BSA 2023 की धारा 27: पश्चात्वर्ती न्यायिक कार्यवाहियों में पुराने साक्ष्य की ग्राह्यता, शर्तें और महत्व
भारत के आपराधिक न्याय तंत्र को आधुनिक, पारदर्शी और त्वरित बनाने के उद्देश्य से नए आपराधिक कानून 1 जुलाई 2024 से लागू हो चुके हैं। इसी क्रम में 150 वर्ष पुराने 'भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872' (Indian Evidence Act, 1872) का स्थान 'भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023' (BSA, 2023) ने ले लिया है।
भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023 की धारा 27 एक अत्यंत महत्वपूर्ण कानूनी प्रावधान है। यह धारा यह निर्धारित करती है कि किसी साक्षी (गवाह) द्वारा पूर्व में दी गई गवाही को किसी अगली (पश्चात्वर्ती) न्यायिक कार्यवाही या उसी मामले के अगले चरण में साक्ष्य के रूप में कब और किन परिस्थितियों में स्वीकार किया जा सकता है। पुरानी साक्ष्य संहिता में यही प्रावधान धारा 33 के अंतर्गत शामिल था।
धारा 27 क्या है? (धारा का मूल अर्थ)
सामान्य कानूनी नियम यह है कि अदालत में किसी भी तथ्य को सिद्ध करने के लिए साक्षी को स्वयं उपस्थित होकर गवाही देनी होती है ताकि अदालत उसके आचरण को देख सके और विपरीत पक्ष उससे प्रतिपरीक्षा (Cross-examination) कर सके। इसे 'अनुश्रुत साक्ष्य का नियम' (Rule Against Hearsay Evidence) कहा जाता है।
लेकिन, बीएसए (BSA) 2023 की धारा 27 अनुश्रुत साक्ष्य के नियम का एक प्रमुख अपवाद है।
इस धारा के अनुसार, यदि किसी गवाह ने किसी न्यायिक कार्यवाही में या साक्ष्य लेने के लिए कानून द्वारा प्राधिकृत किसी व्यक्ति के समक्ष कोई बयान या साक्ष्य दिया है, तो उस साक्ष्य में कहे गए तथ्यों की सत्यता को:-
1. किसी पश्चात्वर्ती (अगली) न्यायिक कार्यवाही में, या
2. उसी न्यायिक कार्यवाही के किसी पश्चात्वर्ती चरण में,
साबित करने के लिए सुसंगत (Relevant) माना जाएगा।
गवाह की अनुपस्थिति के 5 मुख्य आधार
पूर्वोक्त गवाही को अगली कार्यवाही में इस्तेमाल करने के लिए यह आवश्यक है कि गवाह स्वयं न्यायालय में दोबारा गवाही देने के लिए उपलब्ध न हो। धारा 27 के तहत निम्नलिखित 5 स्थितियों में ही पुरानी गवाही को ग्राह्य माना जाता है:-
1. साक्षी की मृत्यु हो चुकी हो:- गवाह की मौत हो गई हो और वह अदालत में आने में असमर्थ हो।
2. साक्षी का पता न लगाया जा सके:- काफी प्रयास के बाद भी गवाह का कोई सुराग न मिल रहा हो।
3. साक्षी साक्ष्य देने में असमर्थ हो गया हो:- गवाह शारीरिक या मानसिक रूप से इस स्थिति में न हो कि वह बयान दे सके (जैसे- गंभीर बीमारी, पक्षाघात आदि)।
4. विपरीत पक्ष द्वारा गवाह को दूर रखा गया हो:- प्रतिकूल पक्ष (Adverse Party) ने छल, धमकी या दबाव बनाकर गवाह को अदालत में उपस्थित होने से रोक दिया हो।
5. अनुचित विलंब या व्यय:- गवाह की उपस्थिति दर्ज कराने में इतना अधिक समय या खर्च लग रहा हो जिसे मामले की परिस्थितियों को देखते हुए न्यायालय अनुचित/असंगत मानती हो।
धारा 27 को लागू करने की 3 अनिवार्य शर्तें (Proviso Conditions)
पूर्व में दर्ज साक्ष्य को अगली कार्यवाही में तभी स्वीकार किया जाएगा जब नीचे दी गई तीन आवश्यक कानूनी शर्तें पूरी होती हों:
1. पक्षकारों की समानता (Same Parties):- पहली कार्यवाही और दूसरी कार्यवाही उन्हीं पक्षकारों (Parties) के बीच होनी चाहिए या उनके हित-प्रतिनिधियों (Representatives-in-interest) के बीच होनी चाहिए।
2. प्रतिपरीक्षा का अधिकार और अवसर (Right and Opportunity to Cross-Examine):- पहली कार्यवाही के दौरान विपरीत पक्ष (Adverse Party) के पास गवाह से प्रतिपरीक्षा (Cross-examination) करने का कानूनी अधिकार और वास्तविक अवसर उपलब्ध होना अनिवार्य था। यदि पहली कार्यवाही में जिरह का अवसर नहीं मिला था, तो वह बयान धारा 27 के तहत लागू नहीं होगा।
3. विवादक प्रश्नों का तात्विक रूप से समान होना (Substantially Same Issues):- पहली कार्यवाही में उठाए गए कानूनी प्रश्न/मुद्दे और दूसरी कार्यवाही के मुख्य मुद्दे अनिवार्य रूप से समान होने चाहिए।
डिजिटल युग और भारतीय साक्ष्य अधिनियम 2023 का प्रभाव
भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023 की मुख्य विशेषता यह है कि यह इलेक्ट्रॉनिक एवं डिजिटल रिकॉर्ड्स को प्राथमिक और द्वितीयक साक्ष्य के रूप में व्यापक मान्यता देता है।
धारा 27 के संदर्भ में, यदि किसी पूर्ववर्ती न्यायिक कार्यवाही में वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग या इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों से गवाही दर्ज की गई थी, तो गवाह की अनुपलब्धता की स्थिति में उन ऑडियो-वीडियो रिकॉर्डिंग्स और डिजिटल ट्रांसक्रिप्ट्स को भी अदालत में साक्ष्य के रूप में प्रभावी ढंग से इस्तेमाल किया जा सकता है। इससे मामलों के निष्पादन में तेजी आती है और समय की बचत होती है।
न्याय प्रणाली में इस धारा का व्यावहारिक महत्व
★ साक्ष्यों को नष्ट होने से बचाना:- कई बार मामलों के वर्षों तक लंबित रहने के दौरान गवाहों की मृत्यु हो जाती है या वे अस्वस्थ हो जाते हैं। धारा 27 यह सुनिश्चित करती है कि पूर्व में दर्ज कराया गया सच्चा साक्ष्य व्यर्थ न जाए।
★ समय और संसाधनों की बचत:- एक ही गवाह को बार-बार अदालत बुलाने और एक ही बयान को बार-बार दर्ज कराने की आवश्यकता नहीं पड़ती।
★ गवाहों की सुरक्षा:- यदि विरोधी पक्ष गवाह को डरा-धमकाकर या गायब करके ट्रायल को प्रभावित करने का प्रयास करता है, तो धारा 27 के तहत उसकी पुरानी गवाही ही आरोपी के खिलाफ मुख्य साक्ष्य बन सकती है।
निष्कर्ष
भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023 की धारा 27 न्याय-व्यवस्था में संतुलन बनाए रखने का कार्य करती है। यह एक तरफ जहां गवाह की गैर-मौजूदगी में न्याय प्रक्रिया को रुकने से बचाती है, वहीं दूसरी ओर प्रतिपरीक्षा (Cross-examination) की शर्त रखकर यह भी सुनिश्चित करती है कि आरोपी या विपरीत पक्ष के अधिकारों का हनन न हो। कानून के विद्यार्थियों, अधिवक्ताओं और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे अभ्यर्थियों के लिए नए साक्ष्य कानून के इस प्रावधान को समझना अत्यंत आवश्यक है।
Bare Act में लिखी हुई मूल भाषा (Bare Act Text):- 27. किसी साक्ष्य में कथित तथ्यों की सत्यता को पश्चात्वर्ती कार्यवाही में साबित करने के लिए उस साक्ष्य की सुसंगति:-
वह साक्ष्य, जो किसी साक्षी ने किसी न्यायिक कार्यवाही में, या विधि द्वारा उसे लेने के लिए प्राधिकृत किसी व्यक्ति के समक्ष दिया है, उन तथ्यों की सत्यता को, जो उस साक्ष्य में कथित हैं, किसी पश्चात्वर्ती न्यायिक कार्यवाही में या उसी न्यायिक कार्यवाही के आगामी प्रक्रम में साबित करने के प्रयोजन के लिए तब तक सुसंगत है, जब कि वह साक्षी मर गया है या मिल नहीं सकता है या वह साक्ष्य देने के लिए असमर्थ है या प्रतिपक्षी द्वारा उसे पहुंच के बाहर कर दिया गया है अथवा यदि उसकी उपस्थिति इतने विलम्ब या व्यय के बिना, जितना कि मामले की परिस्थितियों में न्यायालय अयुक्तियुक्त समझता है, अभिप्राप्त नहीं की जा सकती :
परन्तु वह तब जब कि वह कार्यवाही उन्हीं पक्षकारों या उनके हित प्रतिनिधियों के बीच में थी, प्रथम कार्यवाही में प्रतिपक्षी को प्रतिपरीक्षा का अधिकार और अवसर था, विवाद्य प्रश्न प्रथम कार्यवाही में सारतः वही थे जो द्वितीय कार्यवाही में हैं।
स्पष्टीकरण:- दाण्डिक विचारण या जांच इस धारा के अर्थ के अन्तर्गत अभियोजक और अभियुक्त के बीच कार्यवाही समझी जाएगी।
अस्वीकरण: यह लेख केवल सामान्य कानूनी जानकारी और शैक्षणिक उद्देश्यों के लिए है। किसी भी वास्तविक कानूनी मामले, मुकदमे या विवाद की स्थिति में किसी विशेषज्ञ अधिवक्ता (Advocate) से विधिक सलाह अवश्य लें।


