| रश्मि चोपड़ा बनाम उत्तर प्रदेश एवं अन्य (2019) में धारा 498A, दहेज कानून और CrPC की धारा 482 पर सुप्रीम कोर्ट का महत्वपूर्ण निर्णय। |
रश्मि चोपड़ा बनाम उत्तर प्रदेश एवं अन्य (2019): धारा 498A पर सुप्रीम कोर्ट का महत्वपूर्ण निर्णय
रश्मि चोपड़ा बनाम उत्तर प्रदेश एवं अन्य (2019) भारतीय आपराधिक कानून में एक महत्वपूर्ण सुप्रीम कोर्ट का निर्णय है। यह फैसला विशेष रूप से IPC की धारा 498A, दहेज प्रतिषेध अधिनियम की धारा 3 और 4 तथा CrPC की धारा 482 के तहत आपराधिक कार्यवाही रद्द करने की न्यायालय की शक्ति से संबंधित है। सुप्रीम कोर्ट ने 30 अप्रैल 2019 को यह निर्णय न्यायमूर्ति अशोक भूषण और न्यायमूर्ति के. एम. जोसेफ की पीठ द्वारा सुनाया। इसका प्रमुख citation (2019) 15 SCC 357 है।
इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के सामने मुख्य प्रश्न यह था कि क्या पति के परिवार के कई सदस्यों के विरुद्ध लगाए गए सामान्य और अस्पष्ट आरोपों के आधार पर धारा 498A तथा दहेज प्रतिषेध कानून के तहत आपराधिक कार्यवाही जारी रखी जा सकती है। न्यायालय ने तथ्यों और पूर्व निर्णयों का परीक्षण करते हुए अधिकांश आरोपियों के विरुद्ध कार्यवाही को रद्द कर दिया, जबकि एक आरोपी के विरुद्ध कुछ विशिष्ट आरोपों से संबंधित कार्यवाही जारी रखने की अनुमति दी।
मामले की पृष्ठभूमि
नयन चोपड़ा का विवाह वंशिका बोबल से 15 अप्रैल 2012 को हुआ था। विवाह के बाद दोनों पति-पत्नी अमेरिका चले गए और नवंबर 2013 के आसपास अलग रहने लगे। बाद में नयन चोपड़ा ने 23 अक्टूबर 2014 को अमेरिका के मिशिगन राज्य की अदालत में तलाक की कार्यवाही शुरू की।
इसके बाद वंशिका के पिता की ओर से उत्तर प्रदेश में शिकायत की गई। शिकायत में पति के परिवार के सदस्यों पर दहेज की मांग और उत्पीड़न के आरोप लगाए गए। शिकायत को CrPC की धारा 156(3) के तहत आगे बढ़ाया गया और बाद में उसे शिकायत के रूप में दर्ज किया गया। मजिस्ट्रेट ने 17 जनवरी 2017 को आरोपियों को IPC की धारा 498A, 323, 504, 506 तथा दहेज प्रतिषेध अधिनियम की धारा 3/4 के तहत समन किया।
आरोपियों ने CrPC की धारा 482 के तहत इलाहाबाद हाई कोर्ट में कार्यवाही रद्द करने की मांग की, लेकिन हाई कोर्ट ने उनकी याचिका स्वीकार नहीं की। इसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।
सुप्रीम कोर्ट के सामने प्रमुख कानूनी प्रश्न
मामले में कई महत्वपूर्ण प्रश्न सामने आए। पहला, क्या धारा 498A और दहेज प्रतिषेध अधिनियम के तहत लगाए गए सामान्य एवं अस्पष्ट आरोप प्रथमदृष्टया अपराध बनाते हैं?
दूसरा, क्या पति के परिवार के प्रत्येक सदस्य को केवल पारिवारिक संबंध के आधार पर आपराधिक मामले में आरोपी बनाया जा सकता है?
तीसरा, क्या CrPC की धारा 482 के तहत हाई कोर्ट ऐसी आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर सकता है जो न्यायिक प्रक्रिया के दुरुपयोग के रूप में सामने आती हो?
चौथा, क्या धारा 498A की शिकायत केवल पीड़ित महिला ही दर्ज करा सकती है या उसके पिता जैसे व्यक्ति द्वारा की गई शिकायत भी कानूनन स्वीकार्य हो सकती है?
सुप्रीम कोर्ट ने इन सभी पहलुओं पर विस्तार से विचार किया।
धारा 323, 504 और 506 IPC से संबंधित आरोप
सुप्रीम कोर्ट ने शिकायत के एक अलग हिस्से का भी परीक्षण किया। 8 नवंबर 2014 की कथित घटना के संबंध में मारपीट, गाली-गलौज और धमकी के आरोप मुख्य रूप से राजेश चोपड़ा और दो अज्ञात व्यक्तियों के विरुद्ध लगाए गए थे।
न्यायालय ने पाया कि अन्य अपीलकर्ताओं के विरुद्ध इन अपराधों के संबंध में शिकायत या गवाहों के बयानों में कोई विशिष्ट आरोप नहीं था। इसलिए अन्य आरोपियों को धारा 323, 504 और 506 के तहत समन करना उचित नहीं था।
हालांकि राजेश चोपड़ा के विरुद्ध इन धाराओं के संबंध में विशिष्ट आरोप और शिकायतकर्ता तथा दो गवाहों के समर्थन में बयान मौजूद थे। इसलिए सुप्रीम कोर्ट ने इस सीमित हिस्से में कार्यवाही जारी रखने की अनुमति दी।
धारा 498A और दहेज प्रतिषेध अधिनियम पर न्यायालय की महत्वपूर्ण टिप्पणी
सुप्रीम कोर्ट ने शिकायत में लगाए गए धारा 498A और दहेज प्रतिषेध अधिनियम की धारा 3/4 के आरोपों का ध्यानपूर्वक परीक्षण किया। न्यायालय ने पाया कि आरोप सामान्य और व्यापक (general and sweeping) प्रकृति के थे और किसी आरोपी के विरुद्ध विशेष घटना, तारीख या विशिष्ट भूमिका का पर्याप्त विवरण नहीं दिया गया था।
न्यायालय ने यह भी देखा कि विवाह के बाद पति-पत्नी नवंबर 2013 से अलग रह रहे थे और शिकायत बाद में उस समय की गई जब अमेरिका में तलाक की कार्यवाही शुरू हो चुकी थी। मिशिगन की तलाक कार्यवाही में दोनों पक्षों के बीच संपत्ति और अन्य मामलों का निपटारा भी हुआ था। सुप्रीम कोर्ट ने इन परिस्थितियों को समग्र रूप से देखते हुए शिकायत को तलाक की कार्यवाही के counter blast के रूप में माना और कहा कि इसे आरोपियों को परेशान करने के उद्देश्य से दायर किया गया प्रतीत होता है।
भजन लाल सिद्धांत और CrPC की धारा 482
इस फैसले का सबसे महत्वपूर्ण कानूनी पहलू State of Haryana v. Bhajan Lal में निर्धारित सिद्धांतों से संबंधित है। सुप्रीम कोर्ट ने दोहराया कि हाई कोर्ट के पास CrPC की धारा 482 के तहत ऐसी कार्यवाही को रद्द करने की अंतर्निहित शक्ति है जो न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग बन जाए।
भजन लाल मामले में ऐसी परिस्थितियों की उदाहरणात्मक श्रेणियां बताई गई थीं जिनमें आपराधिक कार्यवाही को रद्द किया जा सकता है। इनमें वह स्थिति भी शामिल है जहां आरोप प्रथमदृष्टया अपराध नहीं बनाते या कार्यवाही दुर्भावनापूर्ण उद्देश्य से शुरू की गई प्रतीत होती है।
रश्मि चोपड़ा मामले में सुप्रीम कोर्ट ने माना कि धारा 498A और दहेज कानून के आरोपों के संबंध में मामला Bhajan Lal की Category 7 के अंतर्गत आता है। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि न्यायिक प्रक्रिया को उत्पीड़न या प्रतिशोध का साधन नहीं बनाया जाना चाहिए।
क्या धारा 498A की शिकायत केवल पत्नी ही कर सकती है?
इस मामले में एक महत्वपूर्ण कानूनी प्रश्न यह भी था कि शिकायत वंशिका ने स्वयं नहीं, बल्कि उसके पिता ने की थी। सुप्रीम कोर्ट ने इस आधार पर शिकायत को अवैध मानने से इनकार किया।
न्यायालय ने धारा 498A के प्रावधान का विश्लेषण करते हुए कहा कि कानून में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है जिससे यह निष्कर्ष निकले कि धारा 498A की शिकायत केवल वही महिला दर्ज कर सकती है जिसके साथ कथित क्रूरता हुई है। इसलिए पीड़ित महिला के पिता द्वारा की गई शिकायत केवल इस आधार पर अस्वीकार्य नहीं हो जाती।
यह फैसला इस पहलू पर महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे स्पष्ट होता है कि शिकायतकर्ता की पहचान और आरोपों की वास्तविक कानूनी सामग्री को अलग-अलग देखा जाना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट का अंतिम निर्णय
सुप्रीम कोर्ट ने अधिकांश अपीलों को स्वीकार करते हुए संबंधित आरोपियों के विरुद्ध शिकायत और 17 जनवरी 2017 के समन आदेश को रद्द कर दिया। विशेष रूप से धारा 498A तथा दहेज प्रतिषेध अधिनियम की धारा 3/4 के तहत कार्यवाही को समाप्त कर दिया गया।
राजेश चोपड़ा के मामले में निर्णय अलग रहा। उनके विरुद्ध धारा 498A तथा दहेज प्रतिषेध अधिनियम की कार्यवाही रद्द कर दी गई, लेकिन IPC की धारा 323, 504 और 506 के तहत कार्यवाही जारी रखने की अनुमति दी गई क्योंकि उन आरोपों के संबंध में विशिष्ट तथ्य और गवाहों के बयान मौजूद थे।
इस प्रकार यह कहना सही नहीं होगा कि सुप्रीम कोर्ट ने पूरे मामले की सभी आपराधिक कार्यवाही को बिना किसी अपवाद के समाप्त कर दिया था। निर्णय आंशिक रूप से अलग-अलग आरोपों और अलग-अलग आरोपियों के आधार पर दिया गया था।
इस फैसले का कानूनी महत्व
रश्मि चोपड़ा बनाम उत्तर प्रदेश का फैसला वैवाहिक विवादों से जुड़े आपराधिक मामलों में महत्वपूर्ण मार्गदर्शन देता है। इसका मुख्य संदेश यह है कि किसी व्यक्ति को केवल इसलिए आपराधिक मुकदमे में शामिल नहीं किया जाना चाहिए क्योंकि वह पति का रिश्तेदार है।
यदि शिकायत में प्रत्येक आरोपी के विरुद्ध विशिष्ट आरोप नहीं हैं और सभी परिवार के सदस्यों के विरुद्ध एक जैसे सामान्य आरोप लगाए गए हैं, तो न्यायालय को यह देखना होगा कि क्या वास्तव में प्रथमदृष्टया अपराध बनता है। सुप्रीम कोर्ट ने इसी कारण सामान्य और अस्पष्ट आरोपों के आधार पर अधिकांश आरोपियों के विरुद्ध कार्यवाही समाप्त की।
यह निर्णय CrPC की धारा 482 के महत्व को भी स्पष्ट करता है। इस धारा का उद्देश्य न्यायालय को ऐसी स्थिति में हस्तक्षेप करने की शक्ति देना है जहां आपराधिक प्रक्रिया न्याय के बजाय उत्पीड़न का माध्यम बन रही हो। हालांकि धारा 482 की शक्ति का प्रयोग सामान्य रूप से नहीं, बल्कि न्याय के हित और निर्धारित न्यायिक सिद्धांतों के अनुसार किया जाना चाहिए।
निष्कर्ष
रश्मि चोपड़ा बनाम उत्तर प्रदेश एवं अन्य (2019) धारा 498A, दहेज प्रतिषेध अधिनियम और CrPC की धारा 482 से संबंधित महत्वपूर्ण सुप्रीम कोर्ट निर्णय है। इस फैसले ने यह स्पष्ट किया कि वैवाहिक विवाद में पति के परिवार के सदस्यों के विरुद्ध केवल सामान्य और अस्पष्ट आरोप लगाकर आपराधिक कार्यवाही को अनिश्चित रूप से जारी नहीं रखा जा सकता।
सुप्रीम कोर्ट ने तथ्यों, शिकायत की प्रकृति, तलाक की कार्यवाही और आरोपियों की विशिष्ट भूमिका को ध्यान में रखते हुए अधिकांश आरोपियों के विरुद्ध कार्यवाही रद्द की। साथ ही राजेश चोपड़ा के विरुद्ध विशिष्ट आरोपों से संबंधित धारा 323, 504 और 506 IPC की कार्यवाही को जारी रखा गया।
इस निर्णय का महत्व इस बात में है कि आपराधिक कानून का उद्देश्य वास्तविक अपराध की जांच और न्याय सुनिश्चित करना है, न कि अस्पष्ट आरोपों के आधार पर निर्दोष व्यक्तियों को अनावश्यक उत्पीड़न का सामना कराना। इसलिए यह फैसला धारा 498A से जुड़े मामलों में आरोपों की विशिष्टता, प्रथमदृष्टया अपराध और CrPC की धारा 482 के न्यायसंगत प्रयोग को समझने के लिए उपयोगी है।

