Type Here to Get Search Results !

क्या पुलिस दबाव या लालच में ली गई संस्वीकृति कोर्ट में मान्य है? जानिए कानून

क्या पुलिस दबाव या लालच में ली गई संस्वीकृति कोर्ट में मान्य है? जानिए कानून
कब अमान्य हो जाती है अभियुक्त की संस्वीकृति?


भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023 (BSA) की धारा 22: उत्प्रेरणा, धमकी, प्रपीड़न या वचन द्वारा कराई गई संस्वीकृति कब विसंगत होती है? 

भारतीय आपराधिक न्याय प्रणाली (Criminal Justice System) में 'संस्वीकृति' (Confession) साक्ष्य का एक अत्यंत महत्वपूर्ण और संवेदनशील पहलू है। आपराधिक मुकदमों में अभियुक्त का स्वयं अपराध स्वीकार करना एक बड़ा प्रमाण माना जाता है, लेकिन इसके साथ ही यह सुनिश्चित करना भी अनिवार्य है कि यह स्वीकारोक्ति पूरी तरह से स्वेच्छा से की गई हो। 

नए कानूनों के अंतर्गत, भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023 (Bharatiya Sakshya Adhiniyam, 2023 - BSA) ने पुराने भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 का स्थान लिया है। BSA 2023 की धारा 22 (Section 22) यह निर्धारित करती है कि उत्प्रेरणा (Inducement), धमकी (Threat), प्रपीड़न (Coercion), या वचन (Promise) के तहत कराई गई संस्वीकृति दाण्डिक कार्यवाही (Criminal Proceedings) में कब विसंगत (Irrelevant / Inadmissible) मानी जाएगी।

यह लेख धारा 22 के कानूनी प्रावधानों, इसके मुख्य तत्वों और न्यायालय में इसकी सुसंगतता (Relevance) का गहन विश्लेषण प्रस्तुत करता है।


1. धारा 22 का मूल प्रावधान क्या है?

भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023 की धारा 22 के अनुसार:- 

Bare Act में लिखी हुई मूल भाषा (Bare Act Text):- उत्प्रेरणा, धमकी, प्रपीड़न या वचन द्वारा कराई गई संस्वीकृति दाण्डिक कार्यवाही में कब विसंगत होती है:- अभियुक्त व्यक्ति द्वारा की गई संस्वीकृति दाण्डिक कार्यवाही में विसंगत होती है, यदि उसके किए जाने के बारे में न्यायालय को प्रतीत होता हो कि अभियुक्त व्यक्ति के विरुद्ध आरोप के बारे में वह ऐसी उत्प्रेरणा, धमकी, प्रपीड़न या वचन द्वारा कराई गई है जो प्राधिकारवान व्यक्ति की ओर से दिया गया है और जो न्यायालय की राय में इसके लिए पर्याप्त हो कि वह अभियुक्त व्यक्ति को यह अनुमान करने के लिए उसे युक्तियुक्त प्रतीत होने वाले आधार देती है कि उसके करने से वह अपने विरुद्ध कार्यवाहियों के बारे में ऐहिक रूप का कोई फायदा उठाएगा या ऐहिक रूप की किसी बुराई का परिवर्जन कर लेगा :

परंतु यदि संस्वीकृति ऐसे उत्प्रेरण, धमकी, प्रपीड़न या वचन से कारित हुआ है, पूर्णतः दूर हो जाने के पश्चात् की गई है, तो यह सुसंगत है :

परंतु यदि ऐसी संस्वीकृति अन्यथा सुसंगत है, तो वह केवल इसलिए कि वह गुप्त रखने के वचन के अधीन या उसे अभिप्राप्त करने के प्रयोजनार्थ अभियुक्त व्यक्ति से की गई प्रवंचना के परिणामस्वरूप, या उस समय जब कि वह मत्त था, की गई थी या इसलिए की वह ऐसे प्रश्नों के, चाहे उनका रूप कैसा ही क्यों न रहा हो, उत्तर में की गई थी जिनका उत्तर देना उसके लिए आवश्यक नहीं था, या केवल इसलिए की उसे यह चेतावनी नहीं दी गई थी कि वह ऐसी संस्वीकृति करने के लिए आबद्ध नहीं था और कि उसके विरुद्ध उसका साक्ष्य दिया जा सकेगा, विसंगत नहीं हो जाती।

सरल शब्दों में, यदि किसी आरोपी व्यक्ति पर दबाव बनाकर, उसे किसी प्रकार का लालच देकर, डरा-धमकाकर या किसी राहत का झूठा वादा करके अपराध स्वीकार कराया जाता है, तो ऐसा बयान अदालत में साक्ष्य (Evidence) के रूप में स्वीकार नहीं किया जाएगा।


2. धारा 22 को लागू करने के लिए आवश्यक कानूनी तत्व

किसी संस्वीकृति को धारा 22 के तहत विसंगत और अमान्य ठहराने के लिए निम्नलिखित शर्तों का पूरा होना आवश्यक है:-

(i) संस्वीकृति का उत्प्रेरणा, धमकी, प्रपीड़न या वचन से प्रेरित होना 

बयान स्वेच्छा से नहीं, बल्कि दबाव या लालच के कारण दिया गया होना चाहिए।

उत्प्रेरणा (Inducement):- अभियुक्त को यह लालच देना कि सच बोलने पर उसे लाभ मिलेगा। 

धमकी (Threat):- शारीरिक या मानसिक क्षति पहुँचाने का डर दिखाना। 

प्रपीड़न (Coercion):- किसी अनुचित बल या दबाव का प्रयोग करना। 

वचन (Promise):- सजा कम कराने या राहत दिलाने का कोई झूठा आश्वासन देना। 


(ii) दबाव 'प्राधिकारवान व्यक्ति' (Person in Authority) द्वारा दिया गया हो:- उत्प्रेरणा या धमकी किसी ऐसे व्यक्ति की ओर से आनी चाहिए जिसके पास मामले को प्रभावित करने की कानूनी या व्यावहारिक शक्ति हो। उदाहरण के लिए: -

• पुलिस अधिकारी 

• मजिस्ट्रेट 

• जांच अधिकारी या लोक सेवक 

• नियोक्ता (यदि अपराध कार्यस्थल से संबंधित हो)

यदि दबाव किसी सामान्य नागरिक या अजनबी द्वारा दिया गया है, तो वह इस धारा के तहत सीधे विसंगत नहीं माना जाएगा (जब तक कि वह प्राधिकारवान व्यक्ति की ओर से काम न कर रहा हो)।


(iii) संदर्भ आपराधिक आरोप से जुड़ा होना चाहिए:- दी गई धमकी या वचन का सीधा संबंध अभियुक्त के विरुद्ध चल रहे आपराधिक आरोप या मामले से होना चाहिए। 

(iv) अभियुक्त के मन में युक्तियुक्त आशंका (Reasonable Apprehension):- अदालत को यह लगना चाहिए कि दबाव का प्रभाव ऐसा था जिससे अभियुक्त ने यह मान लिया कि अपराध स्वीकार करने से उसे तात्कालिक लाभ मिलेगा या वह किसी सांसारिक बुराई (Physical or Legal Evil) से बच जाएगा।


3. संस्वीकृति कब सुसंगत (Relevant) बन जाती है? 

भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023 में धारा 22 के अपवाद और प्रभाव से संबंधित स्थितियाँ भी स्पष्ट की गई हैं:- 

प्रभाव का समाप्त हो जाना:- यदि अदालत को यह विश्वास हो जाता है कि उत्प्रेरणा, धमकी या वचन का असर पूरी तरह से खत्म हो चुका है और उसके बाद अभियुक्त ने अपनी इच्छा से बयान दिया है, तो वह संस्वीकृति अदालत में सुसंगत और स्वीकार्य हो जाती है। 

गोपनीयता या धोखे से ली गई संस्वीकृति:- यदि कोई संस्वीकृति गोपनीयता के वादे पर, कपट (Deception) से, मद्यपान (Drunk state) की स्थिति में, या बिना चेतावनी दिए ली गई है कि इसका उपयोग उसके खिलाफ हो सकता है, तो केवल इन कारणों से वह विसंगत नहीं हो जाती (जब तक कि उसमें जबरदस्ती शामिल न हो)। 


4. कानून के पीछे का मुख्य उद्देश्य

BSA 2023 की धारा 22 को शामिल करने के मुख्य उद्देश्य निम्नलिखित हैं:

मानवाधिकारों की सुरक्षा:- पुलिस या जांच एजेंसियों द्वारा 'थर्ड डिग्री' या अनुचित दबाव के प्रयोग को रोकना।

सत्यता सुनिश्चित करना:- भय या लालच में दिया गया बयान अक्सर असत्य हो सकता है, जिससे निर्दोष को सजा मिलने का जोखिम रहता है।

निष्पक्ष विचारण (Fair Trial):- संविधान और न्यायशास्त्र के सिद्धांतों के अनुरूप अभियुक्त को निष्पक्ष सुनवाई का अधिकार प्रदान करना।


5. निष्कर्ष

भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023 (BSA) की धारा 22 आपराधिक न्यायशास्त्र के मौलिक सिद्धांत—"जब तक दोष सिद्ध न हो, अभियुक्त निर्दोष है"—को मजबूती प्रदान करती है। यह धारा यह स्पष्ट संदेश देती है कि केवल संस्वीकृति प्राप्त कर लेना ही काफी नहीं है, बल्कि उसका ऐच्छिक (Voluntary) और सच्चा (True) होना अनिवार्य है। यदि कोई स्वीकारोक्ति प्रपीड़न, धमकी या झूठे वादे पर आधारित है, तो कानून की नजर में उसका कोई मूल्य नहीं रह जाता

अस्वीकरण: यह लेख केवल सामान्य कानूनी जानकारी और शैक्षणिक उद्देश्यों के लिए है। किसी भी वास्तविक कानूनी मामले, मुकदमे या विवाद की स्थिति में किसी विशेषज्ञ अधिवक्ता (Advocate) से विधिक सलाह अवश्य लें।

एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ
* Please Don't Spam Here. All the Comments are Reviewed by Admin.