आर्टिकल: परिवाद (Complaint) क्या है? समझें सरल भाषा में
भारतीय कानून प्रणाली में न्याय पाने के मुख्य रूप से दो रास्ते होते हैं—पहला पुलिस के माध्यम से और दूसरा सीधे अदालत के माध्यम से। जब कोई पीड़ित पुलिस के पास जाने के बजाय सीधे कोर्ट का रुख करता है, तो उसे परिवाद (Private Complaint) कहा जाता है।
परिवाद की परिभाषा (BNSS 2023 के अनुसार)
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023 की धारा 2(1)(g) के तहत परिवाद को परिभाषित किया गया है। इसके अनुसार: “मजिस्ट्रेट द्वारा कार्रवाई करने के उद्देश्य से मौखिक या लिखित रूप में लगाया गया वह आरोप, जिसमें किसी ज्ञात या अज्ञात व्यक्ति द्वारा अपराध करने की बात कही गई हो, परिवाद कहलाता है।” इसमें पुलिस द्वारा दाखिल रिपोर्ट (चार्जशीट) शामिल नहीं होती।
परिवाद और एफआईआर (FIR) में मुख्य अंतर
दर्ज करने का स्थान:- एफआईआर (FIR) पुलिस थाने में दर्ज होती है, जबकि परिवाद सीधे मजिस्ट्रेट के सामने कोर्ट में पेश किया जाता है।
जांच अधिकारी:- एफआईआर में पुलिस खुद जांच (Investigation) करती है, जबकि परिवाद में मजिस्ट्रेट स्वयं साक्ष्य लेता है और आवश्यकता पड़ने पर ही धारा 224 BNSS के तहत पुलिस को जांच का निर्देश देता है।
आरोपी की सुनवाई:- BNSS की धारा 223 के तहत परिवाद में कोर्ट संज्ञान लेने से पहले आरोपी को भी अपनी बात रखने का अवसर देता है, जो FIR मामलों में प्राथमिक स्तर पर नहीं होता।
परिवाद कब और क्यों दर्ज किया जाता है?
जब पुलिस सुनवाई न करे:- यदि पुलिस स्टेशन में अपराध की FIR दर्ज करने से इनकार कर दिया जाए।
असंज्ञेय अपराध (Non-Cognizable Offences):- ऐसे मामले जहाँ पुलिस को बिना वारंट अरेस्ट करने या जांच करने का सीधा अधिकार नहीं होता।
विशेष कानूनी मामले:- जैसे चेक बाउंस (Section 138 NI Act), मानहानि (Defamation) या पारिवारिक/वैवाहिक विवाद, जिनमें कानूनन सीधे परिवाद ही दाखिल किया जाता है
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) के तहत परिवाद (Private Complaint) की पूरी अदालती प्रक्रिया को व्यावहारिक और आसान शब्दों में चरण-दर-चरण इस प्रकार समझा जा सकता है:
1. परिवाद पत्र दाखिल करना (Filing of Complaint) — धारा 223 BNSS
• प्रक्रिया: पीड़ित (परिवादी) अपने अधिवक्ता के माध्यम से सक्षम मजिस्ट्रेट के समक्ष लिखित शिकायत पेश करता है।
• संलग्न दस्तावेज: परिवाद पत्र के साथ शपथ पत्र (Affidavit), वकालतनामा, गवाहों की सूची और घटना से संबंधित सभी उपलब्ध दस्तावेज जमा किए जाते हैं।
2. परिवादी का बयान व आरोपी को सुनवाई — धारा 223 BNSS
• प्राथमिक बयान (Statement on Oath): मजिस्ट्रेट परिवादी और उपस्थित गवाहों के बयान शपथ पर दर्ज करता है।
• BNSS का नया और बड़ा बदलाव: धारा 223(1) के तहत मजिस्ट्रेट संज्ञान लेने से पहले आरोपी को भी नोटिस देकर अपना पक्ष रखने (Opportunity of being heard) का अवसर देता है, जो पुरानी CrPC में नहीं था।
3. जांच या पुलिस अन्वेषण (Inquiry or Investigation) — धारा 224 BNSS
• यदि मजिस्ट्रेट को लगता है कि प्रस्तुत तथ्यों के आधार पर सीधे समन जारी करने के लिए पर्याप्त आधार स्पष्ट नहीं हैं, तो वह:
• स्वयं मामले की जांच (Inquiry) कर सकता है, या
• पुलिस अधिकारी को मामले की छानबीन कर रिपोर्ट प्रस्तुत करने का आदेश दे सकता है।
4. परिवाद पर मजिस्ट्रेट का निर्णय
जांच या बयानों के आधार पर दो स्थितियां बनती हैं:
स्थिति A (परिवाद ख़ारिज होना - धारा 225 BNSS): यदि प्रथम दृष्टया (Prima Facie) अपराध का कोई आधार नहीं बनता, तो कोर्ट लिखित कारणों के साथ परिवाद खारिज कर देती है।
स्थिति B (आदेशिका/समन जारी होना - धारा 227 BNSS): यदि मामला बनने का पर्याप्त आधार दिखता है, तो कोर्ट आरोपी को अदालत में हाजिर होने के लिए समन या वारंट जारी करती है।
5. आरोपी की उपस्थिति व प्रतियां मिलना — धारा 231 BNSS
• समन/वारंट मिलने पर आरोपी कोर्ट में उपस्थित होता है और अपनी जमानत (Bail) करवाता है।
• धारा 231 के तहत कोर्ट आरोपी को परिवाद की प्रति, धारा 223 के तहत दर्ज बयानों की प्रति और संलग्न दस्तावेजों की प्रतियां नि:शुल्क उपलब्ध कराती है।
6. विचारण / ट्रायल (Trial Procedure)
अदालत मामले की गंभीरता (सजा की अवधि) के आधार पर दो प्रक्रियाओं में से एक अपनाती है:
(क) वारंट मामला (2 साल से अधिक सजा वाले अपराध) — धारा 267 से 273 BNSS
साक्ष्य पूर्व आरोप (Pre-Charge Evidence - धारा 267): परिवादी अपने पक्ष के मुख्य गवाहों के बयान दर्ज कराता है। आरोपी का वकील उनसे जिरह (Cross-examination) करता है।
उन्मोचन / डिस्चार्ज (Discharge - धारा 268): यदि साक्ष्यों के आधार पर केस बेबुनियाद लगता है, तो आरोपी को यहीं छोड़ दिया जाता है।
आरोप तय होना (Framing of Charge - धारा 269): यदि अपराध बनता दिखता है, तो कोर्ट आरोपी पर औपचारिक आरोप (Charge) तय करती है।
आरोप उपरांत साक्ष्य (Post-Charge Evidence - धारा 270): परिवादी अपने बचे हुए साक्ष्य और गवाह प्रस्तुत करता है।
(ख) समन मामला (2 साल तक की सजा वाले अपराध) — धारा 274 से 282 BNSS
• इसमें फॉर्मल चार्ज नहीं बनाया जाता। आरोपी को केवल धारा 274 के तहत आरोप का सारांश (Notice) सुनाया जाता है और सीधे गवाहियों व जिरह की प्रक्रिया शुरू हो जाती है।
7. अभियुक्त का बयान — धारा 351 BNSS
• परिवादी के साक्ष्य समाप्त होने के बाद, कोर्ट धारा 351 BNSS (पुरानी CrPC की धारा 313) के तहत आरोपी से मामले की परिस्थितियों और साक्ष्यों पर उसका पक्ष पूछती है।
8. बचाव पक्ष का साक्ष्य (Defense Evidence)
• यदि आरोपी अपने बचाव में कोई सबूत, दस्तावेज या गवाह पेश करना चाहता है, तो उसे कोर्ट के समक्ष प्रस्तुत करने का अवसर दिया जाता है।
9. अंतिम बहस एवं निर्णय (Final Arguments & Judgment)
• दोनों पक्षों के अधिवक्ताओं द्वारा अंतिम मौखिक दलीलें (Final Arguments) पेश की जाती हैं।
• साक्ष्यों के संपूर्ण विश्लेषण के बाद न्यायालय निर्णय सुनाता है:
• दोषमुक्ति (Acquittal): जुर्म साबित न होने पर आरोपी को बरी कर दिया जाता है।
• दोषसिद्धि (Conviction): जुर्म साबित होने पर कानून के अनुसार सजा व जुर्माना सुनाया जाता है।

