन व्यक्ति के पक्ष में होने के बावजूद परिस्थितियाँ उसकी विश्वसनीयता सिद्ध करती हों

कुछ मामलों में यदि परिस्थितियाँ यह दर्शाती हैं कि कथन स्वाभाविक एवं विश्वसनीय है, तो न्यायालय उसे स्वीकार कर सकता है।

3. यदि विधि विशेष रूप से उसे स्वीकार करने की अनुमति देती हो

किसी विशेष कानून के अंतर्गत यदि ऐसे कथन को स्वीकार करने का प्रावधान हो, तो न्यायालय उसे मान सकता है।

उदाहरण:- (1) राम ने अपने मित्र को लिखा "मैंने श्याम से ₹5 लाख उधार लिए हैं।" यदि बाद में श्याम वसूली का मुकदमा दायर करता है, तो यह पत्र राम के विरुद्ध साक्ष्य बनेगा।

उदाहरण:- (2) यदि राम बाद में कहे 
"मैंने पहले ही पैसा लौटा दिया था।" केवल उसका स्वयं का यह कथन उसके पक्ष में पर्याप्त साक्ष्य नहीं माना जाएगा, जब तक कि उसे अन्य साक्ष्यों से सिद्ध न किया जाए।

उदाहरण:- (3) यदि किसी ईमेल में व्यक्ति ने किसी अनुबंध के उल्लंघन को स्वीकार किया है, तो वह ईमेल उसके विरुद्ध महत्वपूर्ण साक्ष्य बन सकता है।


इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड का महत्व

BSA 2023 डिजिटल साक्ष्यों को विशेष महत्व देता है।
आज निम्न माध्यमों में की गई स्वीकृतियाँ भी महत्वपूर्ण हो सकती हैं—
• ईमेल
• व्हाट्सएप चैट
• एसएमएस
• सोशल मीडिया संदेश
• वीडियो रिकॉर्डिंग
• ऑडियो रिकॉर्डिंग
• डिजिटल हस्ताक्षरित दस्तावेज

यदि इनकी प्रामाणिकता सिद्ध हो जाती है, तो इन्हें न्यायालय में प्रस्तुत किया जा सकता है।


न्यायालय किन बातों पर विचार करता है?

स्वीकृति स्वीकार करने से पहले न्यायालय सामान्यतः यह देखता है—
• क्या कथन स्वेच्छा से किया गया?
• क्या कथन वास्तविक है?
• क्या कथन प्रासंगिक तथ्य से संबंधित है?
• क्या कथन प्रमाणित किया गया है?
• क्या उसमें किसी प्रकार का दबाव, प्रलोभन या धोखा नहीं था?

धारा 19 का महत्व

यह धारा इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि—
• मुकदमों में सत्य स्थापित करने में सहायता करती है।
• अनावश्यक विवादों को कम करती है।
• पक्षकारों की जिम्मेदारी तय करती है।
• न्यायालय को विश्वसनीय साक्ष्य उपलब्ध कराती है।
• डिजिटल युग में इलेक्ट्रॉनिक स्वीकृतियों को भी महत्व देती है।


व्यावहारिक उपयोग

धारा 19 का उपयोग मुख्य रूप से निम्न मामलों में देखा जाता है—
• दीवानी वाद
• धन वसूली के मामले
• अनुबंध संबंधी विवाद
• संपत्ति विवाद
• व्यापारिक लेन-देन
• पारिवारिक विवाद
• इलेक्ट्रॉनिक दस्तावेजों से जुड़े मुकदमे


महत्वपूर्ण बिंदु

• स्वीकृति सामान्यतः उसे करने वाले व्यक्ति के विरुद्ध साक्ष्य होती है।
• व्यक्ति अपनी बनाई हुई स्वीकृति का सामान्यतः अपने पक्ष में लाभ नहीं ले सकता।
• कुछ विशेष परिस्थितियों में अपवाद लागू होते हैं।
• इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड भी स्वीकृति का माध्यम हो सकते हैं।
• न्यायालय प्रत्येक मामले के तथ्यों के आधार पर निर्णय लेता है।


निष्कर्ष

BSA 2023 की धारा 19 न्यायिक प्रक्रिया में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। यह सुनिश्चित करती है कि किसी व्यक्ति द्वारा किया गया स्वीकारात्मक कथन उसके विरुद्ध प्रभावी साक्ष्य के रूप में प्रयुक्त हो सके, जबकि उसी कथन का अपने पक्ष में उपयोग केवल सीमित और विधि द्वारा स्वीकृत परिस्थितियों में ही किया जा सके। डिजिटल युग में ईमेल, व्हाट्सएप संदेश और अन्य इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड के बढ़ते उपयोग को देखते हुए इस धारा का महत्व और अधिक बढ़ गया है। यदि पक्षकार अपने कथनों और दस्तावेजों के प्रति सावधानी बरतें तथा न्यायालय के समक्ष सत्य एवं प्रमाणिक साक्ष्य प्रस्तुत करें, तो न्यायिक प्रक्रिया अधिक निष्पक्ष, पारदर्शी और प्रभावी बन सकती है।


FAQ (अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न)

प्रश्न 1. BSA 2023 की धारा 19 किस विषय से संबंधित है?
उत्तर: यह स्वीकृतियों (Admissions) को उनके करने वाले व्यक्ति के विरुद्ध तथा कुछ परिस्थितियों में उनके द्वारा या उनकी ओर से साबित किए जाने से संबंधित है।

प्रश्न 2. क्या कोई व्यक्ति अपनी ही स्वीकृति का उपयोग अपने पक्ष में कर सकता है?
उत्तर: सामान्यतः नहीं। केवल विधि द्वारा मान्य विशेष परिस्थितियों में ही ऐसा संभव है।

प्रश्न 3. क्या व्हाट्सएप चैट या ईमेल भी स्वीकृति मानी जा सकती है?
उत्तर: हाँ, यदि उनकी प्रामाणिकता सिद्ध हो जाए तो वे इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य के रूप में स्वीकार किए जा सकते हैं।

प्रश्न 4. क्या हर स्वीकृति न्यायालय में स्वीकार की जाती है?
उत्तर: नहीं। न्यायालय उसकी प्रासंगिकता, प्रामाणिकता और वैधानिकता की जांच करता है।

प्रश्न 5. धारा 19 का सबसे बड़ा उद्देश्य क्या है?
उत्तर: न्यायालय के समक्ष विश्वसनीय स्वीकृतियों का उपयोग कर सत्य का पता लगाने और न्याय सुनिश्चित करने में सहायता करना।



(IEA) की धारा 21 को (BSA) की धारा 19 में बदल दिया गया है। - अगर आप चाहे तो लोगो पर क्लिक करके देख सकते है

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