| Parvathi Nairthi vs Laxmi Nairthy |
सुप्रीम कोर्ट केस:- Parvathi Nairthi (Dead) & Ors. vs. Laxmi Nairthy (Dead) Through LRs & Ors.
भारत में संपत्ति और उत्तराधिकार से जुड़े विवादों में वसीयत (Will) की वैधता हमेशा एक महत्वपूर्ण कानूनी विषय रहा है। इसी विषय पर भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने 21 मई 2026 को पार्वती नैरथी बनाम लक्ष्मी नैरथ्य मामले में एक महत्वपूर्ण निर्णय सुनाया। इस फैसले में न्यायालय ने स्पष्ट किया कि केवल पत्नी और बच्चों को संपत्ति से बाहर रखना किसी वसीयत को अवैध घोषित करने का पर्याप्त आधार नहीं है।
इस फैसले में वसीयत के निष्पादन, गवाहों की गवाही, संदिग्ध परिस्थितियों, राजस्व रिकॉर्ड और उत्तराधिकार कानून से जुड़े कई महत्वपूर्ण कानूनी सिद्धांतों की व्याख्या की गई है।
1. पार्वती नैरथी बनाम लक्ष्मी नैरथ्य केस की जानकारी इस मामले का विवरण निम्नलिखित है:
केस का नाम:- Parvathi Nairthi (Dead) and Others vs. Laxmi Nairthy (Dead) Through LRs and Others
न्यायालय:- भारत का सर्वोच्च न्यायालय
अपील संख्या:- Civil Appeal No. 6859 of 2014
SLP संख्या:- SLP (Civil) No. 12822 of 2013
निर्णय की तारीख:- 21 मई 2026
निर्णय संख्या:- 2026 INSC 521
पीठ:- न्यायमूर्ति उज्जल भुइयां और न्यायमूर्ति विजय बिश्नोई
यह अपील कर्नाटक उच्च न्यायालय के 15 नवंबर 2012 के निर्णय के विरुद्ध दायर की गई थी।
2. क्या था पूरा संपत्ति विवाद?
• इस मामले में बी. शीना नैरी नाम के व्यक्ति की संपत्ति को लेकर विवाद उत्पन्न हुआ था। वे मुंबई में रहते थे और चार्टर्ड अकाउंटेंट के रूप में कार्य करते थे। उनकी कर्नाटक के उडुपी तालुक के ब्रह्मावर और चांथार गांव में भी अचल संपत्तियां थीं।
• बी. शीना नैरी के परिवार में पत्नी पार्वती नैरथी, पांच बच्चे, दो भाई और दो बहनें थीं।
• 15 मई 1983 को उन्होंने एक वसीयत तैयार की, जिसके माध्यम से अपनी संपत्तियां अपनी बहन लक्ष्मी नैरथ्य के पक्ष में कर दीं। इसी वसीयत में पहले दिए गए पावर ऑफ अटॉर्नी को भी निरस्त करने की बात कही गई थी।
• 30 नवंबर 1983 को बी. शीना नैरी का निधन हो गया।
• उनकी मृत्यु के बाद पत्नी पार्वती नैरथी ने राजस्व अधिकारियों के समक्ष संपत्ति अपने नाम दर्ज कराने के लिए आवेदन किया। इसके बाद संपत्ति के स्वामित्व को लेकर परिवार के सदस्यों के बीच विवाद शुरू हो गया।
• लक्ष्मी नैरथ्य ने वसीयत के आधार पर 22 नवंबर 1990 को दीवानी मुकदमा दायर किया और संपत्ति पर अपना अधिकार घोषित करने की मांग की।
3. निचली अदालतों ने क्या फैसला दिया?
• मामले की सुनवाई के दौरान वसीयत की वास्तविकता और उसके निष्पादन को लेकर सवाल उठाए गए।
• ट्रायल कोर्ट ने 16 दिसंबर 2008 को लक्ष्मी नैरथ्य के पक्ष में फैसला सुनाया। अदालत ने वसीयत को वैध मानते हुए उन्हें संबंधित संपत्तियों का मालिक घोषित किया।
• इसके बाद प्रथम अपीलीय अदालत ने भी ट्रायल कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा।
• पार्वती नैरथी और अन्य पक्षकारों ने इसके बाद कर्नाटक उच्च न्यायालय में दूसरी अपील दायर की। उच्च न्यायालय ने 15 नवंबर 2012 को उनकी अपील खारिज कर दी।
इसके बाद मामला भारत के सर्वोच्च न्यायालय पहुंचा।
4. सुप्रीम कोर्ट के सामने मुख्य कानूनी सवाल
• सर्वोच्च न्यायालय के सामने मुख्य प्रश्न यह था कि क्या निचली अदालतों द्वारा वसीयत को वैध मानने के निष्कर्षों में हस्तक्षेप करने का कोई पर्याप्त आधार मौजूद है?
• अपीलकर्ताओं की ओर से वसीयत की प्रामाणिकता, हस्ताक्षरों, वसीयत पेश करने में देरी और गवाहों की विश्वसनीयता पर सवाल उठाए गए।
• न्यायालय ने पूरे रिकॉर्ड और उपलब्ध साक्ष्यों का परीक्षण किया।
5. वसीयत साबित करने के लिए क्या जरूरी है?
• इस फैसले में न्यायालय ने भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम, 1925 की धारा 63 और भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 की धारा 68 के कानूनी प्रावधानों पर विचार किया।
• सामान्य रूप से वसीयत को वैध रूप से साबित करने के लिए निम्नलिखित बातें महत्वपूर्ण हैं:
• वसीयत बनाने वाले व्यक्ति ने अपनी स्वतंत्र इच्छा से वसीयत बनाई हो।
• वसीयतकर्ता ने दस्तावेज पर हस्ताक्षर किए हों या अपने निशान लगाए हों।
• कम से कम दो गवाहों ने निर्धारित कानूनी प्रक्रिया के अनुसार वसीयत का सत्यापन किया हो।
• सामान्य परिस्थितियों में कम से कम एक उपलब्ध और सक्षम सत्यापन गवाह को अदालत में बुलाकर गवाही कराई जाए।
• यदि वसीयत के आसपास कोई संदिग्ध परिस्थिति हो, तो उसे दूर करने की जिम्मेदारी वसीयत के आधार पर अधिकार मांगने वाले व्यक्ति पर होती है।
• इस मामले में बी. जगन्नाथ नैरी ने सत्यापन गवाह के रूप में गवाही दी। उनकी गवाही के आधार पर वसीयत के निष्पादन को साबित माना गया।
6. क्या पत्नी और बच्चों को संपत्ति से बाहर रखना गलत है?
• इस फैसले का एक महत्वपूर्ण कानूनी पहलू यह है कि किसी व्यक्ति को अपनी संपत्ति के संबंध में वसीयत बनाने का अधिकार है।
• सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि केवल इस आधार पर वसीयत को संदिग्ध नहीं माना जा सकता कि उसमें पत्नी या बच्चों को संपत्ति नहीं दी गई है।
• मामले में वसीयत में यह उल्लेख था कि पत्नी और बच्चों को पहले ही पर्याप्त संपत्ति और सुविधाएं दी जा चुकी हैं।
• इसलिए केवल प्राकृतिक उत्तराधिकारियों को वसीयत में संपत्ति नहीं देने के आधार पर वसीयत को अमान्य नहीं माना गया।
• हालांकि, इसका अर्थ यह नहीं है कि हर ऐसी वसीयत अपने आप वैध होगी। यदि धोखाधड़ी, दबाव, जालसाजी या अन्य वास्तविक संदिग्ध परिस्थितियां मौजूद हों, तो अदालत उनकी जांच कर सकती है।
7. राजस्व रिकॉर्ड में नाम दर्ज होने से मालिकाना हक मिलता है?
• इस मामले में संपत्ति के म्यूटेशन यानी राजस्व रिकॉर्ड में नाम दर्ज कराने का मुद्दा भी सामने आया।
• सर्वोच्च न्यायालय ने स्थापित कानूनी सिद्धांत को दोहराया कि राजस्व रिकॉर्ड में नाम दर्ज होने से अपने आप संपत्ति का मालिकाना हक पैदा नहीं होता और न ही समाप्त होता है।
• म्यूटेशन का मुख्य उद्देश्य राजस्व और कर संबंधी प्रशासनिक कार्यों के लिए संपत्ति धारक का नाम दर्ज करना है।
• इसलिए केवल राजस्व रिकॉर्ड में नाम दर्ज होने के आधार पर किसी व्यक्ति को संपत्ति का अंतिम मालिक नहीं माना जा सकता।
8. क्या बिना रजिस्ट्रेशन की वसीयत वैध हो सकती है?
• वसीयत के पंजीकरण को लेकर भी इस फैसले में महत्वपूर्ण कानूनी पहलू सामने आया।
• कानून के अनुसार सामान्यतः वसीयत का पंजीकरण अनिवार्य नहीं है। इसलिए केवल इस आधार पर कि वसीयत रजिस्टर्ड नहीं है, उसे अवैध नहीं कहा जा सकता।
• लेकिन वसीयत का निष्पादन और कानूनी सत्यापन आवश्यक है। उसे कानून में निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार साबित करना भी जरूरी है।
9. सुप्रीम कोर्ट का अंतिम फैसला क्या था?
• सभी तथ्यों, दस्तावेजों और गवाहों की गवाही का परीक्षण करने के बाद सर्वोच्च न्यायालय ने पाया कि निचली अदालतों ने वसीयत की वैधता के संबंध में उचित निष्कर्ष निकाले थे।
• न्यायालय ने कर्नाटक उच्च न्यायालय के निर्णय में हस्तक्षेप करने का कोई पर्याप्त आधार नहीं पाया।
• इसलिए 21 मई 2026 को सर्वोच्च न्यायालय ने Civil Appeal No. 6859 of 2014 को खारिज कर दिया और पहले दिए गए निर्णय को बरकरार रखा।
मामले में लंबित आवेदन भी निस्तारित किए गए और खर्चों के संबंध में कोई आदेश नहीं दिया गया।
10. इस फैसले से आम लोगों को क्या सीख मिलती है?
• पार्वती नैरथी बनाम लक्ष्मी नैरथ्य का यह फैसला संपत्ति और उत्तराधिकार विवादों के लिए महत्वपूर्ण है।
• इससे कुछ प्रमुख बातें समझ में आती हैं:
• वसीयत बनाने वाला व्यक्ति कानून के अनुसार अपनी संपत्ति का वितरण कर सकता है।
• केवल पत्नी या बच्चों को वसीयत में संपत्ति नहीं देना उसे अवैध नहीं बनाता।
• वसीयत को कानून के अनुसार साबित करना आवश्यक है।
• वसीयत के सत्यापन गवाह की गवाही महत्वपूर्ण होती है।
• संदिग्ध परिस्थितियों को दूर करना वसीयत के आधार पर दावा करने वाले की जिम्मेदारी है।
• म्यूटेशन एंट्री अपने आप मालिकाना हक का प्रमाण नहीं है।
• केवल पंजीकरण न होने से वसीयत अवैध नहीं हो जाती।
निष्कर्ष
सर्वोच्च न्यायालय का यह निर्णय बताता है कि संपत्ति संबंधी विवादों में केवल पारिवारिक संबंधों या राजस्व रिकॉर्ड के आधार पर अधिकार तय नहीं किए जा सकते। वसीयत की वास्तविकता, कानूनी प्रक्रिया, गवाहों की गवाही और पूरे मामले की परिस्थितियों को ध्यान में रखकर ही न्यायालय निर्णय करता है।

