(IEA) की धारा 34 को (BSA) की धारा 28 में बदल दिया गया है। - अगर आप चाहे तो लोगो पर क्लिक करके देख सकते है |
भारतीय साक्ष्य अधिनियम (BSA) धारा 28: लेखा पुस्तकों की प्रविष्टियां कब सुसंगत हैं? सम्पूर्ण जानकारी
भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023 (Bharatiya Sakshya Adhiniyam, 2023 - BSA) जो पुराने भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 का स्थान ले चुका है, कानूनी और न्यायिक प्रक्रियाओं में एक बड़ा बदलाव लेकर आया है। इस नए कानून की धारा 28 (Section 28) व्यापारिक और वाणिज्यिक विवादों में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। यह धारा बताती है कि लेखा पुस्तकों (Books of Account) में की गई प्रविष्टियां (Entries) अदालत में कब सुसंगत (Relevant) होती हैं।
आइए विस्तार से जानते हैं कि BSA की धारा 28 क्या कहती है और इसके कानूनी मायने क्या हैं।
BSA धारा 28 का कानूनी प्रावधान क्या है?
भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023 की धारा 28 के अनुसार:-
Bare Act में लिखी हुई मूल भाषा (Bare Act Text):- कारबार के अनुक्रम में नियमित रूप से रखी गई लेखा पुस्तकों की प्रविष्टियां, जिनके अन्तर्गत वे भी हैं जो इलैक्ट्रानिक रूप में रखी गई हैं, जब कभी वे ऐसे विषय का निर्देश करती हैं जिसमें न्यायालय को जांच करनी है, सुसंगत हैं, किन्तु अकेले ऐसे कंथन ही किसी व्यक्ति को दायित्व से भारित करने के लिए पर्याप्त साक्ष्य नहीं होंगे।
उदाहरण:- ख पर क एक हजार रुपए के लिए वाद लाता है और अपनी लेखा बहियों की वे प्रविष्टियां दर्शित करता है, जिनमें ख को इस रकम के लिए उसका ऋणी दर्शित किया गया है। ये प्रविष्टियां सुसंगत हैं किन्तु ऋण साबित करने के लिए अन्य साक्ष्य के बिना पर्याप्त नहीं हैं।
सरल शब्दों में कहें तो, यदि कोई व्यापारी, दुकानदार या कंपनी अपने व्यवसाय के दौरान नियमित रूप से अपने खाते या बही-खाते (चाहे वे कागजी हों या डिजिटल/इलेक्ट्रॉनिक फॉर्मेट में) रखती है, तो उन बहियों में दर्ज प्रविष्टियां अदालत में साक्ष्य के रूप में स्वीकार किए जाने योग्य (सुसंगत) होती हैं।
धारा 28 के मुख्य बिंदु और शर्तें
इस धारा के तहत लेखा पुस्तकों को सुसंगत मानने के लिए निम्नलिखित शर्तों का पूरा होना आवश्यक है:-
व्यवसाय के सामान्य अनुक्रम में (In the Course of Business):- प्रविष्टियां किसी आकस्मिक या मुकदमे के बाद तैयार की गई नहीं होनी चाहिए, बल्कि यह व्यवसाय के रोजाना के सामान्य कामकाज का हिस्सा होनी चाहिए।
नियमित रूप से रखी गई हों (Regularly Kept):- खातों को करीने से और नियमित रूप से अपडेट किया जाना चाहिए।
इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड शामिल हैं:- आधुनिक समय की मांग को देखते हुए, नए अधिनियम (BSA) में डिजिटल और कंप्यूटरकृत खातों (जैसे टैली, सॉफ्टवेयर डेटा या एक्सेल शीट) को भी इसमें स्पष्ट रूप से शामिल किया गया है।
क्या लेखा पुस्तकों की प्रविष्टियां अकेले ही देनदारी साबित करने के लिए पर्याप्त हैं?
यह इस धारा का सबसे महत्वपूर्ण पहलू है। कानून स्पष्ट करता है कि लेखा पुस्तकों की प्रविष्टियां सुसंगत जरूर होती हैं, लेकिन वे अकेले किसी व्यक्ति पर दायित्व या देनदारी साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं होतीं।
अदालतें केवल बही-खाते के आधार पर किसी को दोषी या ऋणी नहीं मानतीं। इसके साथ अन्य संपुष्टि साक्ष्य (Corroborative Evidence) जैसे रसीदें, चालान, गवाहों के बयान या अन्य दस्तावेजों की आवश्यकता होती है।
उदाहरण (Illustration) :- यदि 'अ' (A) 'ब' (B) पर 1,000 रुपये के बकाया का दावा करता है और अदालत में अपने खाते की वह प्रविष्टि दिखाता है जिसमें 'ब' को देनदार दिखाया गया है, तो यह प्रविष्टि सुसंगत (Relevant) है, लेकिन बिना किसी अन्य अतिरिक्त साक्ष्य के केवल इस प्रविष्टि के आधार पर अदालत ऋण को पूरी तरह प्रमाणित नहीं मानेगी।
निष्कर्ष
भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 28 डिजिटल युग के व्यापारिक लेन-देन को कानूनी सुरक्षा प्रदान करती है। यह व्यापारियों को अपने डिजिटल और पारंपरिक खातों को अदालत में पेश करने का अधिकार देती है, साथ ही यह भी सुनिश्चित करती है कि किसी भी व्यक्ति पर केवल एकतरफा प्रविष्टियों के आधार पर अनुचित दबाव या देनदारी न लादी जाए। अदालतों में मजबूती से केस साबित करने के लिए लेखा पुस्तकों के साथ-साथ अन्य सहायक सबूतों का होना भी अनिवार्य है।
अस्वीकरण: यह लेख केवल सामान्य कानूनी जानकारी और शैक्षणिक उद्देश्यों के लिए है। किसी भी वास्तविक कानूनी मामले, मुकदमे या विवाद की स्थिति में किसी विशेषज्ञ अधिवक्ता (Advocate) से विधिक सलाह अवश्य लें।


