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Sessions Trial: सत्र विचारण की पूरी प्रक्रिया | BNSS धारा 248-258

Sessions Trial: सत्र विचारण की पूरी प्रक्रिया | BNSS धारा 248-258
सेशन ट्रायल (Sessions Trial) 


भारतीय न्याय प्रणाली में सेशन ट्रायल (Sessions Trial) अत्यंत गंभीर और जघन्य अपराधों (जैसे मर्डर, डकैती, बलात्कार आदि) के लिए सत्र न्यायालय (Court of Session) में चलाया जाने वाला मुख्य विचारण (Trial) है। नए आपराधिक कानूनों के तहत यह पूरी प्रक्रिया भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) के अध्याय 19 (धारा 248 से 258), भारतीय न्याय संहिता, 2023 (BNS) और भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023 (BSA) के नियमों के अनुसार बेहद बारीकी से संचालित होती है। 

इसमें जज, वकील (अभियोजन और बचाव पक्ष) तथा साक्ष्यों की भूमिका को चरण-दर-चरण और सटीक धाराओं के साथ नीचे समझाया गया है:- 


◆ चरण 1:- प्री-ट्रायल स्टेज (Pre-Trial Stage) - FIR से चार्जशीट तक


1. प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) या ई-एफआईआर दर्ज होना


■ प्रावधान:- BNSS की धारा 173 (संज्ञेय मामलों में सूचना) (पुरानी CrPC 154)

● उदाहरण के तौर पर:-  

पुलिस/शिकायतकर्ता:- किसी संज्ञेय अपराध (Cognizable Offence) की सूचना पर थाने में FIR दर्ज होती है। BNSS धारा 173(1) के तहत ई-एफआईआर (e-FIR) भी दर्ज कराई जा सकती है (जिसे 3 दिन के भीतर हस्ताक्षर करना होता है)।

BNS की भूमिका:- अपराध की परिभाषा और तय होने वाला दंड BNS (भारतीय न्याय संहिता) की धाराओं (जैसे हत्या के लिए BNS धारा 103, बलात्कार के लिए BNS धारा 64 आदि) के तहत तय होता है।


2. पुलिस जांच, साक्ष्य संकलन और रिमांड


■ प्रावधान:- BNSS की धारा 174 (असंज्ञेय मामलों के बारे में सूचना और ऐसे मामलों का अन्वेषण)(पुरानी CrPC 155)  से 187, BSA की धाराएं (जैसे 61, 62, 63, 39 आदि)

● उदाहरण के तौर पर:-  

★ पुलिस/जांच अधिकारी (IO):- घटनास्थल का मुआयना, गवाहों के बयान BNSS धारा 180 (पुलिस द्वारा साक्षियों की परीक्षा)(पुरानी CrPC 161) के बयान दर्ज करना।

★ BSA की भूमिका:- डिजिटल साक्ष्य (कॉल रिकॉर्ड, सीसीटीवी) BSA धारा 61-63 के तहत और BSA धारा 63(4) के अनिवार्य इलेक्ट्रॉनिक सर्टिफिकेट के साथ सील किए जाते हैं। फोरेंसिक/मेडिकल रिपोर्ट BSA धारा 39-50 (विशेषज्ञ की राय) के तहत जुटाई जाती है।

★ रिमांड :- BNSS धारा 187 (जब चौबीस घंटे के भीतर अन्वेषण पूरा न किया जा सके, तब प्रक्रिया) (पुरानी CrPC 167) :- आरोपी को 24 घंटे के भीतर मजिस्ट्रेट के सामने पेश कर पुलिस/न्यायिक कस्टडी कुल मिलाकर पूर्णतः या भागतः 15 दिन से अधिक की न होगी  (अधिकतम 60 से 90 दिन) ली जाती है।


3. पुलिस रिपोर्ट या चार्जशीट (Police Report / Charge Sheet)


■ प्रावधान:- BNSS की धारा 193 (अन्वेषण के समाप्त हो जाने पर पुलिस अधिकारी की रिपोर्ट) (पुरानी CrPC 173)

● उदाहरण के तौर पर:-  

★ जांच पूरी होने के बाद पुलिस सेशन कोर्ट या कमिट करने के लिए मजिस्ट्रेट के पास चार्जशीट दाखिल करती है।


◆ चरण 2:- कमिटमेंट स्टेज (Committal Stage) - सेशन कोर्ट को मामला भेजना


4. मजिस्ट्रेट द्वारा मामला सेशन कोर्ट को सुपुर्द करना (Committal)


■ प्रावधान:- BNSS की धारा 232 (जब अपराध अनन्यतः सेशन न्यायालय द्वारा विचारणीय है तब मामला उसे सुपुर्द करना) (पुरानी CrPC 209)

   ● उदाहरण के तौर पर:-  

 ★ मजिस्ट्रेट:- चूंकि गंभीर अपराधों का ट्रायल मजिस्ट्रेट नहीं कर सकते, इसलिए वे BNSS की धारा 230 (अभियुक्त को पुलिस रिपोर्ट या अन्य दस्तावेजों की प्रतिलिपि देना) (पुरानी CrPC 207)   के तहत आरोपी को चार्जशीट और दस्तावेजों की प्रति मुफ्त मिलने की पुष्टि करने के बाद, मामले को कंसर्न सेशन कोर्ट के पास 'कमिट' (Commit) कर देते हैं।


◆ चरण 3:- सेशन कोर्ट में ट्रायल की शुरुआत (Trial Stage in Sessions Court)


5. सेशन कोर्ट में प्रवेश और लोक अभियोजक (Public Prosecutor) की नियुक्ति


■ प्रावधान:- BNSS की धारा 248 ( विचारण का संचालन लोक अभियोजक द्वारा किया जाना ) (पुरानी CrPC 225)

   ● उदाहरण के तौर पर:-  

★ जज (Sessions Judge):- केस रजिस्टर होने पर ट्रायल शुरू करते हैं।

★ सरकारी वकील (Public Prosecutor - PP):- सेशन कोर्ट में सरकार और पीड़ित की तरफ से केस की पैरवी करने का अधिकार केवल पी.पी. (Public Prosecutor) का होता है। (पीड़ित का प्राइवेट वकील पी.पी. की मदद कर सकता है - BNSS धारा 248/301) (पुरानी CrPC 301/266)


6. अभियोजन पक्ष का प्रारंभिक कथन (Opening of the Case)


 ■ प्रावधान:- BNSS की धारा 249 (अभियोजन के मामले के कथन का आरम्भ) (पुरानी CrPC 226)

  ● उदाहरण के तौर पर:-  

★ सरकारी वकील (PP):- अदालत में खड़े होकर 'ओपनिंग स्टेटमेंट' देते हैं—वे जज को बताते हैं कि आरोपी पर BNS की किस धारा के तहत आरोप है और वे किन साक्ष्यों से इसे साबित करेंगे।


7. डिस्चार्ज (आरोपमुक्त करने) पर सुनवाई


■ प्रावधान:- BNSS की धारा 250 (उन्मोचन ) / (पुरानी CrPC 227)

 ● उदाहरण के तौर पर:-  

 ★ प्राइवेट वकील (बचाव पक्ष / Defense Counsel):- चार्ज फ्रेम होने से पहले डिस्चार्ज एप्लीकेशन लगाते हैं और जज को चार्जशीट के कागजात दिखाकर साबित करते हैं कि प्रथम दृष्टया (Prima Facie) कोई मामला नहीं बनता।

 ★ सरकारी वकील (PP):- इसका विरोध करते हैं।

 ★ जज:- यदि मामला पूरी तरह झूठा या आधारहीन है, तो BNSS धारा 250 के तहत आरोपी को डिस्चार्ज (आरोपमुक्त) कर देते हैं। यदि मामला बनता है, तो आगे बढ़ते हैं।


8. आरोप तय करना (Framing of Charges) और दोष स्वीकार


■ प्रावधान:- BNSS की धारा 251 (आरोप विरचित करना) (पुरानी CrPC 228)

• और धारा 252 (दोषी होने के अभिवचन) (पुरानी CrPC 229)

 ● उदाहरण के तौर पर:-  

★ जज:- BNS की उपयुक्त धाराओं के तहत लिखित आरोप तैयार करते हैं और आरोपी को पढ़कर व समझाकर पूछते हैं— "क्या आप गुनाह कबूल करते हैं या ट्रायल चाहते हैं?"

 ★ आरोपी / प्राइवेट वकील:- यदि आरोपी गुनाह कबूल करता है (BNSS धारा 252), तो जज सजा दे सकते हैं। यदि वह कहता है "मैं ट्रायल फेस करूँगा", तो साक्ष्य की प्रक्रिया शुरू होती है।


◆ चरण 4:- साक्ष्य और विचारण (Evidence & Examination)


9. अभियोजन पक्ष के साक्ष्य और गवाहों की जिरह (Prosecution Evidence)


 ■ प्रावधान:- BNSS की धारा 253 (अभियोजन साक्ष्य के लिए तारीख) (पुरानी CrPC 230)

• 254 (अभियोजन के लिए साक्ष्य) (पुरानी CrPC 231) एवं BSA, 2023 के नियम

 ● उदाहरण के तौर पर:-  

 ★ सरकारी वकील (PP):- अपने गवाहों को अदालत में बुलाते हैं। BSA के तहत उनकी मुख्य परीक्षा (Examination-in-Chief) कराते हैं।

 ★ प्राइवेट वकील (Defense Counsel):- अभियोजन के गवाहों से तीखी प्रति-परीक्षा (Cross-Examination) करते हैं ताकि उनके बयानों में विरोधाभास (Contradiction) निकालकर उनकी पोल खोली जा सके।

 ★ डिजिटल साक्ष्य (BSA):- यदि कोई डिजिटल सबूत है, तो BSA धारा 61-63 और BSA धारा 63(4) के सर्टिफिकेट के साथ उसे कोर्ट में साबित किया जाता है।

 ★ जज:- गवाहों के बयानों को रिकॉर्ड करते हैं और आपत्ति आने पर वैधानिक निर्णय देते हैं।


10. आरोपी का व्यक्तिगत परीक्षा-परीक्षण (Examination of the Accused)


 ■ प्रावधान:- BNSS की धारा 351 (अभियुक्त की परीक्षा करने की शक्ति) (पुरानी CrPC 313)
 ● उदाहरण के तौर पर:-  

 ★ जज:- अभियोजन साक्ष्य खत्म होने पर आरोपी को अदालत में बुलाते हैं। गवाहों द्वारा आए हर सबूत और आरोप को पढ़कर पूछते हैं— "इस पर आपका क्या कहना है?" (यह बयान बिना शपथ के होता है)।

★ प्राइवेट वकील:- अपने मुवक्किल (आरोपी) को सलाह देते हैं कि वह अपनी सफाई में क्या और कैसे उत्तर दे।


11. बचाव पक्ष के साक्ष्य (Defense Evidence)


■ प्रावधान:- BNSS की धारा 256 (प्रतिरक्षा आरम्भ करना) (पुरानी CrPC 233) 

 ● उदाहरण के तौर पर:-  

★ प्राइवेट वकील (Defense Counsel):- आरोपी की बेगुनाही साबित करने के लिए अपने गवाह या दस्तावेज कोर्ट में पेश करते हैं। डिफेंस वकील उनकी मुख्य परीक्षा करते हैं।

 ★ सरकारी वकील (PP):- बचाव पक्ष के गवाहों की क्रॉस-एग्जामिनेशन (जिरह) करते हैं।



◆ चरण 5:- बहस और निर्णय (Arguments & Judgment)



12. अंतिम बहस (Final Arguments)

■ प्रावधान:- BNSS की धारा 257 (बहस) (पुरानी CrPC 234)

 ● उदाहरण के तौर पर:-  

★ सरकारी वकील (PP):- अपने साक्ष्यों और BNS की धाराओं के पक्ष में अंतिम बहस करते हैं।

 ★ प्राइवेट वकील (Defense Counsel):- पुलिस जांच की कमियों, BSA के सबूतों की खामियों और कानून के बिंदुओं को उठाते हुए अपने मुवक्किल को निर्दोष साबित करने की जोरदार दलील देते हैं।


13. निर्णय (Judgment) - दोषसिद्धि या दोषमुक्ति


■ प्रावधान:- BNSS की धारा 258 (दोषमुक्ति या दोषसिद्धि का निर्णय) (पुरानी CrPC 235)

● उदाहरण के तौर पर:-  

 ★ जज:- दोनों पक्षों की बहस सुनने के बाद (नए नियमों के तहत आमतौर पर बहस के 30 से 45 दिनों के भीतर) फैसला लिखते और सुनाते हैं।

 ★ यदि साक्ष्य कमजोर हैं $\rightarrow$ आरोपी दोषमुक्त (Acquittal) होता है।

 ★ यदि अपराध संदेह से परे साबित हो $\rightarrow$ आरोपी दोषी (Convicted) करार दिया जाता है।


14. सजा पर सुनवाई (Hearing on Sentence)


 ■ प्रावधान:- BNSS की धारा 393 (निर्णय की भाषा और अंतर्वस्तु) (पुरानी CrPC 354)

 ● उदाहरण के तौर पर:-  

 यदि आरोपी दोषी करार दिया जाता है, तो जज तुरंत सजा नहीं सुनाते। BNSS धारा 393 के तहत सजा की मात्रा पर विशेष सुनवाई होती है।

★ प्राइवेट वकील:- आरोपी की पहली बार अपराध करने, परिवार की स्थिति आदि का हवाला देकर कम सजा या नरमी की मांग करते हैं।

★ सरकारी वकील (PP):- अपराध की क्रूरता के आधार पर अधिकतम सजा की मांग करते हैं।

 ★ जज:- दोनों पक्षों को सुनकर BNS के तहत अंतिम सजा का आदेश पारित करते हैं।



◆ चरण 6:- पोस्ट-ट्रायल स्टेज (Post-Trial Stage) - अपील (Appeal)


15. उच्च न्यायालय (High Court) में अपील


■ प्रावधान:- BNSS की धारा 415 (पुरानी CrPC 374):-  ( दोषसिद्धि से अपील) 
• BNSS की धारा  419 (पुरानी CrPC 372):-(दोष मुक्ति की दशा में अपील) (दोषी की अपील) 

• BNSS की धारा 413 (पुरानी CrPC 372):- ( जब तक अनन्य उपबन्धित न हो किसी अपील का न होना) 

• BNSS की धारा 378 (पुरानी CrPC 339):-( नातेदार या मित्र की देख - रेख  के लिए मानसिक विकृत चित्त का सौपा जाना) (पीड़ित या सरकार की अपील)

 ● उदाहरण के तौर पर:-  

★ दोषी का प्राइवेट वकील:- यदि सेशन कोर्ट ने सजा सुना दी है, तो इस फैसले के खिलाफ उच्च न्यायालय (High Court) में अपील (Criminal Appeal) दायर करते हैं और सजा पर रोक (Suspension of Sentence - BNSS धारा 430) / (पुरानी CrPC 389 ):- ( अपील लंबित रहने तक दण्डादेश का निलम्बन, अपीलार्थी का जमानत पर छोड़ा जाना) की मांग करते हैं।

★ पीड़ित (Victim) का अधिकार (BNSS धारा 413) /(पुरानी CrPC 372):-(जब तक अनन्य उपबन्धित न हो किसी अपील का न होना)  यदि सेशन कोर्ट ने आरोपी को बरी कर दिया है या बहुत कम सजा दी है, तो पीड़ित बिना किसी विशेष अनुमति के सीधे हाई कोर्ट में अपील कर सकता है।

★ उच्च न्यायालय के जज:- अपील की फाइल पर सुनवाई करते हैं, रिकॉर्ड मंगवाते हैं और दोनों पक्षों के वकीलों (हाई कोर्ट के अधिवक्ताओं) की दलीलें सुनकर फैसला बदलते या बरकरार रखते हैं।

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भारतीय न्याय प्रणाली में सत्र न्यायालय (Sessions Court) में चलने वाले सेशन ट्रायल (Sessions Trial) की पूरी प्रक्रिया—FIR से लेकर ऊपरी अदालत में अपील तक

बचाव पक्ष के वकील (Defense Lawyer) की भूमिका के साथ बेहद बारीकी से नीचे प्रस्तुत किया गया है:-

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नोट: यह लेख सामान्य कानूनी जानकारी के उद्देश्य से है। किसी विशेष मामले में जमानत या गिरफ्तारी से संबंधित निर्णय लेने से पहले संबंधित कानून और मामले के वर्तमान तथ्यों के आधार पर योग्य अधिवक्ता से सलाह लेना उचित है।

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