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न्यायिक रूप से कार्य करते हुए न्यायाधीश का कार्य और संरक्षण

न्यायिक रूप से कार्य करते हुए न्यायाधीश का कार्य और संरक्षण
न्यायिक रूप से कार्य करते हुए न्यायाधीश 

भारतीय न्याय संहिता, 2023 (BNS) की धारा - 15 

(न्यायिक रूप से कार्य करते हुए न्यायधीश का कार्य) 

पूरे लेख का मूल प्रावधान (Bare Act Text):-  कोई बात अपराध नही, जो न्यायिक रूप से कार्य करते हुए न्यायधीश द्वारा किसी शक्ति के प्रयोग में की जाती हैं जिसके बारे में उसे सदभावपूर्वक  विश्वास है कि उसके पास वह है या उसे विधि द्वारा दी गई है 


भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा-15: न्यायिक रूप से कार्य करते हुए न्यायाधीश का कार्य 

भारतीय न्याय संहिता, 2023 (Bharatiya Nyaya Sanhita - BNS) के लागू होने के बाद से आपराधिक कानून में कई बदलाव और स्पष्टीकरण आए हैं। पुराने भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 77 के समकक्ष ही भारतीय न्याय संहिता की धारा-15 को स्थान दिया गया है। यह धारा देश की न्याय व्यवस्था और न्यायाधीशों की स्वतंत्रता व निष्पक्षता को सुनिश्चित करने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।


इस लेख में हम धारा-15 (न्यायिक रूप से कार्य करते हुए न्यायाधीश का कार्य) के कानूनी प्रावधानों, उसके उद्देश्यों, और इसके दायरे को विस्तार से समझेंगे।

धारा-15 क्या है? (What is Section 15 of BNS?) 

भारतीय न्याय संहिता की धारा-15 के अनुसार:- सरल शब्दों में कहें तो, यदि कोई न्यायाधीश अपने न्यायिक पद पर रहते हुए, कानून के दायरे में रहकर कोई निर्णय देता है या कार्य करता है, तो उसका वह कृत्य किसी भी स्थिति में "अपराध" की श्रेणी में नहीं आएगा। भले ही वह निर्णय बाद में गलत क्यों न साबित हो जाए, लेकिन यदि न्यायाधीश ने उसे सद्भावनापूर्वक (बिना किसी दुर्भावना या व्यक्तिगत द्वेष के) किया है, तो उसे पूर्ण कानूनी संरक्षण प्राप्त है।


इस प्रावधान का मुख्य उद्देश्य (Objective)

किसी भी देश में स्वतंत्र और निष्पक्ष न्यायपालिका का होना लोकतंत्र का आधार होता है। यदि न्यायाधीशों को अपने फैसलों के लिए व्यक्तिगत रूप से डरना पड़े, तो वे कभी भी निष्पक्ष और निडर होकर फैसले नहीं दे पाएंगे।

निडर होकर न्याय करना:- न्यायाधीश बिना किसी दबाव, डर या पक्षपात के समाज में न्याय स्थापित कर सकें, इसके लिए उन्हें यह सुरक्षा दी गई है।

न्यायिक स्वतंत्रता की रक्षा:- यह प्रावधान सुनिश्चित करता है कि न्यायाधीश अपने आधिकारिक कर्तव्यों का पालन स्वतंत्र रूप से कर सकें।

अभियोजन से सुरक्षा:- यदि कोई पक्षकार न्यायाधीश के फैसले से असंतुष्ट है, तो उसके पास ऊपरी अदालत (High Court / Supreme Court) में अपील या समीक्षा का अधिकार है, न कि वह संबंधित न्यायाधीश पर आपराधिक मुकदमा दर्ज करा सकता है।


धारा-15 के लागू होने के लिए आवश्यक शर्तें (Essential Ingredients)

इस धारा का लाभ उठाने के लिए कुछ शर्तों का पूरा होना अनिवार्य है:- 

न्यायिक क्षमता (Judicial Capacity):- कार्य करते समय व्यक्ति का न्यायाधीश के रूप में कार्य करना आवश्यक है। वह केवल प्रशासनिक या व्यक्तिगत क्षमता में कार्य न कर रहा हो। 

कानूनी अधिकार या सद्विश्वास (Legal Power or Good Faith):- न्यायाधीश के पास या तो वास्तव में कानून द्वारा वह शक्ति होनी चाहिए, या फिर उसे पूरी ईमानदारी और सद्भावना (Good Faith) के साथ यह विश्वास होना चाहिए कि कानून उसे यह शक्ति देता है। 

दुर्भावना का अभाव:- यदि यह साबित हो जाता है कि न्यायाधीश ने किसी निजी स्वार्थ, रिश्वत या दुर्भावना के कारण कोई अवैध कार्य किया है, तो इस धारा का संरक्षण समाप्त हो जाता है।


उदाहरण द्वारा समझें:- 

1. उदाहरण:-  मान लीजिए एक न्यायाधीश ने किसी मामले में कानूनी प्रक्रिया का पालन करते हुए एक आरोपी को वारंट जारी किया या सजा सुनाई। बाद में उच्च न्यायालय में अपील के दौरान यह पाया गया कि प्रक्रियागत त्रुटि के कारण वह फैसला तकनीकी रूप से सही नहीं था और उसे रद्द कर दिया गया।

ऐसी स्थिति में, उस न्यायाधीश पर यह आरोप नहीं लगाया जा सकता कि उसने कोई 'अपराध' (जैसे किसी को अवैध रूप से बंदी बनाना) किया है। धारा-15 के तहत न्यायाधीश पूरी तरह सुरक्षित है, क्योंकि उसने अपने न्यायिक कर्तव्य का पालन सद्भावनापूर्वक किया था। 


निष्कर्ष (Conclusion)

भारतीय न्याय संहिता की धारा-15 न्याय प्रणाली का एक अहम स्तंभ है। यह प्रावधान न केवल न्यायाधीशों के अधिकारों की रक्षा करता है, बल्कि नागरिकों के लिए भी एक निष्पक्ष न्याय व्यवस्था का मार्ग प्रशस्त करता है। इसके बिना, न्यायपालिका का सुचारू और स्वतंत्र रूप से कार्य करना असंभव सा हो जाता है।


(IPC) की धारा 77 को (BNS) की धारा 15 में बदल दिया गया है।
(IPC) की धारा 77 को (BNS) की धारा 15 में बदल दिया गया है।


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